
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
दया आती है, ऐसे प्रबुद्ध-वर्ग की मानसिकता पर जो ‘किसी’ का ‘विकल्प’ पूछते हैं।
ऐसे लोग मेरे इस प्रश्न का जैसे ही उत्तर देंगे, उनके प्रश्न का उत्तर उन्हें स्वत: प्राप्त हो जायेगा।
प्रश्न : इन्दिरा गांधी के समय लगातार प्रश्न किया जाता रहा : हू विल बी आफ्टर इन्दिरा? इन्दिरा गांधी के बाद कौन?
फिर कैसे नेतृत्व उभरा? देवेगौड़ा, गुजराल, बी० पी० सिंह इत्यादिक के प्रधान मन्त्री बनने की कोई सम्भावना थी?
देश का मतदाता जिस दल के पक्ष में सर्वाधिक मतदान करेगा, ‘नेतृत्व’ वहीं से उभर कर आयेगा, यह संवैधानिक मान्यता है।
नितान्त अपरिपक्व राजीव गांधी प्रधान मन्त्री नहीं बने थे?
एक बात और, इस प्रकार के प्रश्न करनेवाले अपनी सुसुप्त ज्ञानेन्द्रियों को जाग्रत कर सुनें : प्रधान मन्त्री नामक जीव हीरा-मोती खाकर पैदा नहीं होते। प्रधान मन्त्री और उसके मन्त्री देश नहीं चलाते, देश को चलानेवाले ‘भारतीय प्रशासनिक सेवाओं’ के लिए चयनित अधिकारी होते हैं। कक्षा १० फेल मन्त्री केवल बोलना जानता है, करना नहीं, इसलिए ‘विकल्प’ की चादर ओढ़कर सोने का स्वभाव समाप्त कीजिए।
एक बात और, ‘विकल्प’ सदैव ‘अभाव’ की कोख से जन्म लेता आ रहा है।