आओ इस दीपावली हम कुछ खास करे
दीपक श्रीवास्तव “दीपू” आओ इस दीपावली हम कुछ खास करे । जलाकर चिराग रोशन जहाँ करे ।। मैया की मूरत हो , प्रण हम करे। न हो कोई मायूस कोशिश ये हम करे ।। आओ […]
दीपक श्रीवास्तव “दीपू” आओ इस दीपावली हम कुछ खास करे । जलाकर चिराग रोशन जहाँ करे ।। मैया की मूरत हो , प्रण हम करे। न हो कोई मायूस कोशिश ये हम करे ।। आओ […]
राघवेन्द्र कुमार “राघव”- मृत्तिका निर्मित दिये से है अमावस काँपती । जलते हुए नन्हें दिये से डरकर निशा है भागती । दीपक देह की अभिव्यंजना से […]
आकांक्षा मिश्रा, गोंडा उत्तर- प्रदेश तेरे साथ सदा मेरा विरोध ,अब मुझे सहा जाता नहीं । दिन प्रतिदिन तूने मुझ पर ऋण का भार ,रहें बढ़ाते इस आभार भरे शब्दों से सदा सिमटी सी कोने […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : तन्त्र लोक का है कहाँ, चहूँ दिशा हैं चोर। मुँह काला हो रात में, चन्दन चमके भोर।। दो : तन पाप में ख़ूब रमा, पुण्य नहीं है पास। चेहरा है […]
जग का दुःख है रोया हमने, अपना दुखड़ा भूल गये। उस पथ के पथराही हैं हम; जिस पथ में नित शूल नये। सारा सावन आँखों में ही, रुक कर मानो सूख गया। इतने पर भी […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) बिन सोने की लङ्का का ग़र मैं रावण बन जाऊँ तो; क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे? ख़ुद तम्बू में रह करके जो भक्तों से न रुष्ट हुये; आगे करके […]
जगन्नाथ शुक्ल..✍ (इलाहाबाद) तीरगी का कह्र नित बढ़ा जा रहा है। रोज़ जुम्ला नया इक गढा जा रहा है।। माना हलचल नहीं है शहर में तिरे; दूर कोई बवण्डर चला जा रहा है। नाम बदलना […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय डोली ‘हिन्दुत्व’ औ’ ‘विकास’ की उठी, ‘न्यू इण्डिया’ के लुटेरे ‘कहार’ देखिए! ‘अच्छे दिन’ की चिड़िया फुर्र हो गयी, सौ डिग्रीवाला चुनावी बुख़ार देखिए! धर्म से शून्य, पर ज्ञान बाँटने में दक्ष, […]
आदित्य कर्ण दरभंगा, बिहार (मिथलांचल) ऐ मौत तूने तो जमींदार बना दिया। जब ज़िंदा था तो घूमता था, दर-ओ-बदर, अब मर गया तो इतना बड़ा श्मशान दिला दिया। भटकते रहे उम्र भर, चैन-ओ-सुकून के लिए, […]
करवा चौथ व्रत की पूर्व सन्ध्या पर धर्मपत्नी को समर्पित सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ कीमौलिक रचना- प्रिय अर्धांगिनी क्या दे दूं, जो तुमको खुश कर पाऊँ मैं। जो करवा चौथ का ब्रत रखा, कैसे आभार जताऊँ […]
शालू मिश्रा, युवा कवयित्री, नोहर (हनुमानगढ़) राजस्थान याचक बनकर तुमनें मुझे मांगा था मात पिता से, मन कर्म वचनो से मैने भी तुम्हारा साथ दिया। चूँङी बिदींया मेहदीं से करके सोलह श्रृंगार, प्यार भरी माँग को […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) निरा झूठ को सच बताया न जाये; काँच से पर्वत को डराया न जाये। ख़ुद के दामन का दाग़ धोने को ; दूसरों के अरमां डुबोया न जाये। हठ को उम्मीद का […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) ऋषि भरद्वाज के यज्ञ की आग हूँ। मैं युगों-युगों से तीर्थराज प्रयाग हूँ।। सूर्य-चन्द्र की ज्योति तक आबाद हूँ, मैं ही अकबर का अल्लाहाबाद हूँ। चन्द्रशेखर आज़ाद के हृदय का ताप हूँ, […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) आज दर्पण का जीवन लगा दाँव में; सच दिखाया था क्यों झूठ की छाँव में? आँखों में दर्द था, दिल में थी शिकन ; पथ में काँटा चुभा जब तेरे पाँव में। […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) जिसे मैं चाहता हूँ वो चाहत हो तुम जिसे मैंने पाया मेरी अमानत है तुम तन्हा-ए-दिल तुझसे ना बिछड़ पाऊँगा बिछड़ा तो एक पल भी जी नहीं पाऊंगा मेरी जिंदगी के […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) किसी को मंदिर, किसी को मस्जिद बना लेने दो। गरीबों की आह , उनकी पुकार यूँ ही दब जाने दो।। कोई मर रहा भुखा उन्हें यूँ ही मर जाने दो। गर […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) क्या खता हुई है हमसे तु मुझे याद करती नहीं है.. कभी करती थी बातें सात जन्मों की अब इक पल साथ दे राजी नहीं है.. गर खुश है तू मुझको […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) जिंदगी एक जंग है, यूँ हार मानते नहीं। गर हो खडे मैदान में, कभी छोड़ भागते नहीं।। है जोरावर दुश्मन का , हम भी किसी से कम नहीं। गर हो हौसला […]
