पराये शहर मे

घर से निकल तो आए थे पराये शहर में,
अपने शहर में खुद का एक आशियाना बनाने के खातिर
बहुत उम्मीदें थी हमें इस पराये शहर से
कि इतना कमाएंगे कि मेरा नाम होगा खुद के अपने शहर में,
लेकिन जब आया इस नए शहर में तो भीड़ बहुत ज्यादा थी।
कुछ तो भूल गए थे अपने सपनों को,
लेकिन कुछ थे अभी भी जिनको सपनों की तलब ज्यादा थी।
मैं भी इसी भीड़ में अपने सपनों को साकार करने शहर पे शहर बदलता रहा,
उम्र तो बीत गई लेकिन मैं फिर भी किराए के ही घर में रहा
तब मैं भी भूल गया अपने सपनों को और जिंदगी भर केवल सफर में रहा।

उस रोज दीवाली होती है

—-प्रांशुल त्रिपाठी, विधि छात्र
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा l

एक दीप मन में भी जलायें

क्यों जलाते हो मुझे

“माँ” मेरी दुनिया