तत्सम, तद्भव, देशज तथा विदेशज शब्दावली का मनोहारी दर्शन तुम कौन हो?

July 10, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मैं अपलक उसे निहार रहा था। राजहंस-सा गौर वर्ण, द्रुत विलम्बित-सी गति, अभिधावाणी, उपनागरिका वृत्ति-सी प्रकृति, प्रसाद गुण-सा शील, मासूम चेहरे पर खिलता श्रृंगार-रस, अंग-अंग से फूटता हुआ शब्दालंकार। उसने कुछ कहा […]

‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ : उच्चारण और लेखनगत अनुशासन

July 8, 2018 0

” लम्हों ने ख़ता की, सदियों ने सज़ा पायी” शताब्दियों से हमारे विद्वज्जन, शिक्षकवर्ग लेखकगण, विद्यार्थीवृन्द इत्यादिक उच्चारण और लेखनगत अनुशासन की अवहेलना करते आ रहे हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है; कारण कि अधिकतर […]

आइए! ‘भाषिक क्रान्ति’ की दिशा में हम-आप एक पग बढ़ायें।

June 28, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आप यदि किसी के भी सम्प्रेषण में अंकित अशुद्धि/अशुद्धियों के प्रति विश्वस्त हैं तो उसे सुस्पष्ट सचेत कीजिए। उस व्यक्ति को बुरा लगेगा; दोनों के सम्बन्धों में कटुता आयेगी; सम्बन्ध विच्छेद हो […]

वाक्य-संरचना में ‘पूर्ण विराम’ का महत्त्व समझें और मनोरंजन करें

June 20, 2018 0

प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ‘भाषा-परिष्कार-समिति’ केन्द्रीय कार्यालय, इलाहाबाद यह घटना बलिया ज़िले की है। गाँव ‘रतनपुरा’ है। एक कार्यक्रम के दौरान एक महिला मुझसे मिली थी। वह अर्द्ध-शिक्षिता थी। उसका पति झारखण्ड में कोयलरी (कोयला-कारख़ाना) […]

‘डॉ पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ में ‘अरबी-फ़ारसी’ शब्दों का शुद्ध प्रयोग करना सीखें

June 19, 2018 0

आज हम लीक से हटकर उस मार्ग पर चलेंगे, जिस पर चलने का साहस हमारे ‘विद्वज्जन’ नहीं कर पाते हैं; और वह मार्ग है, ‘विलक्षण ज्ञानमार्ग’। हम जब ‘अरबी-फ़ारसी’ भाषाओं पर दृष्टि निक्षेपित करते हैं […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ – ‘अन्त:स्थ’ और ‘अन्तस्थ’

June 9, 2018 0

वर्णमाला के अन्तर्गत जिन य, र, ल, व के समुच्चय को ‘अन्त:स्थ’ कहा जाता है, (अधिकतर पुस्तकों में ‘अन्त:स्थ’ के स्थान पर ‘अन्तस्थ’ का प्रयोग किया गया है, जो अशुद्ध है।) उनमें में से दो […]

०भाषा-विमर्श० – ‘प्रतीक-योजना’ क्या है?

June 9, 2018 0

‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ मानवीय चेतना की विकास-गाथा में प्रतीकों की विशिष्ट भूमिका रही है। संकल्प-विकल्पात्मक मन की यह प्रथा है कि वह विभाजित सत्यों को चित्रित-प्रतीकित करने की कामना करता है। आदिम युग […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला – आरम्भ-प्रारम्भ-समारम्भ-परिरम्भ

May 19, 2018 0

आरम्भ– किसी भी कार्य की प्रथम अवस्था का अनुष्ठान अथवा सम्पादन ‘आरम्भ’ है। दूसरे शब्दों में— कोई भी कार्य जब पहली बार किया जाता है तब उसे ‘आरम्भ’ कहा जाता है। अब ‘आरम्भ’ शब्द-संरचना पर […]

