डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की जन्मतिथि’ के अवसर समर्पित हैं उन्हीं की ये पंक्तियाँ——

July 1, 2018 0

आज एक जुलाई है आषाढ़-मास है। कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-सम्राट कालिदास का ‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है। पावस-ऋतु का आगमन और सम्प्रति, वर्षा की मूसलाधार प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों के गह्वर में छोड़ आती हैं। अन्तहीन-सी बूँदें ग्रीष्म की […]

ग़र चाहत है खुशियाँ बरसे

July 1, 2018 0

©जगन्नाथ शुक्ल….✍ (इलाहाबाद) किस हक़ से कहते हो कश्मीर हमारा है,                    खुद के हाथों भारत माँ का शीश उतारा है। ग़र चाहत है खुशियाँ बरसें लहराये केसर घाटी में,             ३७०धारा ख़तम करो,धरती ने आज […]

एतिबार करना मत, झूठी हैं कुर्सियाँ

June 30, 2018 0

  डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ, कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ। जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर, क़ानून को भी आईना, दिखातीं कुर्सियाँ। ग़रीब का चूल्हा है, उधारी में […]

अपने को बुद्धिजीवी माननेवालो!

June 30, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशक, तुम्हारे चिन्तन चुराये हुए हैं। किराये की कोख से जन्मे या फिर परखनली में उपजे तुम्हारे वे शब्द हैं, जिन्हें पक्षाघात ने जकड़ लिया है। कोई थिरकन नहीं? प्रतिक्रिया-रहित संवेदना-शून्य तुम्हारा […]

ज़िन्दगी थी ‘गीत’, ‘इतिहास’ बनकर खो गयी

June 29, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रात घिरती रही, दीप जलता रहा। साज-श्रृंगार+ करती रही ज़िन्दग़ी, रूप भरती-सँवरती रही ज़िन्दग़ी। बेख़बर वक़्त की स्याह परछाइयाँ, उम्र चढ़ती-उतरती रही ज़िन्दग़ी। साध के फूल कुँभला गये द्वार पर, प्यास की […]

प्यारे झरने

June 28, 2018 0

रे रे झरने, तेरा निनाद ! सुनकर बज उठता ह्रदय-नाद । अन्तस् में भरता, आह्लाद । सानन्द दृशा, लगतीं भरने । रे रे झरने ! प्यारे झरने ।। तेरा प्रलाप, कल-कल कुल-कुल, हर धार चपल, […]

एक अभिव्यक्ति : नत-अवनत मुद्रा में, वात्स्यायन की सम्पन्न दीक्षा

June 27, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निभृत-निलय में वितान तानता मन, निश्शब्द-मूक याचना– सम्पृक्त उर्वशी-मेनका का तन। अनाघ्रात पुष्प-सा– सर्वांग सौन्दर्यस्वामिनी-द्वय की कान्ति, समग्र संसार-संसूचित– कमनीय कामिनी के क्लान्त कपोलों की भ्रान्ति। रूप, रस, गन्ध स्पर्श का आकर्षण, […]

कविता- बिच्छू

June 27, 2018 0

इन्द्रेश भदौरिया रायबरेली- काला – भूरा है मटमैला। बिच्छू होता बहुत विषैला। आठ पैर से चलने वाला। छोटे कीट निगलने वाला। दो हाथों से पकड़ शिकार। खा जाता है उसको मार। बहुत विषैला इसका डंक। […]

एक अभिव्यक्ति : सपनों के सारे ख़रीदार हो गये

June 27, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : देखते-ही-देखते, हम बाज़ार हो गये, सपनों के सारे यहाँ, ख़रीदार हो गये। गरदन झटक पंछी-मानिंद, उड़ते रहे जो, बेशक, वही अब हमारे, तलबगार हो गये। दो : ज़िन्दगी से छेड़ख़ानी […]

जन-गण-मन का अभिमान है ‘हिन्दी’

June 27, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय समग्र भारत का परिधान है हिन्दी, राष्ट्रीय आन-बान औ’ शान है हिन्दी। भाषाओं में है शीर्ष स्थान पर स्थित, जीवन-मरण का आख्यान है हिन्दी। आओ! करें नमन अपनी राजभाषा को, हमारे आचरण […]

हर चौराहे पर प्रश्न लटकते रहे

June 26, 2018 0

एक अभिव्यक्ति डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय महसूस तो अब होता है बहुत, ज़िन्दगी को है उलझाया बहुत। पाया कब और खोता रहा कहाँ, इन प्रश्नों को है सुलझाया बहुत। हर चौराहे पर प्रश्न लटकते रहे, लोकसत्ता […]

कविता : अन्तर्यात्रा

June 21, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : शुष्क पड़ी संवेदना, घायल रक्त-सम्बन्ध। अजब खेल है मोह का, कैसा यह अनुबन्ध? दो : मेरा-तेरा किस लिए, माया से अब डोल। गठरी दाबे काँख में, द्वार हृदय का खोल।। […]

आवर्त्तन और दरार

June 20, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : कल तक था जो जगद्गुरु, भ्रष्ट बन गया देश। दिखते सब बहुरुपिये, तरह-तरह के वेश।। दो : कुम्भकर्णी सब नींद में, नहीं किसी को होश। बाँट देश को सब रहे, […]

योग क्या है ?

