रातों की सूनी चौखट पर, तेरा नाम पुकारा मैंने

वादा करके मैं मुकरा,
अब जीना भारी लगता है।
कैसे आँख मिलाऊँ मैं,
जीना गद्दारी लगता है।
तुम मानो या ना मानो ये,
तुम बिन जीना मुश्किल है।
साँसें भी कोस रही हमको,
लगता पहाड़ सा पल-पल है।
मन ऊब गया जीते-जीते,
अब मेरे चलने की बारी है।
कर देना माफ प्रिये हमको,
ये जान निकलने वाली है।।
हर धड़कन अपराधी बनकर
सीने में शोर मचाती है,
तेरी स्मृतियों की हर आहट
चुपके से अश्रु बहाती है।
जो स्वप्न सजाए थे मिलकर,
सब राख हुए लाचारी में,
मैं खुद से हार चुका कब का,
बस साँस अटकी बीमारी में।
तेरे विश्वास की डोरी को
अपने हाथों ही तोड़ा था,
तेरे कोमल मन के आँगन में
मैंने ही विष घोला था।
अब पश्चात्ताप की अग्नि में
हर क्षण जलना पड़ता है,
अपना ही चेहरा दर्पण में
मुझको खंजर लगता है।
चाहा था तुझको हँसता देखूँ,
दुःख का कारण मैं बन बैठा,
जिसको जीवन देना चाहा,
जीवन की सन्ध्या बन बैठा।
अब लौटूँ भी तो किस-खातिर,
सब रिश्ते दूजे लगते हैं,
तेरे द्वार खड़े होकर भी
न कदम हमारे रुकते हैं।
रातों की सूनी चौखट पर
तेरा नाम पुकारा था मैंने,
टूटे मन की वीणा पर बस
पश्चात्ताप उतारा था मैंने।
यदि संभव हो तो भूल मुझे,
अपने मन को समझा लेना,
मैं दोषी हूँ अपने प्रेम का,
तुम मुझको बस क्षमा देना।
ना तुमको और सताऊँगा,
ना झूठा स्वप्न दिखाऊँगा,
तेरी राहों से विलग कहीं
चुपचाप दूर हो जाऊँगा।
बस अंतिम इतनी विनती है,
जब कभी याद मैं आ जाऊँ,
तुम अश्रु नहीं बहाना प्रिय!
मुस्काना मै खुश हो जाऊँगा।