जीवन मेरा सरगम जैसा
तेरे प्यार में सजना, तेरी सजनी संँवर रही। सात स्वरों से सजा है संगीत, सात फेरों से सजा है जीवन,सात जन्मों तक मिलें सजना तेरा प्यारतेरे प्यार में सजना, तेरी सजनी सज रही , तेरे […]
तेरे प्यार में सजना, तेरी सजनी संँवर रही। सात स्वरों से सजा है संगीत, सात फेरों से सजा है जीवन,सात जन्मों तक मिलें सजना तेरा प्यारतेरे प्यार में सजना, तेरी सजनी सज रही , तेरे […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चलो!यहाँ से चलते हैं,दुर्गन्ध भी भयानक और घृणित आ रही है।लगता है,मानो कोई आदमख़ोर जानवर,मल-मूत्र मे नहाया हुआ,इधर से अभी-अभी गुज़रा हो;वह अपने हिंस्र नाख़ूनो से,हर मासूम गर्भ मे हाथ […]
सुन मेरे मन के परिंदेआगे ही तू बढ़ता चल।न सोच तू इन राहों काबस आगे ही निकलता चल।न सोच तू राहगीरों कावो भी खुद पंथ पे मिल जाएंगे।न सोच तू इन हवाओं काये भी एक […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रूप-रंग सब बहुत सुहाया। मन से मन को भी अति भाया।।करम-राह भी अति कठिनाई। मंज़िल करमबीर ही पाई।सुनहुँ सुजान सुसील सनेहू। मान न मर्दन होवै देहू।।आधि-ब्याधि सब रूप समाना। विधि-विधान […]
वंदे न्यायभारतम्…!वंदे भारतम्…!सत्यं न्यायविधिप्रदम्सत्पथदर्शितम्…!! वसुधाकुटुम्बकंप्रियम्निष्पक्षनायकम्..!विश्वबंधुत्वघोषकम्सर्वजनसुखकरम्..!!वंदे न्यायभारतम्…!वंदे भारतम्..!! विद्याजीविकाप्रदम्सुविधादायकम्…!सृष्टिसंरक्षकारकम्जनहितसाधकम्…!!वंदे न्यायभारतम्…!वंदे भारतम्..!! राष्ट्रं सार्वभौमिकम्सर्वहितकारकम्…!सत्यसिद्धांतधारकम्न्यायधर्मानुगम्…!!वंदे न्यायभारतम्…!वंदे भारतम्..!!✍️🇮🇳
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–‘तन्त्र’ बपौती बन गया, ‘गण’ घायल हर ओर।‘लोक’ इशारे नाचता, सेंध लगाते चोर।।दो–‘तन्त्र’ ग़ुलामी जी रहा, ‘गण’ फुटबॉल-समान।जाहिल अनपढ़ कर रहे, हम सबका अपमान।।तीन–लोक-लाज को त्याग कर, लोकरहित है ‘तन्त्र’।अन्धा-बहरा […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक―दर्द दवा से दाबकर, कब तक लोगे काम।जीवन जंगल बन गया, दिखते नमकहराम।।दो―टन्-टन् टोना-टोटका, टप्-टप् टपके झूठ।सोचो! सच सोता नहीं, सोच-सोचकर रूठ।।तीन―माया-मोह विमुक्त हो, छल-छर१ से हो दूर।सत्य सदा संशयरहित, […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कहें देश की बेटियाँ, शासक धोखेबाज़।हाथी-जैसे दाँत हैं, उगल रहे हैं राज़।।दो–चुप्पी साधे दिख रहा, घर का चौकीदार।चोरों से है जा मिला, ले रूप ख़रीदार।।तीन–होता शोषण यौन का, सबको इसका […]
Prisha, a girl with mellifluous voice and cheerful personality believes that one could create his/her own world. Her peculiar ways of looking at life is her individuality. She believes that one should enjoy little things […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आइए! मेरी ‘वर्ल्ड-फ़ेमस’ दुकान मे तशरीफ़ लाइए।जनाब! मै प्यार बेचता हूँ।अनोखा प्यार और निराला प्यार :―किसिम-किसिम का प्यार;तरह-तरह का प्यार;भाँति-भाँति का प्यार;नाना प्रकार का प्यार;विविध प्रकार का प्यार;पृथक् प्रकार का […]
