डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
अतिरिक्त आत्मविश्वास अतीव घातक होता है। उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता और राज्य के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी ने उत्तरप्रदेश-विधानसभा-चुनाव के समय जितनी घोषणाएँ की थीं; साथ ही प्रधान मन्त्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने उत्तरप्रदेश-विधानसभा-चुनाव के दौरान कई चुनावी मंचों से जिस तरह से उचक-उचक कर बड़ी-बड़ी घोषणाएँ की थीं, वे सारे-के-सारे आश्वासन और सारी घोषणाएँ जहाँ-की-तहाँ पड़ी हुई हैं। अतिरिक्त बहुमत के साथ चुनाव जीतकर सरकार गठन करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता अहम्मन्य हो गये हैं। सारे आश्वासन और सारी घोषणाएँ सात तालों में बन्द कर दी गयी हैं। यही कारण है कि मोदी का ‘विकास’ और योगी का ‘हिन्दुत्व’ फूलपुर और गोरखपुर के संसदीय उपचुनावों में ‘फुस्स’ हो चुके हैं। उत्तरप्रदेश-राज्य के नागरिक बहुत सजग, सावधान तथा सतर्क हैं। सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी को उत्तरप्रदेश में शासन करते हुए एक वर्ष हो चुके हैं, परन्तु पूर्व में अपने ‘संकल्पपत्र’ में जो लोकलुभावन वायदे किये गये थे, उनका क्या हुआ, इसका जवाब भा०ज०पा० के किसी नेता के पास नहीं है। आश्चर्य होता है कि अपने राज्य की जनता की कठिनाइयों को समझने की जगह मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी हिमाचलप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, पूर्वोत्तर राज्यों, केरल आदिक राज्यों में ‘पोस्टर ब्वॉय’ के रूप में चुनाव-प्रचार करते देखे गये। आज उत्तरप्रदेश की जनता तरह-तरह की समस्याओं से ग्रस्त है; उन्हें अभाओं में जीने के लिए बाध्य किया जा रहा है; राज्य की जनता को तरह-तरह के करों से बोझिल कर दिया गया है और अपना राजस्व बढ़ाया जा रहा है। वहाँ की जनता सही समय की तलाश में थी। अन्तत:, फूलपुर और गोरखपुर में कराये गये लोकसभा के उपचुनावों में जागरूक मतदाताओं ने उस दल को बुरी तरह से पराजित दिया है, जिसने वर्ष २०१७ के विधानसभा के चुनाव में ३२५ सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था। दोनों सीटें ऐतिहासिक रही हैं। जहाँ फूलपुर देश के प्रथम प्रधान मन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू की सीट थी, वहीं गोरखपुर में ३० वर्षों के बाद भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित पराजय मिली है। वर्ष १९९८ से २०१४ तक आदित्यनाथ योगी लगातार चुनाव जीतते आ रहे थे। इतना ही नहीं, जिस निर्वाचन-क्षेत्र में ‘गोरक्षनाथपीठ’ क्षेत्र से बाहर का कोई उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाता था, उस क्षेत्र से स०पा० के प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने डंके की चोट पर बाज़ी जीत ली है।
फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनावों में जितनी चतुराई के साथ समाजवादी पार्टी-प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाजवादी पार्टी की नेत्री मायावती ने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को पटकनी देने की रणनीति बनायी थी, उसकी भनक किसी को नहीं लगने दी गयी और चुनाव के कुछ ही दिनों पहले अपने गठबन्धन की सार्वजनिक घोषणा कर, सभी को चौंका दिया था, कारण कि ये दोनों राजनीतिक दल अप्रत्याशित रूप में २५ वर्षों बाद आपस में मिले थे। बताया जाता है कि अखिलेश को मायावती के समर्थन करने की बात की ख़बर मुलायम सिंह यादव को भी नहीं दी गयी थी।
यह रणनीति बी०जे०पी० की अब तक की सारी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर भारी पड़ी है। मायावती समझौते के बदले राज्यसभा में स०पा० का समर्थन चाहती थीं, जिसे अखिलेश ने मान लिया था। फिर क्या था, मायावती ने अपने समर्थकों से ‘साइकिल’ के पक्ष में मतदान करने-कराने का आह्वान कर दिया था। परिणाम सामने रहे :– फूलपुर में ‘पटेल बनाम पटेल’ के चुनाव में ब०स०पा०-समर्थित स०पा० के प्रत्याशी नागेन्द्र सिंह पटेल ने भा०ज०पा०-प्रत्याशी कौशलेन्द्र सिंह पटेल को ५९,४६० मतों से बुरी तरह से पराजित कर दिया है, वहीं गोरखपुर में भी लोकसभा के उपचुनाव में भा०ज०पा० के उम्मीदवार उपेन्द्र शुक्ल को २१, ८८१ मतों से हराकर स०पा० ने आदित्यनाथ के मुख्य गढ़ में सेंध लगा दी है।