समीक्षा-अधिकारी परीक्षा’ के ‘सामान्य हिन्दी’ प्रश्नपत्र का परीक्षण और समीक्षण :-

April 14, 2018 0

‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की प्रायोगिक पाठशाला’ आश्चर्य है, सामान्य हिन्दी/हिन्दी-भाषा के प्रश्नपत्र के अन्तर्गत किये गये प्रश्नों में ‘प्राश्निक’ (प्रश्नपत्र तैयार करनेवाला) ने व्याकरणिक अनुशासन की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। इससे सुस्पष्ट हो जाता है […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ से —-०समीक्ष्य विचार-बिन्दु०—- ‘आलोचना’ क्या है?

April 1, 2018 0

आज साहित्य में आलोचना के नाम पर जो कृत्य किये किये जा रहे हैं, वे नितान्त निन्दनीय हैं, कारण कि जो स्वयम्भू आलोचक हैं, वे तटस्थ लोचनधर्मी हैं ही नहीं। ऐसा इसलिए कि तथाकथित साहित्यकार, […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला – विचार, चिन्तन-अनुचिन्तन, ध्यान, ख़याल, भाव, मनन, स्मरण

March 17, 2018 0

विचार :– यह संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग-शब्द है। शब्द-भेद की दृष्टि से यह संज्ञा-शब्द है। विचार में ‘वि’ उपसर्ग लगा हुआ है। वि का अर्थ ‘विशिष्ट’ है। यह ‘चर्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘चलना’ […]

चेन्नै एषुंबूर’ और ‘चेन्नै एग्मोर’ का रहस्यवाद

March 12, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इस समय मैं चेन्नै (तमिलनाडु) से इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) के लिए प्रस्थान कर चुका हूँ। एक स्टेशन है, जहाँ हिन्दी में ‘चेन्नै एषुंबूर’ लिखा है और अँगरेज़ी में ‘चेन्नै एग्मोर’ (Chennai Egmore)। मैं […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला — नारी, महिला, स्त्री, औरत, वामा

March 9, 2018 0

प्राय: हमारे विद्वज्जन नारी, महिला, स्त्री, औरत तथा वामा में अन्तर नहीं कर पाते और अपनी रचनाओं में स्वच्छन्द रूप में इनका प्रयोग करते आ रहे हैं। इतना ही नहीं, प्रसिद्ध पुस्तकों, ग्रन्थादिक में भी […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला – गोष्ठी-संगोष्ठी, चर्चा-परिचर्चा, वार्त्ता, संवाद-परिसंवाद

March 7, 2018 0

‘गोष्ठी’ संस्कृत का स्त्रीलिंग संज्ञा-शब्द है। इस शब्द की रचना ‘गोष्ठ’ शब्द से हुई है। ‘गोष्ठ’ संस्कृत-भाषा का ‘पुल्लिंग’ (पुंलिंग) शब्द है। ‘गो’ शब्द में ‘स्था’ धातु है, जिसका अर्थ ‘ठहरना’ है। इस धातु के […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में अनुराग-आसक्ति, प्रेम, प्रीति (प्यार), मोह-व्यामोह, स्नेह, प्रणय सद्भाव

March 2, 2018 0

अनुराग-आसक्ति :— आइए! पहले ‘अनुराग’ शब्द की व्युत्पत्ति को समझें :— यह संस्कृत का पुल्लिंग-शब्द है। इसमें ‘अनु’ उपसर्ग है और ‘रञ्ज्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय प्रयुक्त कर, ‘राग’ का सर्जन किया गया है। रञ्ज् […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में जानिए आरोपी-आरोपित का सही प्रयोग

March 1, 2018 0

दीर्घ काल से ‘आरोपी’ शब्द-प्रयोग का प्रचलन है। यह प्रयोगधर्मिता अब एक ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती है, जहाँ एक भेड़ के पीछे अरबों-खरबों की संख्या में भेड़ों का झुण्ड बिना जाने-समझे चला जा रहा है। […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला — तीन

