अपने दिल की कहते जाओ,मेरे दिल की कौन सुनेगा।
कहीं अकेले खो ना जाऊँ, सुनना मेरी मज़बूरी है।
नीचे घासें रौंदी जातीं,
ऊपर मलमल की कालीनें।
भ्रष्टाचार मलाई काटे,
जूते पोंछ रहीं तालीमें।
अंदर-अंदर धधक रहा हूँ,कौन हमारी तपिश सहेगा।
बुझी राख की हूँ चिंगारी, जलना मेरी मज़बूरी है।
कलियाँ पड़ी हुई मुरझाई,
काँटे सीना तान खड़े हैं।
नदियों के पट जीर्ण हो गये,
पर्वत के भी पीर बड़े हैं।
भीतर-भीतर सिसक रहा हूँ, कौन हमारे अश्रु पियेगा।
दबी हुई भीषण जलधारा, बहना मेरी मज़बूरी है।
ऊँचे-ऊँचे दरबारों में,
लिक्खे जाते भाग्य सुनहरे।
चीख हमारी दब जायेगी;
चित्रगुप्त रहते हैं बहरे।
सुन्दर नहीं हमारा तन है,कौन हमारा मौन पढ़ेगा।
भाव-शून्य होना ना अच्छा,लिखना मेरी मज़बूरी है।

©जगन्नाथ शुक्ल…✍️
(प्रयागराज)