June 20, 2018 0

कवि राजेश पुरोहित (राजस्थान) योग आत्मा से परमात्मा का मिलन निर्मलता स्वच्छता का संदेश मानसिक शांति का उपाय तन बने सुदृढ़ मन मे जगे आत्मविश्वास नई उमंग नई चेतना नई स्फूर्ति नए उल्लास का उदय […]

आगत-अनागत

June 19, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : नभ से उतरा चाँद है, दिखता बहुत उदास। धरती सिसकी रातभर, नहीं दिखे अब आस।। दो : जड़-चेतन हैं सोच में, मानव बहुत कठोर। पापकर्म गठिया रहा, रात हो गयी […]

कविता : पिता दिवस पर अपने पिता को समर्पित

June 18, 2018 0

जयति जैन “नूतन”, भोपाल (युवा लेखिका , सामाजिक चिंतक) पिता ही तो थे वो जिन्होनें हर ख्वाहिश पूरी की थी कोई क्या समझ सकेगा उस स्नेह से भरे अगाध प्रेम को । वर्षों तक पसीने […]

एक गीत : ये दिल मत तोड़ना पगली,जो धड़के तेरे सहारे ही

June 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) चले  आये  थके-हारे ,इन  जज़्बातों  के सहारे ही, ये दिल मत तोड़ना पगली,जो धड़के तेरे सहारे ही। इसे मत भूल जाना तुम,इसका अपमान मत करना, बड़ा  मासूम-सा ये दिल, इसे  मजबूर  मत करना। […]

“विशुद्ध वंदना” : परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के चरणों में समर्पित

June 17, 2018 0

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ वेष दिगम्बर धारी मुनिवर करुणा अब जगाएँगे पार करो खेवैया नहीं तो हम भव में ठहर जाएँगे । भक्ति भाव से आपको पुकारें हे! विशुद्ध महासंत कृपा प्रकटाओ अपनी नहीं तो […]

अजीब सी बस्ती

June 9, 2018 0

  राघवेन्द्र कुमार “राघव”- अन्त:विचारों में उलझा न जाने कब मैं, एक अजीब सी बस्ती में आ गया । बस्ती बड़ी ही खुशनुमा और रंगीन थी । किन्तु वहां की हवा में अनजान सी उदासी […]

क्या कहूँ तुम्हें?

June 6, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इक हूक-सी उठी है अब क्या कहूँ तुम्हें? ज़ख़्मी तन-बदन है अब क्या कहूँ तुम्हें! हर रात मुझसे रूठी दिन भी उदास है, क़दम भी बहके-बहके अब क्या कहूँ तुम्हें? इक अनकही […]

मजदूर की जिंदगी

May 27, 2018 0

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’-  धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं | मेहनतकश मज़दूर मगर हम भूखे ही मर जाते हैं |   धन की चमक के आगे हम कहीं ठहर न पाते हैं […]

चेहरा पे चेहरे अब तो न लगाइए हुज़ूर!

May 23, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हिचकी का सबब क्या है, बताइए हुज़ूर! परेशाँ हाले दिल को, अब सुनाइए हुज़ूर! कब तक भरमाइएगा, बाज़ीगरी दिखा के, चेहरा पे चेहरे अब तो न, लगाइए हुज़ूर! लोग आपकी हक़ीक़त से, […]

समय की नाक पर क़दम-ताल करता गिद्ध!

May 16, 2018 0

एक अभिव्यक्ति डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पगडण्डियों पर जोड़-घटाना गुणा-भाग करता हुआ पथिक, जो समीकरण बना चुका है, वह भीड़ की आँखों में काँटा बन, खटक रहा है। समय की नाक पर क़दम-ताल करता गिद्ध :– […]

एक अभिव्यक्ति : आँखों में उग आये बबूल के काँटे

May 15, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब हथेली पर सूरज उगाता हूँ मैं, अपनी आँखों में चन्दा बसाता हूँ मैं। सीने में दहकता है आग का गोला, भूख लगने पर उसको चबाता हूँ मैं। आँखों में उग आये […]

मां सर्वोपरि

May 15, 2018 0

सुधीर अवस्थी परदेशी मां लिखूं तेरे बारे में क्या, वाक्य बनते हैं नहीं। गद्य-पद्य कहूं क्या मैं, आंसू थमते हैं नहीं।। प्रेम तेरा प्यारा इतना, तुमसा नहिं कोई और है। हूं अंधेरी रात मैया, तू […]

माँ! कुछ तो बोलो!

