● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
संविधान के जिस प्रविधान के अन्तर्गत कतिपय जातियों और वर्गों को एक सीमित अवधि के लिए ‘विशेष’ प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी, उसे अभी तक समाप्त क्यों नहीं किया गया? वैसे आरक्षित जन को वर्षों से ‘मत के लोलुप’ अकर्मण्य राजनीतिक दलों-द्वारा ‘आरक्षण के गोलगप्पे’ क्यों खिलाये जा रहे हैं, उसका अन्त क्यों नहीं होता? देश से जातिप्रथा समाप्त कर सभी को एक दृष्टि से क्यों नहीं देखा जाता? हमारे देश मे आज़ादी पाने के बाद से लगातार किसी-न-किसी विषय पर धरना-प्रदर्शन, आन्दोलन आदिक किये जाते रहे हैं; परन्तु आज तक एक भी ऐसा तबका अथवा संघटन सामने नहीं आया, जिसने अपनी आवाज़ बलन्द की हो– देश से जातिप्रथा समाप्त करो।
कुछ ‘ब्राह्मणवाद’, ‘क्षत्रियवाद’, ‘कायस्थवाद’, ‘चमार-पासी-खटिक-डोम-हलखोर-दुसाध’, ‘यादव-काछी-कुर्मीवाद’ तथा अन्य वादों के परचम लहराते हुए दिख रहे हैं तो कुछ ‘हिन्दूराष्ट्र’, ‘मुस्लिमराष्ट्र’, ‘ईसाईराष्ट्र’, ‘बौद्धराष्ट्र’ आदिक तरह-तरह के राष्ट्रों मे भारतराष्ट्र को विभाजित करने का षड्यन्त्र रचते आ रहे हैं।
हमने पिछले ही दिनो सिर पर नाचता जातीयता का भूत देख लिया था। संघ लोक सेवा आयोग का परीक्षा-परिणाम घोषित होते ही जातीयसूचक नामों को घेरकर कोई ब्राह्मणवाद, कोई क्षत्रियवाद, कोई यादववाद तो कोई दलितवाद की ‘टेम्पो हाई’ कर रहा था। ऐसे लोग स्वयं तो कक्षा १० उत्तीर्ण करने की क्षमता नहीं रखते; मगर जातीयता का ज़ह्र (‘ज़हर’ अशुद्ध है।) उगलने मे शीर्ष पर दिखते रहे हैं।
सच तो यह है कि आज भारतराष्ट्र को समग्र रूप मे संकट के कगार पर खड़ा कर दिया गया है और यह विशेष रूप से उन लोग की देन है, जो वर्ष २०१४ से पहले भारत को ग़ुलाम देश के रूप मे मानते आये हैं। कटु सत्य यह है कि वर्ष २०१४ से पहले भारत मे धर्म, मज़्हब, सम्प्रदाय, पन्थ, जाति तथा वर्ग को लेकर इतनी भयावह स्थिति कभी नहीं थी। आज तो पग-पग पर भारतराष्ट्र के प्रगतिपथ पर व्यवधान के इतने कष्टकारक कण्ट बिछा दिये गये गये हैं कि हमारी राष्ट्रीयता अवाक् बनकर रह गयी है। इसके पीछे मात्र एक उद्देश्य है, ‘हमारी सत्ता निष्कंटक बनी रहे’। हम-आप सभी जानते हैं, ऐसी ‘साध’ कभी पूरी नहीं होती, जबकि ‘उम्र’ पूरी हो जाती है।
आरक्षण की चाल और जाल मे देश की जनता को फँसाकर शातिर लोग ‘माल’ काट रहे हैं।
पहली बात, किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं होना चाहिए और यदि होता भी है तो उसका आधार ‘आर्थिक स्थिति’ हो, ताकि सभी को समान रूप से उसका यथोचित लाभ प्राप्त हो सके। दूसरी बात, समाज को जिन घृणित स्वार्थियों ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, पिछड़ा वर्ग, जनजातीय, वनीय, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक इत्यादिक वर्गों में बाँट रखे हैं, उन सबको समाप्त कर देना चाहिए; क्योंकि इन सारे कृत्यों से समाज को कई ख़ानों में विभाजित होकर, इतना दुर्बल कर दिया गया है कि सामाजिक अखण्डता, अक्षुण्णता तथा एकता पनप नहीं पा रही है। अँगरेज़ों की कूटनीतिक चाल ‘बाँटो और शासन करो’ के अन्तर्गत ये सारी कुव्यवस्था तैयार की-करायी गयी है, जो साफ़ दिख रही है।