‘शारदेय’ सुषमा श्रीवास्तव, कानपुर, उत्तर प्रदेश जब-जब रंग बदलता मौसम, तब तब तुम याद आते हो, जब जब ठोकर खाती हूँ, तुम अश्कों में मुस्काते हो। मौसम की तरह तुम भी बदले, यह सोच के […]
डॉ०पृथ्वीनाथ पाण्डेय भाषा ले रसगागरी, चली पिया के देश। अगवानी में लिपि रही, मन्त्रमुग्ध परिवेश।। सौम्य कविता-कामिनी, ले रचना परिधान। उपमा, अद्भुत, सोरठा, सबका है सम्मान।। वहीं समीक्षा बैठकर, रहि माथा खुजलाय। कैसे-कैसे कवि यहाँ, […]
शालू मिश्रा, नोहर जिला – हनुमानगढ़ (राजस्थान) नव दुर्गा मात की महिमा है अपरंपार, नौ रूप है शक्ति तेरे जग की तू है पालनहार । सुनहरे रंगो की लेकर मन में फुहार, अद्भूत सिंह पे होकर चली […]
भारतीय वायु सेना के स्थापना दिवस के अवसर पर भारतीय वायु सेना को समर्पित विनय शुक्ल जी की बेहतरीन रचना : नीली वर्दी, नीला अंबर प्रबल, प्रचण्ड हे गरूड़ दिगम्बर क्षितिज नभ का हो या […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेसी’ बघौली- नवरात्र शुरू हो चुके मातु , आकर के दर्शन दे जाना। उपवास किया मां तेरे लिए, एक दिन मेरे भी घर आना।। पता मातु मुझे भली भांति, तुम हमको छोड़ न […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती परिणय की परिपाटी में तुम पर न्यौछावर हुआ तुम्हें अपना वर्तमान और भविष्य माना हर पग तेरे साथ चलने की कोशिश की, तुम में ही अपना सर्वस्व ढूँढा काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। हर रात उठ-उठ कर तेरे चेहरे में ख़ुद को ढूँढा हर सुबह उठ कर तेरे सोते हुये चेहरे का अजब सा मुँह मोड़ना देखकर ख़ुश हुआ तेरे बालों की महक से तेरी थकान का अंदाज़ा लगा सकता हूँ तेरे चेहरे की शिकन से तेरा मूड बता सकता हूँ काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। हालांकि गुलाबी शूट और बैंगनी साड़ी तुम पे जचती है गुलाब की चार पंखुड़ियाँ तेरी मुस्कान बढ़ाती हैं सूरज की कुछ ही किरणों में तुम थक जाती हो हवा के चंद झोंकों में ठण्ड से डर जाती हो काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। घर के किसी भी कोने में जब तुम होती हो क्या महसूस किया तुमने, हर थोड़ी देर में तुम्हें देख जाता हूँ काली टी-शर्ट में तेरा सोता हुआ फोटो देख कर आज भी चहक जाता हूँ सेवपुरी के दो टुकड़ों में तेरी मुस्कान अब भी दिखती है काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। रेड लेबल चाय का बड़ा डिब्बा तेरे बड़े से मग की याद दिलाता है मेरी कॉफ़ी का १० रूपये वाला पाउच अब भी तेरे चाय के डब्बे से शर्माता है मैरून रंग की वाशिंग मशीन से जब फर्श पर पानी फैलता है और डबल बेड की सरकती ट्रॉली तेरी याद दिलाती है काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। तेरा छोटा सा डस्ट-बिन खाली पड़ा है पुरानी कॉलेज की बॉय-कट बालों वाली फोटोज और फाईलें वैसी ही पड़ी हैं तेरी तकिया से वही ख़ुशबू आती है तेरे टेडी तेरी याद दिलाते हैं काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चित्र-विचित्र चेहरे हर तरफ़ से देखिए, यक़ीं न हो जनाब तो फेसबुक देखिए। कविता के नाम पर क्या-क्या परोसे हैं, अर्थ-भाव सड़ रहे हैं फेसबुक देखिए। उनकी शब्दावली पर नज़रें इनायत हों, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पत्नी : सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़। कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।। हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह। खटपट भी होता रहे, अलग न […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ हमारे प्रिय नेताजी छीन-झपट कर बैठे न सुधरे जनता से छल-कपट कर बैठे । सड़कें ख़राब थी बिजली भी नहीं आती हम बिजली के बटन चट-पट कर बैठे । दिमाग़ आज हमारा बहुत ख़राब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यूँ फँसा पड़ा था उलझनों में कहीं इक अर्सा बीत गया अब जब देखी है तस्वीर तेरी दिल में प्यार उमड़ पड़ा मोहब्बत की गहराई मेरी मालूम है उसे या ख़ुदा क्यों खुद ही में वो उलझ के रह गया ।
ज़िंदगी अब इक तंज़ बन के रह गई बिन तेरे दुनिया रंज बन के रह गई । नाख़ुदा कौनसी स्याही से मानेगा अश्कों का रंग भी अब सुर्ख़ हो गया । बिखर गया हूँ कुछ इस तरह से कि इक टुकड़ा फलक पे दुसरा ज़मीं-दोज़ हो गया । रह रह के देखता हूँ मुड़ के पीछे बवंडर लूट के मुझे ख़ामोश हो गया । डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ दर्द तड़पाता है कभी चुप हो जाता है तन्हाई में अश्कों की बारात सजाता है । ग़म रुलाता है कभी कसक बन के रह जाता है भूले मंज़र याद करके दिल को सताता है । यादें सुलगती हैं कभी थम सी जाती हैं हर लम्हे को ज़ेहन में सजा के सिसकाती हैं । तन्हाई जलाती है कभी ख़ामोश हो जाती है मेरी ओर इशारा करके मुझे चिढ़ाती है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुबह आती आवाज़ें शाम आती आवाज़ें दिन और रात आती आवाज़ें वक़्त तक आती आवाज़ें वक़्त को रोकती आवाज़ें आवाज़ों का ट्रैफिक जाम है, क्योंकि हर दिशा से एक साथ आती हैं कई आवाज़ें।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति। मन्दिर में मूरत दिखे, उड़न-छू भयी शक्ति।। दो : पट्टी बाँधे आँख में, देश जगाता चोर। भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुना है ज़माने के साथ लोग बदलते हैं शहर में कुछ पीर आजकल भी रहते हैं । आँख भरके देखते हैं क़द्र न की जिसने मचलते हैं क्यों इतना पूँछ के देखते हैं । चाँद से बढ़ कर रोशन सादगी जिनकी हर दिन वो शान से बाहर निकलते हैं । हुजूम से परे उन पर निगाहें ठहर गई तितलियाँ मँडरातीं हैं शायद महकते हैं । उतरे चेहरे सँवार के भी ख़ामोश बहुत जहाँ भर की ख़ुशी आस पास रखते हैं । तिरे पीछे तिरि परछाँइयों से की बातें चश्म हैराँ मिरि अक़्स कमाल करते हैं । मुंसिफ-ए-बहाराँ तिरि एक नज़र को ‘राहत’ तेरे कूचे से दिन रात गुजरते हैं ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते ह़ैं सूरज से डरते हैं इसीलिये दिन में छिप जाते हैं। चाँद से शरमाते है पर आकाश में निकल आते ह़ैं तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं। लोग कहते हैं अंतरिक्ष अनंत ह़ै लेकिन मैंने देखा नहीं मैं तो केवल इतना जानता हूँ सूरज बादल में छिप जाता है चाँद बादल में छिप जाता है सो तारे जब डरते शरमाते होंगे बादल में छिप जाते होंगे। तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ माना कि हालात बेकाबू हो गए कई बार जब भी वक़्त नासाज हुआ हर बार भरोसा रखा मैंने या ख़ुदा तेरे भरोसे को क्या हुआ कभी लगता है सँभल गया कभी यों ही बिगड़ गया वक़्त ऐसा जैसे रेत का बुत मुठ्ठी से फिसल गया रोकना तो चाहा हमेशा पर लम्हा इतना अजीब है क्यों न समझ सका वो तड़प दिल की साथ रहकर भी छोड़कर तुम जहां से गए थे मैं आज भी वहीँ खड़ा हूँ यूँ तुम तो सम्हल गए होगे मैं आज भी बिखरा पड़ा हूँ इस दिल में रहोगे ता-उम्र फिर क्यूँ डरते हो पाक है मोहब्बत मेरी यूँ नजरे चुरा के ना निकलो इंतिज़ार है तेरे इक इशारे का आगे खूबसूरत जहाँ पड़ा है तेरे बिना वर्ना दर्द का दरिया ‘राहत’ आँखों से बहता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ कुछ लोग मंदिर को मदिरालय से मस्जिद को मय-ख़ाने