May 15, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कौन-सा अपराध! कैसी गुस्ताख़ी! मैं तो था, मात्र मांस का एक लोथड़ा। शक़्ल अख़्तियार करने से पहले ही मेरे वजूद को मिटा डाला? तुम ममत्व और अपनत्व के द्वन्द्व में उलझी रही, […]

बदलता समय

May 14, 2018 0

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’- अब तो अपनी शख़्सियत ही इम्तेहान लेती है। हर दिन कुछ न कुछ नयी बात होती है। ज़ेहन में ख़यालात की आंधी बढ़ती चली आती है। विचारों के द्वंद्व में कुछ नयी […]

सयाली : अभिनेता फ़िल्म कम राजनीति में ज्यादा अच्छा अभिनय करते

May 12, 2018 0

कवि राजेश पुरोहित अभिनेता फ़िल्म कम राजनीति में ज्यादा अच्छा अभिनय करते  जय जय भारत जान से प्यारा देश हमारा भारत  प्यार ढाई अक्षर का सुंदर नाम रखो याद सदा  तिरंगा दिल में रहता है […]

एक गीत

May 11, 2018 0

उस उपवन को जल देकर ,वृथा समय बरबाद न कर । जिस उपवन में केवल काँटे वाले पेड़ पनपते हों ।। जहाँ अँधेरो की पूजा हो ,दीपक का उपहास बने । सारे श्रोता पटु वक्ता […]

राजस्थानी गीत : आपां चालां स्कूल में

May 11, 2018 0

– कवि राजेश पुरोहित, भवानीमंडी पाटी पोथी लेन चालां आपां स्कूल में सरकारी स्कूल की बाताँ सबे बतावां रे कि चालां स्कूल में……. फोकट में मिल री रे किताबां सरकारी स्कूल में गुरुदेव भी घर […]

मानवता बैठी चिग्घार रही

May 9, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) सिद्धान्तों की  शिला पड़ी, निर्वीर्य मनुज धिक्कार रही। काई लगी पीठिका में , हठ की नागिन बैठी फुफकार रही। दंश  झेलता  है समाज , औ  नित  राष्ट्र  बहाता  अश्रुधार, मानव  तेरी  चञ्चलता  […]

मेरे हिस्से इतवार कब आयेगा ? ——–

May 9, 2018 0

—– जयति जैन “नूतन” —– युवा लेखिका, सामाज़िक चिन्तक मैं बीमार हूँ लेकिन मैं किसी से कह नहीं सकती कि मैं बीमार हूँ । शरीर थकावट से चूर है सुकून बहुत दूर है लेकिन मैं […]

लो चलें स्कूल…

May 9, 2018 0

कवि राजेश पुरोहित (शिक्षक एवम साहित्यकार) 98,पुरोहित कुटी, श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी, जिला झालावाड़, राजस्थान     परीक्षाएं समाप्त होते ही। लो अब रिजल्ट भी आ गया। अब कावेरी को बच्चों को स्कूल की चिंता सताने […]

क्या रखा है निर्वीर्य सभाओं में

May 9, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) क्या  रखा    है   वेद   ऋचाओं में, सब     छिपा   है  रक्त शिराओं में। बाँहें    फड़कें ,  भुज   दण्ड   उठे, क्या रखा है, कृत्रिम  आभाओं में। क्या रखा………………………. स्पन्दित   हृदय   भी   सिहर उठे, दोलायमान     […]

एक समीचीन अभिव्यक्ति

May 6, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे दोस्त! तुम्हारा चेहरा आज दल-परिवर्त्तन करता दिख रहा है। तुम्हारी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा की गाथा पैवन्द लगीं चादरें सुना रही हैं। लोलुपता और लिप्सा तुम्हारे चरित्र की पटकथा को आमिशाषी बना रही […]

अब कब तक रामराज के ख़्वाबों को पालोगे?

April 29, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चैनो सुकूं हो मुल्क में, कुछ सोचिए हुज़ूर! ग़द्दार हैं सब दिख रहे, कुछ सोचिए हुज़ूर। सरहद पे गोली खा रहे, फ़ौजी को देखिए, भाषणबाज़ी से क्या होगा, कुछ सोचिए हुज़ूर। सौ […]

ज़ेह्न में वह घूमता सवाल की तरह

April 28, 2018 0

– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वह बिछड़ता है, कमाल की तरह, हवा हो जाता है, रुमाल की तरह। कहाँ से लाऊँ लौटाने की तरक़ीब, ज़ेह्न में वह घूमता सवाल की तरह। अच्छा है वह कहीं और […]