अफ़्सोस! देश का नागरिक इसे समझने का प्रयास नहीं कर पा रहा है; उसके विवेक को सम्मोहन-पाश मे निबद्ध कर लिया गया है; इसीलिए ‘व्यक्तिपूजा’ करायी जा रही है और वह अन्ध तन-मन से करता आ रहा है। इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि अशिक्षित, ढोंगी तथा पाखण्डी लोग अपने इशारों पढ़ीलिखी जनता को नचाते आ रहे हैं और वह जनता बिना उसके निहितार्थ को समझे-परखे सम्मोहित होकर नाचती आ रही है।
आरक्षण और समाज-विभाजन के नाम पर हमारे देश के सारे ग़द्दार नेता हमे आपस में लड़वा रहे हैं और हमारे सारे अधिकारों का दोहन करते हुए, सपरिवार ऐश कर रहे हैं। उसके बाद भी ऐसे राष्ट्र और समाजद्रोहियों का हमारा समाज ‘महिमा-मण्डन’ कर रहा है। खेद है! देश की जनता की आँखें अभी खुल नहीं पा रही हैं; और जब खुलेंगी तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
ऐसा घृणित कृत्य आज़ादी के बाद से पहली बार लगातार किया जा रहा है।
‘सत्ता की भूख’ अफ़ीम से भी अधिक मादक होती है। एक बार स्वाद क्या मिला, वज्र बेहया ‘राजनीति’ ‘रखैल’ बन जाती है; एक नहीं, न जाने कितनों की। राजनीति योग्यता नहीं देखती; जो भी सत्ता से सम्बद्ध हो जाता है, राजनीति उसके साथ लिपट जाती है और कुकर्मो से मण्डित करके ही छोड़ती है। कुछ ही चतुर-सुजान होते हैं, जो उसका उपभोग कर अलग हो आते हैं; परन्तु अधिकतर ऐसे होते हैं, जो राजनीति के इशारे पर किसी भी सीमा तक गिरने के लिए प्रस्तुत रहते हैं। वर्तमान दौर मे उसी प्रकार की राजनीति दिख रही है।
पहले की राजनीति मे ‘अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक’ का खुला खेल होता था और अब ‘दलित बनाम शेष भारत’ का अलोकतन्त्रीय रस्साकशी की जा रही है। अफ़्सोस! सभी राजनीतिक दल के महन्त ‘दलित-आकर्षण की डोर मे बँधे चले आ रहे हैं और प्रत्येक स्तर पर ‘सरकारी दलितों’ के लिए ‘आरक्षण’ की व्यवस्था कर, शेष भारतीय नागरिकों के हितों पर कठोर आघात करते हुए, “रँगे हाथ” पकड़े जा रहे हैं; परन्तु बेदाग़ बाइज़्ज़्त बरी हो जाते हैं। यही कारण है कि आज देश का एक-एक राजनेता ‘मनबढ़’ हो चुका है।
अब समय आ चुका है, एक ऐसे सामाजिक संघटन और राजनैतिक दल गठित करने का, जो आरक्षण की राजनीति कर रहे सभी राजनीतिक दलों को दुर्धर्ष चुनौती दे सके।
आरक्षण के पक्षधर उत्तर दो :–
देश के कथित दलित-पतित-वंचित-शोषित जातिवाले राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति, राज्यपालों, मुख्यमन्त्रियों, मन्त्रियों, सांसदों, विधायकों, साधु-संतों-मठाधीशों, आई० ए० एस०, आई० पी० एस०, आई० एफ० एस०, पी० सी० एस०, इसी तरह के अनेक पदीय अधिकारी, धन्ना सेठों, सरकारी डॉक्टरों, ‘ए’ ग्रेड, ‘बी’ ग्रेड के अधिकारियों आदिक के परिवारों को आरक्षण मिलना चाहिए? ऐसे सभी लोग स्वत: ‘आरक्षण का लाभ’ छोड़ने की घोषणा करने से पीछे क्यों हट रहे हैं?