आ गई खुशियों की बहार,लोहड़ी मनाने को हो सब तैयार ।लोहड़ी है सबको भायी,घर घर खुशियां लायी।खुशी-खुशी लोहड़ी मनाते हैं,एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं।हर प्रकार के पकवान बनाते हैं,इस त्यौहार की शोभा बढ़ाते हैं।मूंगफली […]
हम गरीबों का मसीहा कौन है?चांँद से बातें करता हूंँ , सिर पे मांँ – बाप का हाथ नहीं,पर , छोटे भाई का साथ है ,अब खोने को कुछ बचा क्या है!अपना कोई ठिकाना नहीं […]
हालात मत पूछिएबदलते रहते हैं।समय मत पूछिएगुजरता रहता है।मोहब्बत मत कीजिएहोती रहती है।दिल्लगी मत कीजिएदिलदार औरो से भीदिल लगाते रहते हैं।परिस्थिति मत देखिएस्थिति बदलती रहती है।हमसफर जल्दीमत बनाइएहमराही बदलते रहते हैं। राजीव डोगरा (भाषा अध्यापक)राजकीय […]
याद आते हैं वह दिन ,जब हम साथ होते थे।लड़ते झगड़ते फिर मनाते ,वो दिन भी क्या खास होते थे।जो कभी हमें खास समझते हैं,वह अब अनजान बनकर फिरते हैं।अब कितनी बातें छुपाते हो ,जो […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक– ठिठुरन ठिठकी ठण्ढ मे, टूट देह की जोड़। माघ-पूस की शीत मे, धरती पड़े न गोड़१।। दो– हवा हवाई हाल है, ख़तरे मे मुसकान। जीव-जगत् जड़ दिख रहा, जाड़े […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक– दिल दिमाग़ से दूर है, मति-गति भी है दूर। बन्द दिखें आँखें खुलीं, अच्छे हमसे सूर।। दो– रूप रूपसी से कहे, रुतबा का नहिं जोड़। रूप-रंग१ रचना रचे, रूपक […]
जनवरी लाती है नव वर्ष ।दिसम्बर जाता है हर वर्ष ।नवल उत्साह, तरंग, उमंग,वर्ष भर चलते हैं संघर्ष ।। सुनहली प्रात, रुपहली शान ।प्रभाती सुमधुर पंछी गान ।विविध रंग पुष्प, वल्लरी-रास,प्रकृति अवलोकन देता हर्ष ।। […]
नये साल मेंएक नए युग काआगाज होगा।महाकाल महाकालीके भक्तों काजय-जयकार होगा।छाया था जोजीवन में घोर अंधकारउसमें भीप्रकाश होगा।हार चुके हैंजो हम दावउसमें भीजीत का आयाम होगा।करते हैं जोहमसे नफरतनए साल मेंउनको भीहमसे प्यार होगा। राजीव […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे विश्वसनीय एकवर्षीय सहयात्री!अपने बलिष्ठ कन्धों पर,तीन सौ पैंसठ दिवसीय अनियन्त्रित-नियन्त्रित भारप्रतिक्षण लादकर,अनवरत-अनथक यात्रा करते-करते,तुम अतीतोन्मुख होते जा रहे हो।त्वरित गति मे कृषकाय१ होते,तुम्हारे स्कन्धप्रान्त२,अब क्लान्त३ हो रहे हैं।तुम श्रान्त४ […]
प्रान्शुल त्रिपाठी, रीवा, मध्य प्रदेश चलो फिर से नए जोश नए उल्लास से नववर्ष मनाते हैं,रह गए थे जो सपने अधूरे अभी उन्हें अब फिर से सजाते हैं ।कौन अपना कौन पराया इस भेदभाव को […]
अखबार तो अखबार होता है। बीते दिन क्या हुआ कहां, क्या कल होने वाला।आज कहां पर कैम्प लगेगा, कौन है आने वाला।।अखबार में लिखी खबर पढ़के, एतबार होता है।अखबार तो अखबार होता है।। एक बार […]
मत वहन करो मेरे विचार कोमुझे भी नहीं चाहिएतुमसे अलंकार के भूषण।मत वहन करो मेरी वाणी कोमुझे भी नहीं चाहिएतुमसे छंदों के बंधन।मत वहन करो मेरे अंतर्द्वंद कोमुझे भी नहीं चाहिएतुमसे परिछंदों के द्वंद।मत वहन […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जीभर आँखें खोलो! देखो इन नामर्द दरवाज़ों को; सिटकिनियों के इशारे पर नाचते आ रहे हैं। भीतर का माहौल अघोषित आपातकालीन इन्तज़ामात१ के हवाले है। हवा बेचैन है; दरवाज़े को […]