भाषाओं की बिन्दी है

April 25, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मञ्च नहीं तो रञ्च नहीं है, संग मातु ग़र हिन्दी है। पुण्यप्रसूना विलसित दूना , भाषाओं की बिन्दी है।। मञ्च नहीं तो रञ्च……………………..………।।१।। शुभ्र धवलता अतुलित ममता, समता और सुनीता है। भाग्य […]

समय पूर्व पक जाओगे

April 24, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) अधनंगे को नंगा करके ,पहना दो दया का चोला, आत्मबल न जगा सके,उठाए एहसानों का झोला। ऐसा कोई एक न रखो,जिसमें हो दृढ़ता औ साहस, जिससे सदा ही खेल चले, जिसमें भरा […]

एक अभिव्यक्ति : हर किसी पे भरोसा तुम जताया न करो

April 18, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हर नज़र से नज़रें तुम मिलाया न करो, हर शख़्स से निगाहें खिलाया न करो। कितने एहतियात से तुम्हें सँभाले रखा है, हर किसी पे भरोसा तुम जताया न करो। बेहद ज़ालिम […]

कहाँ सो रहा शौर्य है, सीना दे जो चीर?

April 15, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : ज़बान पर अंकुश नहीं, कैसे हैं ये लोग! प्रेमरोग से विकट है, नेता का संयोग।। दो : नेता-रोग है प्लेग, घर-घर घुसणम होय। देश को चाटें घुन-सा, जन-जन अब है […]

एक अभिव्यक्ति : उसकी चुप्पी क्यों तह होकर रह जाती है चादर में?

April 15, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उसकी हक़ीक़त सिमट कर क्यों रह जाती है, चादर में, अँगड़ाई लेकर वह क्यों सिमट जाता है, चादर में। ऐ हवा! तू उस तक जाकर मेरा यह सवाल करना, उसकी चुप्पी क्यों […]

गाँव ! हमारा बचपन दे दे !

April 14, 2018 0

        गीत  गाँव ! हमारा बचपन दे दे ! वह मिट्टी के सुघर खिलौने । वह काली बकरी के छौने । वह मेरे गुड्डे की शादी , रोती सी गुड़िया के गौने […]

आसिफ़ा और आदमखोर

April 13, 2018 0

-अमित धर्मसिंह उसने अभी दुनिया को देखना शुरू किया था, समझना नहीं, अगर वह दुनिया को ज़रा भी समझती तो वह समझ जाती बलात्कारियों की चाल, उनकी भाषा और पहनावे से पहचान जाती उनके धर्म […]

कुछ अंतर्मन की बातें

April 12, 2018 0

रचनाकार-पवन कश्यप  गीतों ने की आज गर्जना कब तुम हमको गाओगे, अंदर मेरा दम घुटता,कब मुखमण्डल पर लाओगे । कुछ कहने में अनायास ये होठ कांपने लगते है, कुछ अंतस ने हिम्मत की तो शब्द […]

मेरे पास शब्द है तुम्हें जानने के लिए

April 10, 2018 0

आकांक्षा मिश्रा- उसने कहा मेरे पास शब्द है तुम्हें जानने के लिए इतने शब्द हालात सम्भालने के काम आ सके क्या कहूँ ? अभी-अभी हृदय की पीड़ा बढ़ रही तुम अभी मौन हो ये मन […]

एक अभिव्यक्ति : मेरे सिर पर तना अम्बर, मुझे धरती पे रहने दो

April 5, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) चलने दो नियति का चाबुक, मुझे निज  कर्म   करने   दो। मेरे   हिय  में  चला    खंज़र, मुझे  तुम   धैर्य  धरने    दो। कोई ना-क़ाबिल कहे मुझको, उसके आँखों की परख होगी। मेरे   सिर     पर   […]

एक अभिव्यक्ति : चादर की सलवटें अब बेबाक होने को हैं

March 31, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारी बात हम तक रहे तो बेहतर है, हमारा साथ हम तक रहे तो बेहतर है। चादर देखकर हम पाँव हैं पसारा करते, हमारा ख़्वाब हम तक रहे तो बेहतर है। जनाब! […]

अश्रुधार जब बहता होगा

March 26, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद अश्रुधार जब बहता होगा,गालों से कुछ कहता होगा। आँखों से बिछुड़न के कारण,बड़ा दर्द वो सहता होगा।। हृदय प्रकम्पित,अवरुद्ध गला, रग में होती होगी सिहरन, क्या जैसे यह टपक रहा, वैसे  ही […]

कविता : आओ राम हृदयमंदिर में, कब से बाट निहार रहे

March 25, 2018 0

डॉ0 श्वेता सिंह गौर- आओ राम हृदयमंदिर में, कब से बाट निहार रहे, विनती सुनो हमारी भगवन प्यासे प्राण पुकार रहे, तुम बिन नहिं कोउ संगी-साथी तात मात-पितु भ्रात तुम्हीं, हम हैं तुम्हारे ही हे […]

