ख़ैरातख़ान: खोलता, कुछ लोग के लिए

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ख़ैरातभरी झोली, कुछ लोग के लिए,
शातिर दिमाग़-खोली, कुछ लोग के लिए।
बन्दिश मे दिख रही, हर साँस अब यहाँ,
दी जाती 'ऑक्सीजन', कुछ लोग के लिए।
कैसे कह दें हम उसे, वह पाक-साफ़ है,
ख़ैरातख़ान: खोलता, कुछ लोग के लिए।
ज़लाक़त१ के मुआमले२ मे, तेज़नज़र वह,
दिखता है तंगख़याली, कुछ लोग के लिए।
तंगनज़री कर रही है, तंगे हाल मुल्क का,
तंगसार३ है दिख रहा, कुछ लोग के लिए।
तंज़ीयात४ मे माहिर, यह दुनिया जानती,
चहेता बन गया है, कुछ लोग के लिए।
ख़ौफ़ मे हर शख़्स, जो ख़ौफ़ पी रहा, 
ज़ह्र घोलता अवाम मे, कुछ लोग के लिए।

शब्दार्थ :― १वाक्पटुता २विषय ३ अल्पबुद्धियुक्त ४व्यंग्यात्मक बात

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ फ़रवरी, २०२३ ईसवी।)