बेशक, बिना किसी पक्षपात के समाज के प्रत्येक उस वर्ग की हर प्रकार की सहायता की जानी चाहिए, जिसके परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति शोचनीय (‘सोचनीय’ अशुद्ध है।) वैसे परिवार के बच्चों को शिक्षास्तर पर सारी सुविधाएँ निश्शुल्क प्रदान की जानी चाहिए, ताकि वे बिना किसी बैसाखी के अपना भविष्य उन्नत कर सकें। केन्द्र और राज्य की सरकारें अपना ‘वोट-बैंक’ बढ़ाने के लिए संवैधानिक सीमा का अतिक्रमण करते हुए, तरह-तरह की जातियों-उपजातियों की खोजकर आरक्षण का घातक खेल खेल रही हैं, उससे भारतीय समाज मे वैमनस्य का वातावरण उत्पन्न हो रहा है, जो देशहित मे कदापि नहीं दिखता। ‘प्रतिभा-पलायन’ इसी का दुष्परिणाम रहा है। यह कैसी व्यवस्था और नीति कि कोई ५ प्रतिशत अंक पाकर चयनित हो जाता है और किसी को ८० प्रतिशत प्राप्त करने के बाद भी चयन से वंचित रखा जाता है।
अब इस सच्चाई को समझें।
केन्द्र-सरकार के द्वारा वित्त-पोषित उच्च शिक्षण-संस्थानो मे उपलब्ध सीटों मे से २२.५ प्रतिशत अनुसूचित जाति (एस० सी०) और अनुसूचित जनजाति (एस० टी०) के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित है, जिनमे से १५ प्रतिशत एस० सी० और ७.५ प्रतिशत एस० टी० के हिस्से मे आते हैं। ई० एस० सी० के लिए २० प्रतिशत, एस० सी० ए० के लिए १२ प्रतिशत, एस० सी० बी० के लिए १६ प्रतिशत, एस० सी० सी० के लिए २२ प्रतिशत तथा एस० सी० डी० के लिए १८ प्रतिशत का आरक्षण किया गया है। अब आते हैं, ओ० बी० सी० आरक्षण की ओर तो उसके लिए अतिरिक्त २७ प्रतिशत का आरक्षण शामिल करके इस आरक्षण को ४९.५ प्रतिशत कर दिया गया है। कुछ राज्यों और केन्द्र-शासित क्षेत्रों मे महिलाओं के लिए ५ से ३३.३३ प्रतिशत तक आरक्षण की व्यवस्था है। इतना ही नहीं, वर्ष २०१९ मे १०३वें संविधान-संशोधन के द्वारा ई० डब्ल्यू० एस० के लिए १० प्रतिशत अलग से आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी। इस प्रकार केन्द्रस्तर पर आरक्षण की सीमा ६० प्रतिशत हो चुकी है। इस तरह से आरक्षण के मकड़जाल मे देश के मेधावी विद्यार्थियों को इस तरह से जकड़ लिया गया है कि वे फड़फड़ा भी नहीं पा रहे हैं।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जे० बी० पारदीवाला का वह फ़ैस्ला (‘फ़ैसला’ अशुद्ध है।), जिसमे उन्होंने ई० डब्ल्यू० एस० आरक्षण पर कहा था, इस प्रकार है :–
“डॉ० भीमराव आम्बेडकर का विचार महज़ १० सालों के लिए आरक्षण लागू करके सामाजिक सौहार्द लाने का था; लेकिन वह पिछले सात दशक (‘दशकों’ अशुद्ध है; क्योंकि यह दस वर्षों का समूह है।) से जारी है। आरक्षण अनन्तकाल तक जारी नहीं रहना चाहिए और अगर ऐसा होता है तो वह निजी स्वार्थ है।” किसी भी स्तर की प्रवेशपरीक्षा, परीक्षण, मूल्यांकन, सेवा, पदोन्नति आदिक मे सभी के साथ समान रूप से व्यवहार करना होगा।
हमारे देश मे सत्ताधारी नेता जातीय आधार बनाकर जो खेला कर रहे हैं, वह निस्सन्देह, एक दिन वर्गसंघर्ष को जन्म देगा, फिर इसके कप्तान, खेलाड़ी तथा निर्णायकों के पास भागने की गुंजाइश भी नहीं बचेगी; क्योंकि महर्षि वाल्मीकि का यह कथन भारत की सड़क से संसद् तक चरितार्थ होता दिखेगा और दसों दिशाओं मे गूँजता हुआ भी तथा ग़ुलाम समाचार-चैनल और समाचारपत्र भी उसे दिखाने के लिए बाध्य और विवश हो जायेंगे :– “बुभुक्षित: किं न करोति पापं” (भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं करता।); अर्थात् भूखा व्यक्ति जीवनरक्षा के लिए हर तरह का पाप कर सकता है। ऐसे अन्यायियों को पीड़ितों का एक बहुत बड़ा समुदाय ऐसी सीख सिखायेगा कि उनकी भावी पीढ़ी ‘राजनीति’ का नाम सुनते ही ‘तौबा-तौबा’ करने लगेगी।
हम आये-दिन देख रहे हैं कि देश के राजनेता सिर्फ़ सत्ता पाने के लिए और सत्ता को बनाये रखने के लिए कैसे-कैसे विषैले बोल बोल रहे हैं; एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किस-किस प्रकार की साज़िश रच रहे हैं; बेहद पाप-पंक मे नाक तक गिरकर एक-दूसरे के साथ नितान्त निर्लज्जतापूर्वक गुत्थम-गुत्था करते आ रहे हैं; चड्ढी तक फट जाती है; गुप्तांग तक दिखने लगते हैं, अफ़्सोस! चेहरे पर शर्मिन्दगी का पसीना तक नहीं दिखता।
वास्तव मे, ये सारे कृत्य घोर चरित्रहीनता के प्रमाण हैं।
आज इस बात की परम आवश्यकता है कि देश के समस्त नागरिक समदर्शिता के साथ एक-दूसरे के साथ मिलकर समवेत निनाद करें :– जातिवाद का विनाश हो! मनुष्यता का शंखनाद हो। समाज को बाँटनेवालों का सर्वनाश हो!
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ मई, २०२३ ईसवी।)