वर्ष २०१७ में उत्तरप्रदेश-विधानसभा-चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी जीती थी तब चुनाव का कमान केशव प्रसाद मौर्य के हाथों में था। उन्हें उम्मीद थी कि जीत का सेहरा उनके सिर पर ही बाँधा जायेगा और उन्हें ही मुख्य मन्त्री भी बनाया जायेगा, परन्तु ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के पदाधिकारियों के प्रभाव से आदित्यनाथ योगी को मुख्य मन्त्री बनाया गया, जो केशव प्रसाद मौर्य के लिए एक प्रकार का राजनीतिक आघात था। वहीं गोरखपुर के प्रत्याशी उपेन्द्र शुक्ल आदित्यनाथ योगी की पसन्द के उम्मीदवार नहीं थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी अन्तर्कलह पराजय के मूल में रही हो। बहरहाल, ये दोनों पराजय उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री और उपमुख्य मन्त्री क्रमश: आदित्यनाथ योगी और केशव प्रसाद मौर्य के क़द को ‘बौना’ बना चुकी है।
आश्चर्य है, बी०जे०पी० को दोनों क्षेत्रों में जिस तरह की क़रारी हार मिली है, उसका श्रेय अभी तक किसी ने नहीं लिया है और अभी तक की सारी जीत का श्रेय जिस तरह से तथाकथित विकास-पुरुष नरेन्द्र मोदी को दिया जाता रहा है, उसके सिर पर ‘हार का ठीकरा’ फोड़ने का कोई साहस क्यों कर पा रहा है : मीठा लप्-लप् और कड़ुआ थू-थू?..! इन दोनों चुनावों में जो मुख्य विषय है, वह यह कि अप्रत्याशित न्यूनतम मतदान-प्रतिशत क्यों रहा? विकास और हिन्दुत्व का मुद्दा ‘हवा-हवा’ क्यों हो गया?
फूलपुर में सीधा मुकाबला रहा : सपा० और भा०ज०पा० के बीच। जातीय समीकरण समझें तो दो पटेल, एक ब्राह्मण तथा एक मुसलमान के बीच सारे मत बँट गये थे, यानी निषाद, यादव, चमार, पासी, पटेल, ब्राह्मण, मुसलमान आदि जातियाँ सामने थीं। काँग्रेस सूखे पत्ते की तरह से उड़ गयी। यही यदि ब०स०पा० की तरह से काँग्रेस ने भी स०पा० का साथ दे दिया होता तो उत्तरप्रदेश में काँग्रेस का क़द बड़ा दिखता। यदि काँग्रेस भविष्य में स०पा०, ब०स०पा०, आर०जे०डी० आदिक दलों के साथ हाथ मिलाकर नहीं चलती है तो उसका राजनीतिक अस्तित्व भी ख़तरे में पड़ सकता है।
गोरखपुर में जातीय समीकरण पूरी तरह से स०पा०-प्रत्याशी के पक्ष में था। कैसे? आइए! समझते हैं :—
गोरखपुर में सर्वाधिक संख्या निषादों की है। वहाँ लगभग तीन लाख निषाद रहते हैं; लगभग दो लाख यादव और चमार, पासी, पटेल, मुसलमान आदिक हैं तथा लगभग मात्र डेढ़ लाख ब्राह्मण हैं। सच तो यह है कि भा०ज०पा० हाई कमान और उत्तरप्रदेश के योगी इस बात के प्रति विश्वस्त थे कि दोनों ही जगह से सुसमाचार मिलेगा और उसका सेहरा ‘विकास’ और ‘हिन्दुत्व’ के सिर बाँधा जायेगा, परन्तु मतदाताओं ने अपना ऐसा निर्णय सुनाया, जिस पर न तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को विश्वास हो रहा है और न ही विजेता-दल के नेताओं को। किसी भी राजनीतिक दल को नहीं भूलना चाहिए कि लोकतन्त्र में लोकतन्त्ररहित सत्ता-संचालन करने का ख़्वाब देखनेवालों का अंजाम ऐसा ही होता है।
हतप्रभ कर देनेवाले चुनाव-परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया करते हुए मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी ने इस सचाई पर अपनी मुहर लगा दी है कि अतिरिक्त आत्मविश्वास के कारण पराजय का मुँह देखना पड़ा है और स्थानीय मुद्दों की अनदेखी भी महँगी साबित हुई है। वहीं उपमुख्य मन्त्री केशव प्रसाद मौर्य का मानना है, ” हमारा वोटर घर से नहीं निकला, इसलिए हार हुई।”
मुख्य मन्त्री का कार्य क्या होता है? यही कि राज्य में ‘हिन्दुत्व’ का विष बोकर स्वयं को ‘विष-पुरुष’ सिद्ध कर सीना फुलाते रहें। सालभर में आदित्यनाथ योगी राज्य के कितने ज़िलों (ग्राम-नगरों) में गये और जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद किये? राज्य की जनता ने उन्हें इसलिए नहीं चुना है कि वे दूसरे राज्यों में जाकर ‘पोस्टर ब्वॉय’ के रूप में चुनाव प्रचार करते रहें और अपने राज्य की जनता के लिए उनके पास अवकाश तक नहीं। दूसरी ओर, केशव प्रसाद मौर्य ने उपमुख्य मन्त्री के रूप में राज्य की जनता के हित में कौन-सा कार्य किया है?