इस भागदौड़ की जिंदगी में किसी के पास वक्त नहीं ,कुछ अपनों के लिए समय निकालें ,वरना ,जिंदगी यूँ ही निकलती जा रही ,हम अपनों के साथ वक्त नहीं बिता पा रहे हैं ,परिवार के […]
दिन छोटे रात लम्बी होने लगीगुनगुनी धूप छत पे उतरने लगी।बढने लगी हाँ ठिठुरन बढने लगी। आ गई ठण्ड रजाई ले लीजिए,दूध के संग मलाई ले लीजिए।बाजरे की रोटी; बेसन की करी,घी-मक्खन की तराई ले […]
फिर एक बार दिसंबर जा रहा है माहे जनवरी आ रही है,बहुत खुश दिख रहे हो क्या सुकून कि घड़ी आ रही है,ये तो बताओ दिन तारीख साल के सिवा कुछ और भी बदलेगा,या जो […]
माँ तू मेरे जीवन की वो बुनियाद हैजिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहींमेरे बिना बोले मेरे चेहरे सेमेरे दिल की हर इक वो बात बूझ लेती होजिसे मैं बोल नहीं पातापरछाई की तरह चलती है […]
बारिश की वो पहली बूंदे कलियों कीपलकों पर बैठकर टिमटिमाई होंगी,बहती हुई बयारों से लिपटकर सर्दनन्हीं शबनम छुपकर के नहाई होगी। दरीचों से निकलकर के महीन बूंदेंफिर प्रांगण मे चुपके से गिरी होंगी,कमरे के नर्म-नर्म […]
ग़ज़ल : बह्र- 2212 2212 2212 निहाल सिंह, झुञ्झनू, राजस्थान फूलों के जैसे मुस्कराई बेटियाँभंवरों के जैसे गुनगुनाई बेटियाँ। माँ, बेटी, अनुजा और तिय के रूप मेंरिश्ता वो सब से ही निभाई बेटियाँ। बेटे की […]
मुझे आक्रोश है आज भीउन लोगों से जिन्होंनेमेरा साथ तब छोड़ाजब मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी। मुझे आक्रोश है आज भीउन लोगो से जिन्होंनेमेरी मोहब्बत को तब ठुकरयाजब मुझे किसी के प्यार की जरूरत थी। […]
बाबूजी! कहांँ चलना है?आ जाइए ! मेरे रिक्शे में बैठिए!आप घबराइए नहीं मैं आराम से चलूंँगा ,मुझे कहीं गड्ढा या ब्रेकर मिलेगामैं रिक्शा की गति धीरे कर लूँगा। अम्मा आओ!पहले बैग हमको थमा करआराम से […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरी नामर्दगी, मर्दों की टोली का नेतृत्व कर रही है। भोले-भाले ज़बाँ पर लगे तालों की चाबियाँ, मुखिया की जेब मे हैं। वह ललकारता है :– हैसियत हो तो जेब […]
बड़े बुजुर्गों से मिलता आशीर्वादबेटी तुम हो! माँ सीता! जैसी;त्याग समर्पण की देवी, साक्षात् लक्ष्मी ,जिस घर में जाओगी बिटिया!वह घर ख़ुशियों से भर जाएगा ,मांँ सीता के जैसे ही ; तुममें प्रेम है,धैर्यता ,गंभीरता […]
मेरे प्यारे बच्चों सुनो!बड़े भाग्य से मानुष तन पाया ,आओ , इस जीवन को सार्थक कर लें ,किस उद्देश्य यह जीवन मिला ,आओ , हम इसको जाने ,एक – एक पल बड़ा है मूल्यवान ,रात्रि […]
आकांक्षा मिश्रा, उत्तर प्रदेश अनन्त प्रतीक्षा बादतुम्हें मैंने पायाएक बार न कोई सवालन कोई जानने की जिज्ञासा मेरे हृदय में कुछ पीड़ाउमड़ रही थीतुमसे शिकायत करकेजी हल्का करना चाह रही थीऐसा न हुआमन की चिंताओं […]
हे! जलजीवनतुम मस्त रहती हो अपनी दुनिया मेंना तुममें भेदभाव की भावनातुम प्रेममयी होतालाब, नदियांँ, सागर की तुम रानी होअहं नहीं तुमको अपनी सुंदरता पर।रंग-विरंगी दिखती होतुम तो मेरे मन को भाती हो,जल से करती […]