से जोड़ गए । आस्था से खेला संवेदनाओं को चक्कर में छोड़ गए । और नासमझ मनुष्य मंदिर से मदिरालय के मस्जिद से मय-ख़ाने के रिश्ते पर यकीं कर बैठा ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ रखता हूँ हर कदम ख़ुशी का ख़याल अपनी डरता हूँ फिर ग़म लौट के न आ जाए । अब भुला दी हैं रंज से वाबस्ता यादें यूँ आके ज़िंदगी में ज़हर न घोल जाएँ […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ़) राजस्थान मुसीबत के समंदर में जो किनारा दे वो है मेरी माँ, जीने के मायने जो सिखाये वो हैं मेरी माँ। औलाद उदास हो तो मुस्कान चेहरे पर लादे वो हैं […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यकीं का यूँ बारबां टूटना आबो-हवा ख़राब है मरसिम निभाता रहूँगा यही मिरा जवाब है । मुनाफ़िक़ों की भीड़ में कुछ नया न मिलेगा ग़ैरतमन्दों में नाम गिना जाए यही ख़्वाब है । दफ़्तरों की खाक छानी बाज़ारों में लुटा पिटा रिवायतों में फँसा ज़िंदगी का यही हिसाब है । हार कर जुदा, जीत कर भी कोई तड़पता रहा नुमाइशी हाथों से फूट गया झूँठ का हबाब है । धड़कता है दिल सोच के हँस लेता हूँ कई बार तब्दील हो गया शहर मुर्दों में जीना अज़ाब है । ये लहू, ये जख़्म, ये आह, फिर चीखो-मातम तू हुआ न मिरा पल भर इंसानियत सराब है । फ़िकरों की सहूलियत में आदमियत तबाह हुई पता हुआ ‘राहत’ जहाँ का यही लुब्बे-लुबाब है ।
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ़ ) राजस्थान भाई और बहन हो जाओ तैयार, लो आ गया राखी का त्योहार । ठंडी बारिश की बूँदे, सावन की सौंधी महक। भाई के आने की उम्मीद बहना को लगी […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ) धन की लालसा मन में जगाते हो, बेटी को पराया धन बोल गर्भ में गिराते हो। कहते है ,के बेटा वंश बढायेगा, यदि बहू न आई आंगन तो किलकारी कौन गूंजायेगा। […]
‘निर्मल मन के मोती’ कविता संग्रह कवि गौरी शंकर उपाध्याय ‘उदय ’95 कविताओं का गुलदस्ता है | जिसमे कविता मिश्रित गीत एक अदभुत तालमेल का संयोजन है जो मन को छू जाता है | वंदना […]
श्री गणेश मनावर जिला धार (मप्र ) के वरिष्ठ कवि श्री शिवदत्त जी “प्राण ” ने लगभग 60 वर्ष पूर्व गणेश जी की स्वरचित आरती लिखी थी जो पूरे मनावर एवं आसपास के क्षेत्रों में संगीत […]
जगन्नाथ शुक्ल..✍ (इलाहाबाद) नज़्म-ए-वफ़ा अहल-ए-बज़्म में,मैं सदा गाता रहा। दिल टूटा खिलौने की तरह,पर मैं तो मुसकाता रहा।।—२ अठखेलियाँ करते हैं आँसू, जब तब मेरे पलकों के भीतर, हूँ विवश मैं इस क़दर कि- घूँटता […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ जब दूर बैठा कवि कोई, सर्जन के बीज बोता है, भाव में खुद को पा कर, मन में हर्ष का तीज़ होता है। जब दूर…………………………………………………. उठी जैसे लहर कोई, नया अनुबन्ध करने को, […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ), राजस्थान ऐ विघ्नहर्ता ऐ मंगलकर्ता तू ही दुखहर्ता तू ही सुखकर्ता, एकदंत गजबदन को मेरा बारंबार प्रणाम । चारों ओर मची है धूम गणेश उत्सव की, जीवन में छाई नई आशा […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ), राजस्थान मन ये तेरा परेशान क्यूँ है, इस जग से बेफिक्र क्यूँ है, नित नये ख्वाब सजा कर मन में दबा बैठा क्यूँ है। पथ पर नित आगे बढ चल न […]
कवि – राजेश पुरोहित रोज – रोज तेल के भाव चढ़ रहे। सियासत में तूफान भी मच रहे।। विपक्ष के नेता हाहाकार कर रहे। जनता के प्रदर्शन रोज ही हो रहे।। आने वाले अब अगले […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” ज़िंदगी के रंग मंच पर आदमी है सिर्फ़ एक कठपुतली । कठपुतली अपनी अदाकारी में कितने भी रंग भर ले आख़िर; वह पहचान ही ली जाती है, कि वह मात्र एक कठपुतली है । ऐसे ही आदमी चेहरे पर कितने ही झूठे-सच्चे रंग भरे अंत में, रंगीन चेहरे के पीछे असली चेहरा पहचान ही लिया जाता है |