स्वास्थ्य-असुविधा, निश्शुल्क औषधि और जाँच-सुविधाएँ, किसानों को ‘अन्नदाता’ की उपाधि से विभूषित कर उनके साथ छलावा करना, प्राथमिक शाला के विद्यार्थियों के साथ दग़ाबाज़ी, गोरखपुर के बाबा राघवदास चिकित्सालय में ऑक्सीजन के अभाव में हज़ारों शिशुओं और बालक-बालिकाओं की मृत्यु और सरकार संवेदनहीन, बी०टी०सी०, बी०एड्०, उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग, माध्यमिक शिक्षा चयन परिषद् में धाँधली, वहाँ के अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़, ‘हिन्दुत्व का ढकोसला’ इस क़रारी हार का मूल कारण है।
अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। सबसे पहले ‘हिन्दुत्व’ और ‘भगवा’ के स्थान पर ‘भारतीयता’ की बात करनी होगी। राज्य के किसानों और शिक्षित युवा बेरोज़गारों की दशा और दिशा के प्रति सजग रहना होगा और चुनाव-पूर्व जितने भी आश्वासन किये गये थे; घोषणाएँ की गयी थीं, उन सबको क्रमश: ज़मीन पर उतारना होगा, अन्यथा फूलपुर और गोरखपुर के लोकसभा के उपचुनावों के परिणामों से बढ़कर परिणाम सम्पूर्ण उत्तरप्रदेश-विधानसभा और लोकसभा के लिए कराये जानेवाले चुनावों का होगा, क्योंकि दोनों उपचुनावों के परिणामों का प्रभाव इतना गहरा हुआ है कि उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी और उपमुख्य मन्त्री केशवप्रसाद मौर्य के उस गढ़ को ‘बुआ और बबुआ’ ने ध्वस्त कर दिया है, जहाँ से योगी और मौर्य ने क्रमश: एक और तीन लाख मतों से भी जीत दर्ज़ की थी।
इन दोनों संसदीय क्षेत्रों से शानदार जीत हासिल करने के बाद ‘हाथी’ और ‘साइकिल’ एक साथ एक रफ़्तार में चल पड़ी हैं। दोनों की यह राजनीतिक रणनीति भारतीय जनता पार्टी के चुनावी रणनीतिकारों और चाणक्यों के लिए एक अबूझ पहेली बन गयी है। यदि ‘बुआ’ और ‘बबुआ’ के बीच वर्ष २०१४ के लोकसभा-चुनाव में समझौता हो गया रहता और काँग्रेस मिल गयी रहती तो उन्हें ८० में से ५६ सीटें मिलतीं और भारतीय जनता पार्टी को मात्र २४ सीटें। अब गेंद भारतीय जनता पार्टी के पाले में है। ग़लत दिशा में गेंद जाते भी भारतीय जनता पार्टी की उलटी गिनती शुरू जायेगी। बहुत फूँक-फूँककर अब क़दम रखने होंगे। स०पा०-ब०स०पा० भी दूध के धोये नहीं है। उन्हें अपनी पुरानी गन्दी आदतों, संस्कारों तथा कार्यसंस्कृति से बिलकुल अलग हटकर काम करना होगा।
लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।
(मो० नं० : ९९१९०२३८७०)
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १५ मार्च, २०१८ ई०)