हमारी सूझबूझ हमारे जीवन को सफल बनाती है,सफलता मिलें जिंदगी में,कभी-कभी मुझे शतरंज की चाल चलनी पड़ती है। मैं सोच समझकर निर्णय लेती हूँ,नित कदम आगे बढ़ाती हूँ,कठिन परिस्थितियों में भी! समस्या का समाधान करती […]
अपने थे या बेगानेकोई पता नहीं।गम देगे या खुशियांकोई पता नहीं।मुस्कुरा कर गए यारुलाकर गएकोई पता नहीं।हंसते हुए रुला गएया रुलाते हुए हंसा गएकोई पता नहीं।बेनाम का नाम कर गएया फिर बदनाम कर गएकोई पता […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उखाड़ फेंको उस बूढ़े बरगद को, जो समावेशी चरित्र भूलकर आत्म-केन्द्रित हो चुका है। उसका समन्वयवादी चरित्र एकपक्षीय बनकर रह गया है। वह अन्य बीजों के अंकुरण होने, पौधों के […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशर्म निगाहों का भ्रम तोड़िए हुजूर!झूठी आदतों को आप छोड़िए हुजूर!मर रहा आँखों का पानी आपका हर बार,बिखरा है देश अपना, उसे जोड़िए हुजूर!सब्ज़बाग़ देखकर आँखें गयी हैं थक,नज़रें ज़ुम्लेबाज़ी […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• खेती-किसानी है जल रही, शासन की नीति है खल रही। कौन-सा गुनाह था किसानों का? उनकी ख़ुशी हाथ है मल रही। धोखा बना आश्वासन का सूरज, चहुँ दिशि बदली […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय तुम्हारी पूर्णतारास नहीं आती मुझे;क्योंकि तुम द्रुतगामी प्रकृति से युक्त हो।हाँ, मै अपूर्ण हूँ।तुम मुग्ध हो, अपनी पूर्णता परऔर मुझे गर्व है, अपनी अपूर्णता पर;क्योंकि आज मुझेएहसास हो रहा है :–रिक्तता […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रूप ने कला से कहा :–तेरा दृष्टि-अनुलेपन है अनुपम,तू रूप को सुरूप करती है।विरूप को कुरूप रचती हैतू सुरूप को विद्रूप बनाती है।तू रंग-रोगन करती हैऔर उकेरी गयी व्यथा-कथा को,एक […]
कृतियाँ :– ‘मीडिया और प्रेस-विधि’ और ‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ ‘सामयिक प्रकाशन’, दिल्ली (स्वामी– श्री महेश भारद्वाज) से एक साथ प्रकाशित हुई थीं और आज ही के दिनांक (२६ नवम्बर) मे हस्तगत हुई थीं। दोनो ही पुस्तकें […]
शून्य मैं अपने जीवन सेजब कभी हताश होती हूंँ , देख शून्य की ओरअपनी व्यथा सुनाती हूंँ। मौन होकर वह मुझे सुनता ,मेरे मन का बोझ हल्का होता , चेतना प्रकाश से कहती –उसकी चुप्पी […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जुम्हूरियत१^ को नंगा दिखाओगे कब तक? बेशर्मी की सीरत२ दिखाओगे कब तक? जाहिल-मवाली दिखे हैं हर जानिब३, लुच्चों को सिर पे बिठाओगे कब तक? तवाइफ़^ से बढ़कर सियासत है दिखती, माख़ौल […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरी अनहद१ बाँसुरी प्रलय की धुन सुनाती है। कातर२ आँखें, जन-जीवन से पृथक् दृष्टि-अनुलेपन३ करती हैं, काल के कपोलों पर। मुझ पर दृष्टि चुभोती, विहँसती, अल्हड़ गौरैया पंख झाड़ फुर्र […]
कल की ही बात ( 20 नवंबर, 2022) है, मैं अपने ही शहर में अपनी बेटी को पुलिस लाइंस के पास कोचिंग छोड़ने गई थी। तब मैंने सोचा! स्कूटी में तेल नहीं है, चलो पास […]
