ग़ज़ल : मैने देखा खून आज राह मे गिरा हुआ

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’– 


मैने देखा ख़ून आज

राह में गिरा हुआ,

पूछा ख़ून किसका है

कोई तो बताइए?

क्या हुआ जो आप सब

क्रोध में उबल रहे?

व्यर्थ ही सामर्थ्य आप

ऐसे ना जलाइये।

ख़ून कौन हिन्दू है

कौन ख़ून मुसलमान?

सिखों का है ख़ून कौन

आइये बताइए?

जाति-पाँति, भेद-भाव

सियासती उसूल हैं,

नफरतों के बीज यूं

न घर-घर गिराइये।

गुरुद्वारा मस्ज़िद बुतखाना

सब मे ही रब बैठा है,

ना देवालय नापाक करो

ना इनका मान गिराइये ।

चाहें जाओ काबा यारो

चाहे जाओ काशी,

जो मन मैला तो कहीं कुछ नहीं,

मन का मैल मिटाइये ।

रहमान वही है राम वही,

वो जग का पालनहारा है,

कायनात को उसकी जबरन

दोज़क नहीं बनाइये ।

इन्सान हो दिलवाले हो

नफ़रत में क्या रखा हुआ,

ख़ून एक सा, जिस्म एक सा

दिल भी एक बनाइए ।

मैने देखा ख़ून आज

राह मुझे गिरा हुआ,

पूछा ख़ून किसका है

कोई तो बताइये?