आज एक जुलाई है
आषाढ़-मास है।
कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-सम्राट कालिदास का ‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है।
पावस-ऋतु का आगमन
और सम्प्रति, वर्षा की मूसलाधार
प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों के गह्वर में छोड़ आती हैं।
अन्तहीन-सी बूँदें ग्रीष्म की तपन से ‘पृथ्वी’ को आश्वस्त कर रही हैं
अथवा ‘पृथ्वी’ की आयु में एक वर्ष निकल आने पर
अश्रुपूरित संवेदना-विस्तार कर रही हैं?
शुभ-कामना के अम्बार से दबा मैं
किंकर्त्तव्यविमूढ़-सा
क़दमों के घटते-बढ़ते पगचिह्नों से प्रश्न करता हूँ
तो कभी पग-चापों के आरोह-अवरोह को
कर्णरन्ध्रों के समीप ले आता हूँ।
अनुभव का वितान तानता हूँ तो
स्वयं को वय-वार्द्धक्य के साथ
एक सोपान नीचे पाता हूँ।
एक वर्ष की उपलब्धियाँ—
मुँह चिढ़ाती नज़र आती हैं।
मैं उन अनथक पाँवों की रेखाओं
और न फूटे हुए छालों से प्रश्न करता हूँ।
सब-के-सब आँखें मोड़ लेते हैं
और मुझे छोड़ जाते हैं,
मृत्यु के समीप :–
एक क़दम और आने के लिए।
एक और ‘एक जुलाई’
की प्रतीक्षा सहने के लिए।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १ जुलाई, २०१८ ईसवी)