डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
किसी भी जाति-वर्गादिक को आरक्षण न देकर, ‘आर्थिक स्थिति’ के आधार पर उनकी आर्थिक दशा सरकार सुधारे और उन्हें इस योग्य बनाये कि उनका भविष्य सुखद हो जाये।
आरक्षण से उत्पन्न सामाजिक दुष्प्रभाव का अध्ययन और उसकी समीक्षा कर, उसे पूर्णत: समाप्त करना, अब समय की आवश्यकता है; क्योंकि इस कारण अधिकतर योग्य प्रतिभाएँ दम तोड़ ले रही हैं। जो जातियाँ और वर्ग आरक्षण का लाभ आज़ादी के बाद से पाते आ रहे हैं, उनमें से अधिकतर के घर-परिवार इस स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं कि वे सम्मानपूर्वक जीवन जी सकते हैं और अन्य को सहारा भी दे सकते हैं; परन्तु खेद है कि वे लोग भी ‘आरक्षण की पोटली’ को सीने से चिपकाये हुए हैं, जैसे काँग्रेस का गान्धी-परिवार सत्ता के मोह से स्वयं को अलग नहीं कर पा रहा है; परिणामत: उसी दल के अपेक्षाकृत अधिक योग्य और अनुभवी लोग ‘सत्ता-सुख’ से वंचित रखे जाते रहे हैं।
आरक्षण की उस पोटली पर उन शेष जातियों के लोग का भी हक़ है, जिनकी आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है और जिनकी योग्यता और प्रतिभा को ‘आरक्षण की आग’ में पूर्ववर्ती सरकारों से लेकर वर्तमान सरकार तक निर्लज्जता के साथ मात्र ‘सत्ता की राजनीति’ को कलेजे से लगाते हुए, जलाकर राख बनाती आ रही हैं।
अब पक्षपातपूर्ण आरक्षण के विरुद्ध ‘समग्र आरक्षण-आन्दोलन’ की आवश्यकता है। सत्ताधारी मठाधीश देश को ‘हिन्दू’-‘हिन्दुत्व’, ‘दलित’ तथा ‘अगड़े-पिछड़े’ के नाम से बाँटकर अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं और उन्हीं जातियों-वर्गों का एक समूह ऐसा है, जो उन चतुर-चालाक शातिरों की चाल में आकर अपनी बाज़ी हर बार हारता आ रहा है; फिर भी उसकी आँखें नहीं खुलतीं। अब उन्हें भी ‘समग्र आरक्षण-आन्दोलन’ से जोड़ने की ज़रूरत है।
निस्सन्देह, अब यह विषय नितान्त संवेदनशील बन चुका है। इस पर चिन्तन-अनुचिन्तन कर, देश के विचारक और बुद्धिजीवी अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं करते हैं तो समाज ‘निरापद’ नहीं रह सकेगा और सामाजिक विघटन की प्रक्रिया आरम्भ हो जायेगी। राजनेता कब चेतेंगे?