कविता : दुःख का अहसास बड़ा सुख से

March 24, 2018 0

मीतू मिश्रा, हरदोई – दुःख का अहसास बड़ा सुख से सुख में भी संग संग बहता है। सुख पल भर ही हम जीते हैं जीवन भर दुःख को ढोते हैं आंखें हम दम बह उठती […]

धरा पे जल सूख जाएगा तो भला तू कहाँ जाएगा

March 24, 2018 0

‘विश्व जल दिवस’ को व्यक्तिशः चिन्तन दिवस के रूप में मेरी प्रस्तुति जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद) जब जल जल जाएगा तो जलजला आ जाएगा, ग़र ख़ुद ही जल बचाएँगें तो हौंसला आ जाएगा। गरम तवे पे […]

२३ मार्च ‘शहीद दिवस’ पर श्रद्धाञ्जलि स्वरूप जगन्नाथ शुक्ल की शब्दांजलि

March 23, 2018 0

 भारत माँ के अमर सपूत भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को नमन ….. जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) आँखें नम हो जाती हैं, हर सीना चौड़ा हो जाता है, शूली पे चढ़ते वीरों का जब ज़िक्र ज़ेहन में […]

राजनेताओं का महालण्ठ-सम्मेलन

March 23, 2018 0

––० डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ०— मेरा रंग दे बसन्ती चोला। संसद् का है बड़बोला, इधर सुरा, उधर सुन्दरी, भोग लगाये गोला। फगुनाहट की छायी मस्ती, ज़हर है देश में घोला। मेरा रंग दे बसन्ती चोला। […]

कविता : गौरय्या

March 23, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- तू तो चटक निकली– इधर, पलकें अलसायीं  उधर, तू चुग गयी दानें फिर फुर्र हो गयी ? मुझे मालूम है, तू आयेगी फिर कनखियों से ताड़ेगी मुझे अनमने से देखने का उपक्रम […]

‘विश्व कविता दिवस’ विशेष – कविता

March 21, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मन में  उठते   भाव   कभी, जब कागज़ में उगने लगते हैं। शिक्षित और  अशिक्षित   सब, उसको कविता कहने लगते हैं। जब  क़दम  बढ़ाती  है कविता, तब  शेर   निकलने   लगते  हैं। करती  है  […]

कौन यक़ीन करेगा आख़िर माझी ने ख़ुद नाव डुबोयी

March 17, 2018 0

नीलेश सिंह- जब सारी दुनिया थी सोयी जाग रहा था तब भी कोई । उलझा-उलझा है हर कोई कौन करे किसकी दिलजोई । सबकुछ खो बैठी है शायद यूँ रहती है खोयी-खोयी । कौन यक़ीन […]

प्रबल गर्जना कीजिए

March 15, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद भर्त्सना    से  बेहतर  सखे! प्रबल   गर्जन       कीजिए। दश    दिशा   में    गूँज   हो, संघर्ष का नव वर्जन दीजिए। दुष्टता  की   राहें    रुद्ध  कर, साधुता को  अर्पण   कीजिए। ग़र हो   सके तो  मित्र   अब, […]

उन्हें यक़ीं है सत्ता में फिर से क़ाबिज़ होने का

March 14, 2018 0

कतिपय काव्यपंक्तियाँ  डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : वो दिल का क़ातिम (काला) है और कातिल भी, क़ातिब (लेखक) ने उसे क़ादिर (शक्तिशाली) बना दिया। दो : अपनी क़ुबूलियत पे तुम इतराओ मत, तीन : उन्हें […]

वेदना

March 14, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद वेदना         चीत्कार       करती, है     हृदय      को         तोड़ती। मुश्किलों      में      हौंसलों     के, तार      को       नित     खोजती। खीझ  सी   उठती    है   मन    में, है पाषाण सम आँखों को नोंचती। मानो    धमनियाँ     शिथिल   हो, रक्त            […]

अभिव्यक्ति : इक पैग़ाम ‘उनके’ नाम

March 14, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेजान सड़क पे, इक गुमनाम दिख रही, अनजान-सी हक़ीक़त, बदनाम दिख रही। —–इक पैग़ाम ‘उनके’ नाम—– उस हवा को सलाम, जो लहरा रही है ज़िन्दगी, उस धूप को सलाम, जो खिला रही […]

अभिव्यक्ति के स्वर : जीवन को संगीत बना जाओ तो बेहतर है

March 13, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक: उजड़ा हुआ चमन, उजड़ा रहे तो बेहतर है, खिलता हुआ गगन, खिला रहे तो बेहतर है। गुमनाम लोग की दुनिया भी क्या दुनिया, अब वे खुले आम हो जायें तो बेहतर […]

