आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

विचारणीय शब्द :-- पूर्वाग्रह, पूर्वग्रह और प्रणाम

विचारणीय शब्द :–

● पूर्वाग्रह
● पूर्वग्रह
● प्रणाम

● पूर्वाग्रह–

यह दीर्घ स्वर सन्धि का उदाहरण है और षष्ठी तत्पुरुष समास का भी। पूर्वाग्रह में प्रामाणिक-अप्रामाणिक और अविवादित-विवादित विषय आते हैं। ऐसे में, कौन कब अप्रामाणिक-विवादास्पद विषय के प्रति आग्रहशील है अथवा प्रामाणिक-अविवादास्पद विषय के प्रति हठीला है, इसे तात्कालिक व्यवहार से ही समझा जा सकता है; क्योंकि इसकी अवधारणा साक्ष्यसहित है और साक्ष्यरहित भी।

● पूर्वग्रह–

यह कर्मधारय समास का उदाहरण है। इसके अन्तर्गत केवल ‘अप्रामाणिक’ और ‘विवादास्पद’ विषय सम्मिलित रहते हैं। इसमें केवल साक्ष्यरहित विषय होते हैं। इसे ‘पूर्वग्रस्त’ भी कहते हैं।

जब कोई किसी अनिश्चित अप्रमाणित अथवा विवादग्रस्त विषय के प्रति अपनी हठधर्मिता का परिचय देता है अथवा उस आग्रहपूर्ण धारणा को बिना जाने अथवा समझे-बूझे अपने मन में स्थिर कर लेता है तब उसे ‘पूर्वग्रह’ कहते हैं, न कि ‘पूर्वाग्रह’। इस दृष्टि से यहाँ पर ‘पूर्वाग्रह’ का प्रयोग पूर्णत: अशुद्ध है और अनुपयुक्त भी।

अब प्रश्न है, किसे माना जाये और किसे ठुकुराया जाये, यह प्रयोगकर्त्ता पर निर्भर करता है; परन्तु हम वही स्वीकार करेंगे, जो शुद्ध और उपयुक्त शब्द है और ग़लत प्रयोग करनेवालों को जाग्रत् भी करते रहेंगे।

● प्रणाम–

‘प्र’ उपसर्ग है, जिसका यहाँ अर्थ ‘प्रकृष्ट’, ‘उत्तम’, ‘विशिष्ट’ है।
यह ‘नम्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘झुकना’ है, जो कि ‘नतमस्तक’ की अवधारणा प्रस्तुत करता है। इस धातु के अन्त में जैसे ही एक प्रकार का प्रत्यय ‘घञ्’ जुड़ता है वैसे ही ‘प्रणाम’ का सर्जन होता है। प्रणाम का अर्थ है, उत्तम ढंग से नतमस्तक होना; नमित होना। प्रणाम अपने ज्येष्ठजन के सम्मुख नतमस्तक होकर ‘अभिवादन’ करने की एक शैली है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ जुलाई, २०२१ ईसवी।)