आज अपनी तारीफ खुद ही कर लेते हैं। हमारी सेहत का राज यह है कि हम लंच करने के बाद टहलते जरूर हैं। गर्मियों में ऑफिस के आसपास ही टहल लेते हैं और सर्दियों में […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आस्थाविश्वासआश्वासनश्रद्धाभक्तिसमर्पणसाहित्य के विषय हैंऔर सिद्धान्त के भी।व्यवहार के जगत् मेइनका प्रयोजनछल-प्रपंच से है।स्वजनदुर्जन बन जाते हैं।एक निर्वात् दृष्टिबोधप्रकट होता है,और चरित्र परदृष्टि-अनुलेपन कराकरअन्तर्हित हो जाता है।अकस्मात् चिर-संचितक्षणिक विश्वास भीकापुरुष बन […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय शरीर मुझसे दूर जा रहा है,वा शरीर से दूर जा रहा हूँ।अशरीरी रहकर जीवन की कल्पनासमृद्धि के अन्तिम छोर पर अडिग खड़ी है।चर्मचक्षु से परे अपरा-पराविद्याका स्मृति-वातायनमन-गाम्भीर्य का दोहन नहीं […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे चेहरे पे जो चेहरा है,हक़ीक़त बयाँ नहीं करता;वह चिटकता भी नहीं।उसका पारदर्शी चरित्रअक्खड़ बन चुका है।भेद की एक अबेध्य नगरी,उसके आस-पास बसा दी गयी है।उसमे अपने हैं; पर रास […]
संघर्ष में आनंद छुपा है ,उसे ढूंँढ लेना तुम! फूलों की तरह खिलना तुम!कांँटों के बीच में रहकर भी!ज़िंदगी में आगे बढ़ना,और जीवन को समझना,फूलों की तरह मुस्कुराना सीख लेना तुम! आता है उतार – […]
‘सर्जनपीठ’ की ओर से सारस्वत सभागार, लूकरगंज, प्रयागराज मे ‘बालरसरंग : बड़ों के संग’ के अन्तर्गत ‘बालसाहित्य का होता ह्रास’ विषय पर १३ नवम्बर को एक परिसंवाद का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि पूर्व-ज़िलाधिकारी और […]
अभी नहीं मैदान तय, ठोंक रहे हैं ताल।मुझको भी भविष्य में शायद, मिल जाये कुछ माल ।। चढ़ा बुखार चुनाव का, कर्मठ हुए अधीर ।नौसिखिये भी हो चले, सैद्धांतिक वीर ।। सेवा करूँ समाज की, […]
उसने कहा कि मेरे सिवा उसका कोई अपना नहीं है हमने कहा अच्छा , और हां सुनो मुझे न तुम्हारे सारे दुख बाटने है हमने कहा अच्छा , मुझे तुम्हारी स्माइल, तुम्हारी आंखें, गाल पर […]
कोई भी मौसम आए और जाए ,मेरा दिल तेरे लिए ही धड़केगा बदल जाए ज़माना ,तेरा दीवाना न बदलेगा। मैंने तुझसे , जो वादा किया ,तेरा आशिक़ निभाएगा। मुझ पर भरोसा कर लो ! तुम […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–इधर लाश-अम्बार है, उधर चुनावी बोल।लज्जा हँस-हँस घूमकर, पीट रही है ढोल।।दो–लोग बने लतख़ोर हैं, आँख हुई हैं बन्द।नेता हैं सब जानते, रचते तब फरफन्द।।तीन–अन्धेरा भीतर भरा, बाहर दीप-प्रकाश।भूख देह […]
काश! तू मेरे पास होताजिंदगी में कोईगम न होता।अपना हाथमेरे सिर पर रखता।काश! मेरा भाईमेरे पास होता।यूं तो बहुत हैतेरी जगह परपर जहां तेरी जगह होती हैवहां कोई ओरनहीं होता।काश मेरा भाईमेरी जिंदगी में होताजिंदगी […]