हे! राष्ट्रवीर नित करूँ प्रार्थना, मुझमें भी देशभाव जगा जाना

March 13, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- मातृभूमि की  सेवा  का  प्रण, तुम फ़िर से वीर निभा जाना। देख रहा हिन्द निरीह दृष्टि हो, तुम फिर से धरा में आ जाना। नित  बिद्ध  हो रही भारत माँ, तुम फिर […]

एक अभिव्यक्ति : मुद्दत बाद ज़िन्दगी सयान हुई, उसे सब्ज़बाग़ दिखाओ नहीं

March 12, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशक, चाहो पर सराहो नहीं, बेशक, पाओ पर निभाओ नहीं। मुद्दत बाद ज़िन्दगी सयान हुई, उसे सब्ज़बाग़ दिखाओ नहीं। मस्त-मौला हूँ और फक्कड़ भी, भूले से कभी आज़्माओ नहीं। मनमाफ़िक मर्ज़ी का […]

नारायणी को सताता है

March 11, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) तू मुझसे प्रेम करता है ,या रक्तिम आँसू रुलाता है, कभी अग्नि से जलाता है,कभी तेज़ाब से झुलसाता है। अरे! मानव अहंकारी दुर्बुद्धिकारी, सद्बुद्धि पैदा कर, जो ही तुझको करे पैदा, तू […]

पैट्रोमैक्स और बाराती

March 8, 2018 0

प्रभांशु कुमार लतपथ गहनों आैर चमकीले वस्त्रों  से लदे फदें बारातियों को आैर राह को जगमगाने के लिए पेट्रोमैक्स सिर पर रखे उजास भरते अपने आसपास वे गरीब बच्चे खुद मन में समेटे है एक […]

मेरे अंदर का दूसरा आदमी

March 7, 2018 0

  प्रभांशु कुमार             मेरे अंदर का दूसरा आदमी मेरा दूसरा रुप है वर्तमान परिदृश्य का सच्चा स्वरूप है जिस समय मैं रात में सो रहा होता हूं उसी समय मेरे अंदर […]

व्यक्त-अव्यक्त

March 2, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : जीव-जगत् है पाप में, स्वार्थ यत्र-तत्र-सर्वत्र। धरणीधर नेपथ्य में, कान्ता कन्त कलत्र।। दो : निशि-दिवा-सी घूम रही, घर-घर विपदा आज। सम्मान निरापद कहाँ, पूर्ण न होता काज।। तीन : कंकणी […]

फूटा कुम्भ जल जलहि समानी…

March 1, 2018 0

अमित धर्मसिंह उनकी आँखों में पानी था लाज-शर्म का, रिश्तों की लिहाज का, अपनी हालत पर शर्मिंदगी का पानी भरा था उनके रोम-रोम में। उनके दिल में छुपे दुखों के पहाड़ों से फूटते रहते थे […]

कूड़े वाला आदमी

February 23, 2018 0

 प्रभाँशु कुमार- वह आदमी निराश नही है अपनी जिन्दगी से जो सड़क के किनारे लगे कूड़े को उठाता हुआ अपनी प्यासी आँखो से कुछ ढूंढ़ता हुआ फिर सड़क पर चलते हंसते खिलखिलाते धूल उड़ाते लोगों […]

एक भोजपुरी शोक-गीत

February 20, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इसके पहले कि आप इस शोक-प्रधान भोजपुरी गीत को पढ़ें , समझें तथा अनुभव करें, आपकी सुविधा के लिए इसकी पृष्ठभूमि का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत है :——– एक पिता का शव धरती […]

दुनिया से जाने के बाद

February 19, 2018 0

प्रभांशु कुमार, इलाहाबाद     दुनिया से जाने के बाद रह जाना चाहता हूं दीवार पर टंग जाने के बजाए किसी के लिए किसी अच्छे दिन की अविस्मरणीय स्मृति बनकर रह जाना चाहता हूं धरती की […]

जीता-जागता भारत हूँ

February 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मञ्चों   से  नित   गीता  गाता, औ पढ़ता क़ुरान की आयत हूँ। विविध  धर्म औ  भाषाओं  संग, मैं वो जीता – जागता  भारत हूँ। सुबह   सवेरे    भरता    अज़ान, औ   पूजता   नित   ऐरावत  हूँ। […]

सदा वचन की धनी रहे

February 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) कविते! तेरे तरकश में, मेरी भी वाणी बनी रहे। उदात्त भाव से नित मेरी, मधुर  रागिनी  ठनी रहे। कर्कश न हो शब्द कभी, नित प्रेमभाव से सनी रहे। रिश्तों की हो नित […]