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जिस सहर पे यकीं था वो ख़ुशगवार न हुयी देखो ये कैसी अदा है नसीब की समझा था जिसे बेकार, वो बेकार न हुयी मांगी थी जब तड़प रूह बेक़रार न हुयी कहूँ अब क्या किसी से देखकर माल-ओ-ज़र भी मिरि चाहतें तलबगार न हुयीं सोचा था जिन्हे अपना वो साँसें मददगार न हुयीं है अजीब अशआर क़ुदरत की भूल से छोड़ा था जिसे हमने वो निगाहें शिकबागार न हुयीं २५/०१/०३ टैगोर हॉस्टल, सागर यूनिवर्सिटी
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत‘ जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई दफ़्तरी से हुए वाबस्ता तो आवारगी चली गई । शौक़ अब रहे न कोई ज़िंदगी की भागदौड़ में दुनियाँ के दस्तूर में मिरि कुशादगी चली गई […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) कन्हैया बस यही विनती मेरी स्वीकार कर लेना, मेरी डगमग-सी नैया को ये दरिया पार कर देना। सबकी बिगड़ी बनाते हो , सभी को राहें दिखाते हो। कहीं गोपी सङ्ग लीला, कहीं […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) गिरते मन को उठाना सिखाया है जिसने, घोर तम में दीये को जलाया है जिसने। उस गुरु की हृदय से इबादत करूँ मैं, भटके क़दमों को राहों में लाया है जिसने।। **** […]
डॉ. रूपेश जैन मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था ख़ाहिश-ए-ख़लीक़ इज़हार करना चाहा था । धुएँ सी उड़ा दी आरज़ू पल में यार ने मिरि तिरा इस्तिक़बाल शानदार करना चाहा था । भले लोगो की बातें समझ न आईं वक़्त पे मैंने तो हर लम्हा जानदार करना चाहा था । तिरे काम आ सकूँ इरादा था बस इतना सा तअल्लुक़ आपसे आबदार करना चाहा था । इंतिज़ार क्यूँ करें फ़स्ल-ए-बहाराँ सोचकर चमन ये ‘राहत’ खुशबूदार करना चाहा था ।
कवि राजेश पुरोहित महावीर के सिद्धांतों को जिसने जग में फैलाया। दिगम्बर रह कर जीवन में सच्चा संत कहलाया।। तन पर न कोई वस्त्र रखा रखी धर्म की लाज सदा। मुनि तरुण सागर ने अमृतवाणी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सदियों से भटकती इक तलाश लिखता हूँ , हवा,पानी,आँधी और बतास लिखता हूँ। सूख रही ताल-तलय्या दूभर है अब पानी, इस काइनात१ की अब लिखता हूँ हमक़दम दग़ा दे गया कुछ […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” इंसानियत से प्यार जब दीन-ओ-जान हो जायेगा मुज़्तरिब हाल में हाथ थामना ईमान हो जायेगा रस्म है, ज़िंदगी करवटें बदलती रही इब्तिदा से शिद्दत से जिया जो मालिक मेहरबान हो जायेगा ख़ुद से मुलाक़ात […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” दिन हो, रात हो अब युवा हिन्द के करते आराम नहीं समाज बदल रहा है युवा, व्याकुलता का अब काम नहीं भारत माता की वेदी पर निज प्राणों का उपहार लाये हैं शक्ति भुजा में, ज्ञान गौरव जगाने भारत के युवा आये हैं नित नए प्रयासों से समाज को आगे ले जा रहे है देखो युवा क्या क्या नये उद्यम ला रहे है बिन्नी के साथ ‘फ्लिपकार्ट’ आया देश में नया रोजगार लाया कुणाल और रोहित की ‘स्नैपडील’ कंस्यूमर को हो रहा गुड फील देश की बेटियाँ कहाँ पीछे रहीं राधिका की ‘शॉप-क्लूज़’ आ गयी हुनर नहीं बर्बाद होता अब तहखानों में जीवन रागनियाँ मचल रही नव-गानों में समझ चुके हैं बिना प्रयास पुरुषार्थ क्षय है आगे बढ़ चले अब, भारत माता की जय है तप्त मरु को हरित कर देने की आस लगाये हैं युवा सुख-सुविधाओं की नए परम्परा लाये है भाविश का ‘ओला’ समय से घर पहुँचता शशांक का ‘प्रैक्टो’ डॉक्टर से मिलवाता दीपिंदर का ‘जोमाटो’ खाना खिलवाता समर का ‘जुगनू’ ऑटोरिक्शा दिलवाता विजय का ‘पेटीऍम’ ट्रांजेक्शन की जान सौरभ, अलबिंदर का ‘ग्रोफर्स’ खरीदारों की शान शिरीष आपटे की जल प्रणाली देश के काम आ रही बीएस मुकुंद की ‘रीन्यूइट’ सस्ते कंप्यूटर बना रही बिनालक्ष्मी नेप्रम ‘वुमेन गन सर्वाइवर नेटवर्क’ चला रहीं सची सिंह रेलवे स्टेशन पर