‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान में ‘हिन्दीपत्रकारिता-दिवस’ के अवसर पर ३० मई को ‘इलाहाबाद की पत्रकारिता : कल, आज और कल’ विषय पर एक आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।
संवाद-समारोह की अध्यक्षता करते हुए, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने कहा, “इलाहाबाद की पत्रकारिता आज़ादी के पहले से ही अपनी पहचान बनाये हुए है। यहाँ देश के जाने-माने साहित्यकार सम्पादक के रूप में अपना योगदान करते आये हैं। महामना मदनमोहन मालवीय, बालकृष्ण भट्ट, रामरिख सहगल, देवकीनन्दन त्रिपाठी, पं० सुन्दरलाल, महावीर प्रसाद द्विवेदी आदिक की इलाहाबाद की हिन्दी-पत्रकारिता को समृद्ध करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इलाहाबाद की पत्रकारिता बहुत समृद्ध रही है। उसका वर्तमान सुखद है और भविष्य समाज को आश्वस्त करता है।”
मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर श्रीवास्तव ने बताया, ”स्वतन्त्रता संग्राम या एक दो अवसरों को छोड़ दें तो शायद पत्रकारिता की दिशा और दशा कभी सुनिश्चित रही हो। आज पत्रकारिता की जो दशा है, उसपर मैं कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ; क्योंकि मैं ही नहीं, अपितु सभी इसमें हिस्सेदार हैं। हाँ, पत्रकारिता की दिशा उन्नयन की ओर है; वह चाहे जिस भी क्षेत्र में हों; क्योंकि आज माध्यम (मीडिया) की गति अति तीव्र है। इलाहाबाद की पत्रकारिता ने आज़ादी और भाषा के लिए जो संघर्ष किया है, उस पर आज चिन्तन-मनन करने की आवश्यकता है।”
परिसंवाद-आयोजक भाषाविद् और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “इलाहाबाद के पत्रकारों ने देश के विभिन्न राज्यों में जाकर अपनी कौशल और प्रतिभा का जिस रूप में प्रदर्शन किया था और कर रहे हैं, उससे इलाहाबाद की सारस्वत महत्ता रेखांकित होती आ रही है। हम यदि यह कहें कि इलाहाबाद देश की पत्रकारीय धारा का मूल स्रोत रहा है तो इसे वक्रोक्ति नहीं माना जाना चाहिए। इतिहास के पन्ने पलटे जायें तो सुस्पष्ट हो जायेगा कि इलाहाबाद से ही सर्वाधिक समाचारपत्र-पत्रिकाओं का मुद्रण होता था। आज का समय और पत्रकारिता का स्वभाव ऐसा बनाया जा चुका है कि एक पत्रकार अपने मन-मस्तिष्क का आंशिक जुड़ाव ही पाता है, जो कि विचारणीय है।”
साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी का विचार था, “२ जनवरी, १८६५ को सरकारी सूचनाएँ और समाचार प्रकाशित करनेवाले सरकारी पत्र ‘पायनियर के श्री गणेश से वर्तमान में प्रकाशित समाचारपत्रों की गुणवत्ता में ज़मीनी स्तर पर समयानुसार बदलाव देखने को मिलते हैं। जहाँ एक ओर पायनियर का उद्देश्य मात्र सरकारी नीतियों को घर-घर पहुँचाना था, वहीं इसकी प्रतिक्रिया में अभिव्यक्ति के आजादी-हेतु हिन्दी और अँगरेज़ी में समाचारपत्र प्रकाशित हुए। उस काल में पत्रकारिता देश और लोकहित-हेतु समर्पित थी। बालकृष्ण भट्ट ने कहा था,” पत्रकारिता को पूँजी नहीं, अभिव्यक्ति से मतलब होना चाहिए। डरा हुआ मीडिया, डरा हुआ समाज पैदा करता है।”
शायद आजकल मँहगाई से परेशान होकर या भौतिकता की दौड़ में शामिल होकर कुछ पत्रकार, पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ‘पत्रकारिता जनचेतना करने का साधन मात्र है’ से भटक गये हैं।”
एक दैनिक समाचारपत्र की पूर्व-साहित्य-सम्पादक उर्वशी उपाध्याय ने इलाहाबाद की साहित्यिक पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए कहा, “पत्रकारिता ने हिन्दी-साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया। मुंशी प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पन्त-जैसे अनेक नाम, जो घर-घर तक पहुँचे, उसका श्रेय हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को जाता है, जिसका केन्द्र इलाहाबाद रहा। १८७७ ई० में पण्डित बालकृष्ण भट्ट की ‘हिन्दी प्रदीप’ नामक पत्रिका से यह यात्रा आरम्भ होती है। ‘सरस्वती’ ने साहित्यिक पत्रकारिता को एक मजबूत पहचान देते हुए, अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों को जन-जन तक पहुँचाया। आज भी हिन्दी- साहित्य और पत्रकारिता एक- दूसरे के पर्याय है। पत्रकारिता ने हिन्दीभाषा को भी समृद्ध किया है। वर्तमान पत्रकारिता में भाषा को समृद्ध करते लेख अख़बारों और आन्तर्जालिक माध्यम से ज्ञानवर्द्धन करते हैं। यद्यपि ख़रीद कर पढ़ने की आदत कुछ कम अवश्य हुई है; परन्तु साहित्यिक गतिविधियाँ पत्रकारिता के माध्यम से जन-जन तक अनवरत पहुँचती रहेंगी।”
अन्त में, आयोजक ने समस्त सहभागियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की थी।