गर्लफ्रेंडन में नथइले तहार बबुआ

February 16, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- रात-दिन उधियइले तहार बबुआ, करेजवा जरवइले तहार बबुआ। ना बुझाला सुझाला ऊ बौका के अब अन्दाजा गरई पकड़े तहार बबुआ। खेत-खरिहान बेचले जेवरवो के ऊ, धूरि आँखी में झोंकले तहार बबुआ। गाँव-नगरी […]

धन्यवाद उस भगवान का जो आप जैसा पिता मिला

February 15, 2018 0

उपासना पाण्डेय ‘आकांक्षा’, हरदोई (उत्तर प्रदेश) मेरा क्या अस्तित्व होता , अगर आप जैसा पिता मुझे न मिलता, हर ज़िद को पूरा किया, हर पल मेरी खुशियों का ख्याल रखा । आप परेशान होते हो, […]

वक़्त ने चाल चल दी है

February 15, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेपर्द: की बात करने लगे, बातों को वे कतरने लगे। ख़ुद को तूफ़ाँ समझते थे, बुलबुला से भी डरने लगे। वक़्त ने चाल चल दी है, हर गोटी को परखने लगे। देखते […]

मन सहकल बनि गइली तहार बबुनी

February 14, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब केहू से अझुरइली तहार बबुनी, घर-अँगना भहरइली तहार बबुनी। मांग पोछाते उ नवका संंघतिया धइली, मुँह करिखा लगइली तहार बबुनी। अइसन कइली पढ़इया सहरिया में ऊ, बावन भतरी कहइली तहार बबुनी। […]

जय हो यूपी बोर्ड परीक्षा की

February 12, 2018 0

अनिल मिश्र- नीक काम एक भवा है अबकी यूपी बोर्ड परीक्षा मा । गुणवत्ता फिरि आई धीरे धीरे बिगरी शिक्षा मा । लागि कैमरा कमरा कमरा ताका झांकी बन्द हुई । नकल समुल्ली इमला बोली […]

कविता – मातृ भाषा हिंदी

February 11, 2018 0

नेहा द्विवेदी- जनता की ये जुबां है, भावों का आसमां है । मातृ भाषा हिंदी भारत की आत्मा है । अगणित भाषा वाले हिंद की पहचान है हिंदी मां भारती की शान है, सम्मान है […]

पूरा देश बन पकौड़ा-सा गया है

February 7, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद सूरज तो कुछ उकता-सा गया है, दिन अब कुछ मुरझा-सा गया है। ये कण्ठ नहीं है अवरुद्ध तुम्हारा, धरा को क्यों उलझा-सा गया है।। सूरज तो………………………… अब मुक्त करो निज बाहुपाश से, […]

एक अभिव्यक्ति : कुछ पेचीदगियाँ रही होंगी ज़रूर, वरना..

February 7, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सारी उम्र खपा दी उसने अपनी मुहब्बत में , तरक़्क़ी सारी गँवा दी उसने मुहब्बत में। ज़ख़्मों पर नमक ही हर बार मिलता रहा, अपनी दोस्ती भी लुटा दी उसने मुहब्बत में। […]

चाँद से रौशनी लेना ज़ियाद: मुफ़ीद है

February 2, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चेहरों की बनावट पे मत जाइए, मोहरों की सजावट पे मत जाइए। अब बारी आपकी चाल चलने की, आँखों की मुसकुराहट पे मत जाइए प्यासे हैं तो जल पी खिसक लीजिए, नदियों […]

गीत- तेरी इन झील सी आंखों में…

January 29, 2018 0

पवन कश्यप (हरदोई) तेरी इन झील सी आंखों में जो ये नूर दिखता है, तेरे चेहरे की मदहोशी में ये मन चूर दिखता है । कहीं जुल्फों का गिर जाना, कहीं अधरों का खिल जाना […]

एक अभिव्यक्ति : पराजित देह की ‘अनश्वर’ पटकथा

January 28, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय     (सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; २८ जनवरी, २०१८ ईसवी) यायावर भाषक-संख्या : ९९१९०२३८७० ई०मेल : prithwinathpandey@gmail.com बिखरे पंख, टूटे पाँव कटे हाथों से दर्द की दवा माँग रहे हैं। […]

खद्दर के सारे धर्म यहाँ, अब ‘कुर्सीवादी’ हो गये!

January 28, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘परिवारवाद’ अलापते, वे परिवारवादी हो गये, जाति-ज़हर घोलते वे, अब समाजवादी हो गये। “बहुजन हिताय” ग़ायब, ख़ुद के हित हैं साधते, पालकर अम्बेडकर भूत, वे दलितवादी हो गये। राममन्दिर बिसर गये, अब […]

एक अभिव्यक्ति : ग़द्दारों की कोई गुंजाइश न रहे

January 27, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय साँठ की कोई गुंजाइश न रहे, गाँठ की कोई गुंजाइश न रहे। ‘सच’ से ऐसी दोस्ती कर लो, ‘भीड़’ की कोई गुंजाइश न रहे। महफ़िल सजाओ ऐसी अपनी, ‘मै’ की कोई गुंजाइश […]

यान्त्रिक ध्वनि है कह रही, वसन्त आ गया!