लावारिसों […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” भावनाओं का निर्मल सलिल हृदय से गुज़रते ही दर्द की आग में उबल पड़ता है और निष्क्रिय मस्तिष्क फिर वापस पीछे धकेलते हुए शरीर निष्प्राण सम कर देता है हर डगर यूँ तो कठिन […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” दिल में बस जाना फिर रूठ के चले जाना हमदम कभी मान जाना तो कभी बे-ख़ता सताना हमदम । जोड़ता फिर रहा हसरतें मुहब्बत की राह में सनम इक छोर से तुझ पर आके […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उठती है हर लहर आँखों के सामने , गिरती है हर लहर आँखों के सामने। सभ्यता की अगुवाई बेहयाई कर रही, आँखों का पानी मर रहा आँखों के सामने। पाक़ीज़गी से […]
— प्रदीप कुमार तिवारी सकल जग का ये सकल खेल मानव शेर तो प्रकृति सवा शेर छोटा वार मानव बार-बार करता उसके ऊपर प्रकृति का एक ही वार भारी पड़ता झूठी कहानी है यह कि […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इंसाँ झूठे होते हैं इंसाँ का दर्द झूठा नहीं होता इन होंठों पर भी हंसी होती गर अपना कोई रूठा नहीं होता। मैं जानता हूं कि आंखों में बसे रुख़ को मिटाया नहीं जाता, यादों में समाये अपनों को भुलाया नहीं जाता। रह–रहकर याद आती है अपनों की ये ग़म छुपाया नहीं जाता, सपनों में डूबी पलकों की कतारों को यूं उठाया नहीं जाता। इंसाँ झूठे होते हैं इंसाँ का दर्द झूठा नहीं होता इन होंठों पर भी हंसी होती गर अपना कोई रूठा नहीं होता।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ बूढ़े दरख़्त पहले से ज़्यादा हवादार हो गये इश्क़ में हम पहले से ज़्यादा वफ़ादार हो गये । उनसे दिल की बात कहने का हुनर सीख लिया लब-ए-इज़हार पहले से ज़्यादा असरदार हो गये […]
युगपुरुष को सादर श्रद्धांजलि डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी साँसो का बंधन तोड़ , यादों की गठरी छोड़ , राष्ट्रपंथ के पथिक , तू भला किधर गया ? एक युग ठहर गया ………… वह थे अजातशत्रु, […]
अटल के पटल बन्द हों सब विकल, उनकी पीड़ा नहीं अब सही जा रही। अपने हों या पराए दुखी सब दिखें, उनके दर्शन को जनता झुकी जा रही।। अब तक जो किया और जैसा रहा, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सुगबुगाहट हो तो, अब आग उठनी चाहिए, हो कहीं भी आग तो, आग लगनी चाहिए। बहुत सोये हो तुम! अब जग जाने को सोचो, उठाओ अब मशाल, लपट उठनी चाहिए। बूढ़ा भारत […]
दीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761 सत्ता चरित्र है बड़ा विचित्र सत्ता चरित्र, उजले चेहरे धुंधले होते हम आम सुधी जन, लाख जतन कर सच्चाई को समझ ना पाते हाथ रगड़ते फिर पछताते ।। […]
प्रदीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761 गिरती है सीमा पर लाशें चैन से हम तुम सोतें हैं। भूख से व्याकुल बच्चे उस दिन, सैनिक के घर रोते हैं।। हम शहीद कह के उनको, काम […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (पत्रकार, बघौली, हरदोई) ऊँश्री गुरूवे नमः गुरू सर्वोपरि 15 अगस्त 2018 स्वतन्त्रता दिवस अमर रहे ! राष्ट्रीय पर्व के अवसर मौलिक मनभावों के पुष्प आदर श्रद्धा से सादर समर्पित हैं। (1) देश […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ छोटे से दिमाग़ में बसा ली है दुनियाँ चारों और कौन देखता है चौतीस हो गयीं बर्बाद मुजफ्फरपुर कौन देखता है । उन्नाव, सूरत, मणिपुर, दिल्ली कौनसा हिस्सा बचा मेरे हिन्दुस्तान अब रोना आता है मुझको बच्चियाँ लाचार, कौन देखता है । जब तक बीते न ख़ुद पे बड़े व्यस्त हैं हम चलो प्रार्थना ही करलें पुकारें बेटियाँ कौन देखता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ गले लगते दोस्त बोला क्या छोड़ दिया चैन से जीना सीख लिया सारा दिन फेसबुक पर रहना छोड़ दिया चैन से जीना सीख लिया । व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी हर रोज नए पचड़े सर दर्द […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय किसी की बात पर न जाइए हुज़ूर ! किसी की बात पर न आइए हुज़ूर ! दीगर बात है कोई बात ही नहीं, भरा हो पेट तो मत खाइए हुज़ूर ! ज़ख़्मों […]
