ग्रामीण पत्रकारों के दिन कब बहुरेंगें ?

  सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’

अखबार बेंचो, खबर लिखो और विज्ञापन तलाशो ! इस तरह ग्रामीण पत्रकारों की जीवन शैली कब तक चलती रहेगी ? वैसे तो यह आम बात है लेकिन आखिर कब तक यह रूटीन वर्क चलता रहेगा ?

क्या कभी ऐसा दिन भी आएगा जब इनकी मूलभूत जरूरतों को लेकर संस्थान और सरकार विचार करेगें ? पत्रकारिता अपने नाम और काम के लिए क्या महज एक हथियार ही रहेगी या फिर समाज में हो रही घटनाओं में निष्पक्षता के मूल्य कायम कर पाएगी ? ऐसे ही तमाम विचार कभी-कभी मन को आन्दोलित कर देते हैं। क्या ग्रामीण पत्रकारों के प्रति आपके मन में भी कोई विचार आता है।