०विषय-विशेषज्ञों ने हिन्दी के विविध वैश्विक आयामों पर प्रकाश डाले थे
★ हिन्दी की वैश्विक चेतना देखते ही बनती है– विभूति मिश्र
पहली बार इलाहाबाद और प्रयागराज में एक ऐसा बौद्धिक आयोजन सम्पन्न हुआ है, जिसमें प्रयागराज के हिन्दी-प्रसारक, हिन्दी-प्राध्यापकों, भाषाविद्, अधिवक्ता, पत्रकार, साहित्यकारों ने ‘गोलमेज भाषा-मन्थन’ किया था। अवसर था, ‘विश्व हिन्दी-दिवस’।

खड़े हुए (बायें से दायें) प्रेमनारायण सेन, प्रगति, सुधीर अग्निहोत्री, डॉ० प्रतिभा सिंह, डॉ० प्रदीप चित्रांशी तथा आलोक चतुर्वेदी।
बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक संस्था ‘सर्जनपीठ’ की ओर से आयोजित ‘हिन्दी-भाषा का वैश्विक स्वरूप’ नामक ‘भाषा-मन्थन’ कार्यक्रम का आयोजन १० जनवरी को ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज में किया गया था, जिसकी अध्यक्षता करते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने कहा, “यह मानना पड़ेगा कि कहीं-न-कहीं अपने में कमज़ोरी है, इसीलिए देशस्तर पर हिन्दी का जितना उत्थान होना चाहिए, नहीं हो पा रहा है। जहाँ तक देशान्तर में हिन्दी की स्थिति का प्रश्न है तो वहाँ हिन्दी की वैश्विक चेतना देखते ही बनती है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा हिन्दी को बनानी की बात की जा रही है, वह कभी नहीं बनेगी।”
एशियाई देशों और यूरोपीय देशों में हिन्दी की स्थिति को शोचनीय बताते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष डॉ० रामकिशोर शर्मा ने बताया,”जिन देशों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार है, उसके पीछे वहाँ की व्यावसायिकता है; क्योंकि बाज़ारवाद के कारण हिन्दी की उपयोगिता है।” उन्होंने विदेशों में भारतीय दूतावासों-द्वारा हिन्दी की की जा रही उपेक्षा को गम्भीर विषय बताया, जिस पर अन्य सहभागी सहमत थे। दूसरी ओर, भारतीय विद्या भवन के निदेशक डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने भारतीय मूल के वहाँ के गिरमिटिया लोग की हिन्दी-चेतना को सराहते हुए बताया, “वहाँ भारतीय मूल के विज्ञानियों के घर में ‘श्री रामचरितमानस’ ग्रन्थ मिल जायेगा। वहाँ के भारतवंशी लोग भक्तिकालीन हिन्दी-कवियों और उनकी रचनाओं को आज भी धारण करते हैं।” वहीं उन्होंने वहाँ की नयी पीढ़ी में हिन्दी के प्रति आ रही उदासीनता का एक शब्दचित्र भी खींचा था। दोहाकार-साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कहा,”आज हमारी हिन्दी की गिनती अँगरेज़ी के प्रभाव के कारण विलुप्ति के कगार पर है।” हेमवतीनन्दन शासकीय परास्नातक महाविद्यालय के पूर्व-प्रधानाचार्य डॉ० विभूराम मिश्र ने चिन्ता व्यक्त की, “वर्तमान शिक्षा नीति के चलते हिन्दी राष्ट्रभाषा और राजभाषा नहीं बन पायेगी। बोली की राजनीति के कारण हिन्दी प्रभावित हो रही है।” वरिष्ठ पत्रकार सुधीर अग्निहोत्री ने कहा, “बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हिन्दी की उपयोगिता को समझ चुकी हैं, इसीलिए उसे ‘प्रचारतन्त्र’ के साथ बढ़ावा दिया जा रहा है।” उच्च न्यायालय, इलाहाबाद की अधिवक्ता डॉ० प्रतिभा सिंह ने बताया,”हिन्दी की दुरवस्था के पीछे हमारी व्यवस्था है। विडम्बना ही है कि आज तक न्यायालय में हिन्दी को घुसने नहीं दिया जा रहा है।” इस आयोजन में ज्योति चित्रांशी और प्रगति सेन की विशेष भूमिका रही। भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने संयोजक सूत्रधार के रूप में भाषा-मन्थन को इस दृष्टि से ऐतिहासिक बना दिया था कि यहाँ पहली बार बुद्धिजीवियों ने ‘गोलमेज भाषा-विमर्श’ में अपनी वैचारिक ओजस्विता का परिचय दिया था।