जिनके चरणों की रज चन्दन वो दशरथनन्दन भटक रहे

जगन्नाथ शुक्ल..✍(प्रयागराज)

जिनके चरणों की रज चन्दन वो दशरथनन्दन भटक रहे; नाममात्र  लेकर जिनका खल सारा सुख-वैभव गटक रहे।
बोझ नहीं  सह  सकती  जनता  वादों के हत्यारों  की; झूठ- फ़रेब भरे  कृत्यों से  सौहार्द – प्रेम  सब  चटक रहे।
लुण्ठित- कुण्ठित मनस्विता का चीर-हरण नित ज़ारी है; धर्मध्वज  की  लिए पताका  पाखण्डी कितना मटक रहे।
लम्बी- चौड़ी  बातों  का  नित नया  पुलिन्दा  है खुलता; पूर्व  कही  बातों  को  लेकर अब मुँह में ताले लटक रहे।
ला  खड़ा   किया चौराहे  पे चहुँओर  अँधेरा  है छाया; गिरगिट-सा रूप दिखा करके सबकी आँखों में खटक रहे।
मैं  बिन्दु  हूँ; मैं  हिन्दू  हूँ; मैं  धर्म-धुरी  जल-सिन्धु  हूँ; प्रेम  मिला जन-मानस  का  तो थोड़े में ही छलक रहे।
राष्ट्र एक है; रक्त  एक है; जाति  सभी की  हिन्दुस्तानी; सोच रखें समरसता  की तो  सदा सभी की पलक रहे।