डॉ० राजकुमार शर्मा मे मिट्टी से ‘माधव’ बनाने की क्षमता थी

अखिल भारतीय हिन्दीसेवी संस्थान के प्रमुख एवं साहित्यकार, दारागंज, प्रयागराजवासी डॉ० राजकुमार शर्मा की गंगातट, प्रयागराज-स्थित श्मशान घाट पर २९ जनवरी को अन्त्येष्टि-क्रिया की गयी। मुखाग्नि उनके पुत्र मधुकर मिश्र ने दी थी।

इसी अवसर पर श्मशानघाट, दारागंज, प्रयागराज मे एक शोकसभा का आयोजन किया गया था, जिसमे नगर के प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं अन्य बुद्धिजीवी-वर्ग की उपस्थिति थी।

डॉ० अवधेश अग्निहोत्री ने कहा– मै शर्मा जी के परिवार से १९६६ से जुड़ गया था। वे ऐसे व्यक्ति थे, जो सबके हृदय मे बस जाते थे। वे प्रेरणा देते थे। वे मिट्टी से ‘माधव’ बनाने की क्षमता रखते थे।

डॉ० वीरेन्द्र तिवारी– उनकी साहित्य-जगत् मे भीष्म पितामह की भूमिका थी। छोटे रचनाकारों को समुचित स्थान देते थे।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– डॉ० शर्मा जी, डॉ० मुरलीमनोहर जोशी जी तथा मेरे बाबू जी घनिष्ठ मित्र थे। डॉ० शर्मा जी उनसे सम्बन्धित अनेक शैक्षिक संस्मरण सुनाया करते थे, जो मेरे लिए अनसुनी थी। डॉ० शर्मा जी एक जीवन्त पुरुष थे। उनके पास छोटे-बड़े रचनाकारों को साथ मे लेकर चलने की अनुकरणीय कला थी; क्योंकि वे स्वयं मे एक चलती-फिरती संस्था थे।

विनायक शर्मा– मेरे शैक्षिक विकास मे उनकी महती भूमिका थी। वे मेरे परिवार से जुड़े हुए थे।

शिवराम उपाध्याय ‘मुकुल’– उनके न रहने से साहित्य-जगत् को अपूरणीय क्षति हुई है।

व्रतशील शर्मा– उनको हरदम साइकिल से चलते देखा। वे जो सोच लेते थे, करके दिखाते थे।

डॉ० प्रमोद शुक्ल ने स्वयं से जुड़ा एक संस्मरण सुनाया, जिसका सार था– पैसा न रहे तो भी आनन्द से जिओ।

सुधीर द्विवेदी– वे अनोखे व्यक्ति थे।

राजेद्रकुमार तिवारी ‘दुकान जी’– इस शोकभा मे जितने भी प्रबुद्धजन आये हैं, वह उन्हीं के प्रताप का प्रभाव है।

डॉ० शम्भुनाथ त्रिपाठी ‘अंशुल’ ने संचालन करते हुए कहा– डॉ० शर्मा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो सबमे घुल-मिल जाते थे। अपने त्रिवेणी प्रकाशन, अपनी संस्था तथा अन्य संस्थाओं के माध्यम से देश-देशान्तर के साहित्यकारों को सम्मानित कर, उन्होंने अपनी सदाशयता का परिचय दिया था।

इस अवसर पर डॉ० राजकुमार शर्मा की बहुविध समर्थ पुत्रियों– कुमकुम शर्मा, ऋचा शर्मा तथा ऋतु शर्मा की मौन उपस्थिति थी।