January 25, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – जोगिया रंग रँगाये, देखो! सन्त आ गया, प्रथा दम तोड़ती, देखो! ‘अन्त’ आ गया! खेतों की हरियाली, अब मुँह है छुपा रही, इधर रुग्ण परिवेश, उधर वसन्त आ गया! काया अब […]

व्यंग कविता (अवधी)- यू०पी० में मचा है हाहाकार

January 25, 2018 0

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (पत्रकार हिन्दुस्तान)- यू०पी० में मचा है हाहाकार चच्चा और भतीजे रूठे, भाई-बाप खिसियायि रहे | हमका दई देव जो भी मांगी, यहु भौकाल दिखाइ रहे | कुर्सी के पीछे मची तबाही, घर-भीतर […]

ग़ज़ल- कोई इंसान, पैदाइश से बागी नहीं होता

January 25, 2018 0

दिवाकर दत्त त्रिपाठी –  वो लेकर गोद में बच्चे को मुहब्बत सिखाती है । वो माँ, जो रोजमर्रा की हमें आदत सिखाती है । ये हिंदुस्तान की तहजीब सिखाती है मुहब्बत , किसी को कब […]

क्या यही है समाज

January 25, 2018 0

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ ऐसे कलुषित समाज में लेकर जन्म वर्ण कुल सब मेरा श्याम हो गया । बड़ी दूषित है सोच कर्म भी काले हैं गहन तम में अस्तित्व इनका घुल गया । देखकर यह […]

गज़ल : अब कहाँ हंसना हँसाना रह गया

January 22, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद अब केवल खाना कमाना रह गया। अब कहाँ हँसना हँसाना रह गया । मुश्किलें जीवन को ,हरपल निचोड़तीं, अब तो केवल , रोना रुलाना रह गया। जो हमेशा ख़ुद को मेरा हमदर्द […]

देखो कलियाँ हैं खिली-खिली

January 21, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद स्वागत है ऋतुराज तुम्हारा, हम बैठे थे खाली- खाली ! आम्रमञ्जरी खिल रही हैं, सुरभित हो रही डाली-डाली! अरहर ,चणक हैं हिले – मिले, सरसों झूम रही फ़ूली – फ़ूली! कोयल रागिनी […]

दीप्तित अचला का हाल है

January 20, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद क़दम  ताल  सीमा  पे  करते, भारत   माता   के   लाल  हैं! राष्ट्र   मुकुट  न  झुकने  पाये, रखे   चरण   निज  भाल  हैं! विपदा राष्ट्र  के पथ जो आयी, दुश्मन को  किये  बे-हाल  हैं! अरि  […]

अब नव विहान की बारी है

January 19, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद नव रश्मियुक्त मार्तण्ड उगा, अब नव विहान की बारी है! कान्तियुक्त   ज्वाज्वल्यमान, कितनी  उत्तम   तैयारी    है! कर दो मुखरित सकल  धरा, इतनी  अरदास   हमारी   है! भ्रमर कमर  कलि  की  छुए, निरखे   ये   […]

मत करना प्रेम व्यापार

January 19, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद नयन अयन उस ओर हैं, जिस ओर मेरे सरकार ! सज़ल नेत्र चातक फिरें, करत फिरें मेघ तकरार! वंशी बजी जो श्याम की, मेघ करने लगे फटकार! भीगीं लटें जो सजन की, […]

आओ! इस सवाल पर अब ग़ौर करें हम..

January 18, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब कुछ उनका मुआफ़ हो गया, मौसम बेचारा अब साफ़ हो गया। कल तक गिलासभरी चाय पीते थे, नोटबन्दी चलते वह भी हाफ हो गया। उलफ़त का तक़ाज़ा समझ न सका, जाने-अनजाने […]

कश्तियाँ नहीं चलती

January 18, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद उस ओर विधायकों के काफिले हैं गुजरते, जिस ओर गरीबों की बस्तियाँ नहीं पड़तीं! उस ओर से गुजरते हैं इनके उड़नखटोले, जिस ओर बारिश में कश्तियाँ नहीं चलती! उस ओर ही बसाते […]

एक ग़ज़ल : सलीक़ा सीखकर भी वे ‘सीख’ न सके

January 18, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आँखों-आँखों में, सलाम ले लिये, बन्द होठों से वे, पयाम ले लिये। लब थरथरा गये, मंज़र को देखते, नज़रें ज्यों झुकीं, वे सलाम ले लिये। होठ खुले, अधखुले, बन्द हो गये, जाने […]

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