February 25, 2018 0

रंग-विरंगा-रंग-बिरंगा/ रंगविरंगा-रंगबिरंगा यहाँ पर दो शब्द हैं, जो मिलकर ‘विशेषण’ नामक शब्दभेद का बोध कराते हैं। प्रायः प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक मनुष्य-द्वारा ‘रंग-बिरंगा’ शब्द का लेखन और उच्चारण किया जाता है और अधिकतर पुस्तकों में […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला – दो : आरम्भ-प्रारम्भ-समारम्भ

February 24, 2018 0

किसी भी कार्य की प्रथम अवस्था का अनुष्ठान अथवा सम्पादन ‘आरम्भ’ है। दूसरे शब्दों में— कोई भी कार्य जब पहली बार किया जाता है तब उसे ‘आरम्भ’ कहा जाता है। अब ‘आरम्भ’ शब्द-संरचना पर हम […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला : एक

February 23, 2018 0

आरती :– यह स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका अर्थ है, किसी मूर्ति के चारों ओर सामने से दीपक को घुमाना। आरती किसी व्यक्ति -विशेष की नहीं की जाती प्रत्युत देवि-देव-विशेष की जाती है | शुद्ध अर्थात् […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला : सौन्दर्य और सौन्दर्य-बोध की अवधारणा

February 22, 2018 0

भाषा व्यक्तित्व को निखारती है और उसमें एक सुखद आकर्षण पैदा करती है। आइए, और अपने व्यक्तित्व को सँवारिए ! सौन्दर्य और सौन्दर्य-बोध की अवधारणा :— कोई भी कविता ‘सुन्दर’ अथवा ‘nice’, ‘beautiful’, ‘great’ नहीं […]

एक-से-बढ़कर-एक ‘अमूल्य रत्न’ के रूप में मेरे शिष्य!

December 29, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डे- इस मुक्त मीडिया के माध्यम से उन उदित-नवोदित, विकसित-विकासमान् हस्ताक्षरों की सर्जन प्रातिभ सामर्थ्य से जब साक्षात् करता हूँ, जो प्रकारान्तर से मेरे शिष्य रहे हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है, मानो […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला : शब्द-अर्थ-प्रयोग और पुनरुक्ति-दोष

December 26, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- १- अपना स्वार्थ : स्व+अर्थ = स्वार्थ। ‘स्व’ का अर्थ है, ‘अपना’ और ‘स्व’ से पहले ‘अपना’ का प्रयोग हुआ है। ऐसे में, ‘अपना’ शब्द का दो बार प्रयोग ‘पुनरुक्ति-दोष’ के अन्तर्गत […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में शब्द-विचार

December 20, 2017 0

 डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ज़िम्म:दार-ज़िम्म:वार :– सही शब्द ‘ज़िम्म:दार’ और ‘ज़िम्म:वार’ है। अब प्रयोग के धरातल पर वही ‘जिम्मेदार’ और ‘जिम्मेवार’ बन गया है। दोनों ही ‘अरबी’ शब्द हैं | दोनों का एक ही अर्थ है। […]

भाषा-विमर्श : शब्द-अर्थ-प्रयोग पर व्याकरणाचार्य मौन क्यों ?

December 18, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – शब्द-अर्थ-प्रयोग-विडम्बना :—- शोध का विषय है। आत्मा : ‘आत्मा’ को स्त्रीलिंग में प्रयोग किया जाता है। परमात्मा : ‘परमात्मा’ को पुल्लिंग (पुंलिंग) में प्रयोग किया जाता है। इस शब्द में भी […]

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में ‘विराम चिह्नों का प्रयोग’

December 5, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- वाक्य में स्पष्टता लाने के लिए, अर्थात् भाव का अर्थ प्रकट करने के लिए विराम चिह्नों का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। किसी भी विराम चिह्न की स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती। नीचे […]

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