डॉ रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद कुछ ख़्वाब बुन लेना जीना आसान हो जायेगा दिल की सुनलेना मिज़ाज शादमान हो जायेगा मुद्दत लगती है दिलकश फ़साना बन जाने को हिम्मत रख वक़्त पे इश्क़ मेहरबान हो जायेगा टूटना और फिर बिखर जाना आदत है शीशे की हो मुस्तक़िल अंदाज़ ज़माना क़द्रदान हो जायेगा लर्ज़िश-ए-ख़याल में ज़र्द किस काम का है बशर जानें तो हुनर तिरा मुल्क़ निगहबान हो जायेगा मंज़िल-ए-इश्क़ में बाकीं हैं इम्तिहान और अभी ब-नामें मुहब्बत ‘राहत’ बेख़ौफ़ क़ुर्बान हो जायेगा ॥
‘डॉ रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद मैं क्या मिरी आरज़ू क्या लाखों टूट गए यहाँ तू क्या तिरी जुस्तजू क्या लाखों छूट गए यहाँ । चश्म-ए-हैराँ देख हाल पूँछ लेते हैं लोग मिरा क़रीबी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बीज घृणा का हर तरफ़, उगने लगी खटास। हाथ प्रेम ने झटक लिये, दूर हो गयी आस।। गोरखधन्धा दिख रहा, खेल निराले खेल। बाहर से दुश्मन लगें, अन्दर से है मेल।। राजनीति […]
************************************** जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) अभिनन्दन की आस लिए मैं जीवन जीता जाता हूँ। कर्मयोग का साधक मैं नित भगवत्- गीता गाता हूँ।। अभिनन्दन की……………………….………….. भेद-भाव के इस कानन में स्वाभिमान का प्रहरी हूँ, प्रेम-भाव में […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सवाल तुमसे, बीमार बीज क्यों बोते हो? जवाब देते ही अतीत को तुम रोते क्यों हो? मज़ा तब है, जब पर्वाज़ में बलन्दी हो, जागते हो कथनी में और करनी में सोते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ख़ुशियाँ हुईं बरबाद, मुझे कोई ग़म नहीं, जानता था, तुम सबमें, है कोई कम नहीं। इत्तिफ़ाक़ था उस रोज़, मिल रहे थे सब गले, पीठ पे निशाना, लगानेवालों में हम नहीं। सीना […]
डॉ. रूपेश जैन- जब ज़िन्दा था तो काश तुम सीख लेती जीने का क़ायदा शम-ए-तुर्बत१ की रौशनी में ग़मज़दा होने का क्या फ़ायदा । इख़्लास-ओ-मोहब्बत२ जुरूरी है मुख़्तसर३ सी ज़िंदगी में अपना बनाने को शर्त-ए-मुरव्वत४ रखने का क्या फ़ायदा । सर-ए-दीवार५ रोती […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश पल रहा है तुम्हारी कोख में उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़। उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान, जिसका […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय शाम ढली दीये को जलने दो, नींद में सपनों को पलने दो। प्यास बढ़ती है तो बढ़ जाए, बर्फ़ को पानी में गलने दो। दम न तोड़ ले ख़्वाहिश कहीं, उसको अब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद नज़ाकत-ए-जानाँ1 देखकर सुकून-ए-बे-कराँ2 आ जाये चाहता हूँ बेबाक इश्क़ मिरे बे-सोज़3 ज़माना आ जाये मुज़्मर4 तेरी अच्छाई हम-नफ़्स मुझमे, क़िस्मत मिरी लिखे जब तारीख़े-मुहब्बत5 तो हमारा फ़साना आ जाये माना हरहाल मुस्कुराते रहना […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद उम्र भर सवालों में उलझते रहे, स्नेह के स्पर्श को तरसते रहे फिर भी सुकूँ दे जाती हैं तन्हाईयाँ आख़िर किश्तोंमें हँसते रहे । आँखों में मौजूद शर्म […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” क्या रखा है तेरी याद में उम्र भर बे-सुकून क्यों जीते रहें उम्र भर दिल-लगाया-ओ-इश्क़-आजमाया तमन्ना क्यों सताती रहे उम्र भर हँसता हूँ ख़्याल पे कि तुम मेरे हो ग़ैरों को क्यों तड़पते रहें […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ पाने की चाह में खोने का डर सताता है बिना कुछ पाये ही दिल सहम जाता है फ़ितरत में जुड़ा है ये डर जाना सहम जाना रुका था न रुकेगा इंसाँ […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ एक दिन मेरे दोस्त को, मैं लगा गुमसुम बोला वो, क्या सोच रहे हो तुम बातें बहुत सी हैं सोच रहा हूँ, क्या सोचूँ, बोला मैं। अलग-अलग हैं कितनी बातें […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ना कुछ सोचो ना कुछ करो, क्योंकि चाय के प्यालों से होठों का फासला हो गयी है जिंदगी। भूख से बिलखती रूहों को मत देखो शान-औ-शौकत के भोजों१ में खो गयी है जिंदगी। बस सहारा ढूढ़ते, सड़क पे फट गए जूतों से क्या सुबह शाम बदलती गाड़ियों का कारवाँ हो गयी है जिंदगी। तन पे फटे हुए कपडे मत देखो नए तंग मिनी स्कर्ट सी छोटी हो गयी है जिंदगी। पानी की तड़प भूल कर महंगीं शराब की बोतलों में खो गयी है जिंदगी। फुटपाथ पे सोती हजारों निगाहों की कसक छोड़ के इक तन्हा बदन लिए, हजारों कमरों में सो गयी है जिंदगी। हजारों सवाल खामोश खड़े; बस सुलगती सिगरेट के धुएं सी हो गयी है जिंदगी। शब्दार्थ: १. भोजों:- दावतों
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक —–पाप-बोध—- पाप का कण-कण मेरी जिह्वा से टकराता है और ले जाता है– एक ऐसे गह्वर में, जहाँ पुण्य का प्रताप आन्दोलित हो रहा है और मेरा पाप सिर चढ़ कर […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ अपनी तमन्नाओं पे शर्मिंदा क्यूँ हुआ जाये एक हम ही नहीं जिनके ख़्वाब टूटे हैं इस दौर से गुजरे हैं ये जान-ओ-दिल संगीन माहौल में जख़्म सम्हाल रखे हैं नजर उठाई बेचैनी शर्मा के मुस्कुरा गयी ख़्बाब कुछ हसीन दिल से लगा रखे हैं दियार-ए-सहर१ में दर्द-शनास२ हूँ तो क्या बेरब्त उम्मीदों में ग़मज़दा और भी हैं अहद-ए-वफ़ा३ करके ‘राहत’ जुबां चुप है वर्ना आरजुओं के ऐवां४ और भी है शब्दार्थ: १. दियार-ए-सहर – सुबह की दुनियाँ २. दर्द-शनास – दर्द समझने बाला ३. अहद-ए-वफ़ा – प्रेम प्रतिज्ञा ४. ऐवां – महल
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब ख़ुद को लुटा दो, वतन के लिए, अब ख़ुद को खिला दो, चमन के लिए। ये आसां नहीं, जितना समझते हो तुम, तरस जाओगे दो गज़, कफ़न के लिए। बेशक, ज़माना […]
पेशे ख़िदमत हैं, चन्द अश्आर डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : तुम्हारी क्या बिसात, जो मुझे ललकारोगे? शब्द-तीर चलने पर, शेर भी दहल जाते हैं। दो : कुछ कर सकने की औक़ात नहीं, तो चुप बैठो, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भूख से बिलबिलाती आँतें; चीथड़ों में लिपटी-चिपटी अपनी पथराई आँखें पालती; टुकुर-टुकुर ताकती आँखों से झपटने की तैयारी करती मेले-झमेले की गवाह बनती; आस-विश्वास की फटही झोली लिये तमन्नाओं-अरमानों की लाश ढोती […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सिर पर कफ़न, बाँध कर आ गया, सीने पर पत्थर, दबाकर आ गया। शिकवा, शिकायत, गिला भी नहीं, अफ़साना अब जलाकर आ गया। मुफ़्लिस कैसे, कह दिया उसने? ख़ज़ाना दिखाकर, उसे आ […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) मैं प्रेम पथिक आवारा भँवरा, काँटों से भी प्यार करूँ, अधर लिखें चुम्बन की पाती, नयनों से संवाद करूँ। ऋतु वसंत की मादकता हो, या पावस के भारी दिन, उर में बजती नित […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बातों-ही-बातों में, ‘आदर्श’ अब बँटने लगे, जनाब को देखो, मुद्दों से, कैसे हैं हटने लगे! राम तो राजसिंहासन, त्याग कर आगे बढ़े, कैसे रामभक्त हैं, जो कुर्सी से सटने लगे! आश्वासन देते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जो उजड़ गया वह दयार हूँ, जो बिछड़ गया वह प्यार हूँ। कुछ याद आये तो कहो, जो बिसर गया वह क़रार हूँ। इल्ज़ाम सिर पर है मेरे, क़ातिल नहीं, फ़रार हूँ। […]