हर जगह हरियाली छायी है,पेड़-पौधों ने हरियाली बिछायी है ।हर जगह रंगीन नजारा है,यह रंग-विरंगे फूलों ने बनाया है ।भोले-भाले लोग वहां,हिमाचल जैसा देश हो जहांलड़ाई-झगड़ों से दूर है रहते,एकदूसरे में प्यार की भावना को […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हुस्न की रंगत,चाह की संगत;अब ‘भाती’ नहीं।तनहा-तनहा तन,रीता-रीता मन;अब ‘साथी’ नहीं।उदास है घोंसला,ज़ह्र-ज़ह्र पर्यावरण;चिड़िया ‘आती’ नहीं।प्रकृति नहीं स्वच्छ,वायुमण्डल विषाक्त;कलुषता ‘जाती’ नहीं। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ नवम्बर, […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय काल के कपोलों पर,अप्रत्याशित शैली मेजैसे ही मैने अधरों से हस्ताक्षर किये,वह संन्यस्त-सा भाव लिये बोला,“तुमने भेद जिया का क्यों खोला?”मेरा मन भोला, कुछ नहीं बोला। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय नूरानी१ चेहरा सोता रहा, चश्मोचिराग़२ रोता रहा। मसाइल३ से वाक़िफ़ रहा ही कहाँ, ख़ुद-से-खुद-को ही ढोता रहा। अन्दाज़े बयाँ चश्मे नम४ का यहाँ, ज़ेह्न५ मे जाने क्या बोता रहा। कश्ती […]
कुछ ख्वाब कुछ यादेंमुझ में रहने दोन मिल सको तो न मिलोखुद को मुझ में ही रहने दो।बीता हुआ वक्त औरबीती हुई बातेंकभी लौट कर नहीं आती,मगर फिर भीउन यादों कोमुझ में सिमटे रहने दो।जो […]
बड़ी धूमधाम से आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे ,गली-मोहल्लों में भारत के शूरवीरों की गाथा गायेंगे। सत्य, अहिंसा, प्रेम के पुजारी बापू का दर्शन हम अपनाएंगे,बैरी ना माने तो आजाद बनकर दिखलाएंगे। मातृभूमि की रक्षा […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सूरज को शर्मिन्दा होने दे, चाहत को परिन्दा होने दे। हिम्मत को सजा ले होठों पे, ज़ालिम को दरिन्दा होने दे। ज़ुल्फ़ों को झटक दे चेहरे से, औ’ ख़ुद को […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय दीपवर्तिका की ज्वलनशीलतालोकमानस की सहनशीलता।पृथक्-पृथक् पथ पर परिलक्षितदो समानान्तर दूरी पर गतिमान।संवाद-हेतु अवकाश पर प्रश्नचिह्नकिस-हेतु लोक का दीप-प्रज्वलन?मात्र आमोद-प्रमोद का विज्ञापन?दीप-प्रज्वलन निहितार्थ से नितान्त परे,प्रकृतिसंहारक मनोवृत्ति का प्रदर्शन?प्रतिस्पर्द्धा का नग्न […]
जागो एक बारअपनी अंतरात्मा कीआवाज़ के लिए।जागो एक बारअपने हृदय में पनपत्तिअभिलाषाओं के लिए।जागो एक बारअपने अंतर्मन में छिपीसत्यनिष्ठा के लिए।जागो एक बारअपनी स्वतंत्रता कीमर्यादा कोकायम रखने के लिए।जागो एक बारस्वयं के अंतर्मन में छिपीअंतरात्मा […]
तेज रफ़्तार से मैं चलती रही,कभी पीछे मुड़ के देखा नहीं ,करना है जीवन में बहुत कार्य,घर – परिवार से लेकर बाहर तकमैं तेज रफ्तार में दौड़ती रही,तनिक भी नहीं किया आराम,समय एक दिन वह […]
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’– मृत्तिका निर्मित दीये से है अमावस काँपती। जलते हुए नन्हें दीये से डरकर निशा है भागती। दीपक-देह की अभिव्यंजना से रात जगमग हो रही। दीपकों के धर्म से रात भी अब […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय किसी स्थान पर करोड़ों की संख्या मे लोग उपस्थित थे। वहाँ के एक चतुर-चालाक मालदार सेठ ने डुगडुगी पिटवा दी थी– सुनो-सुनो! देश के बेरोज़गार युवक-युवतियो! सरकारी फ़र्मान (‘फ़रमान’ अशुद्ध […]
तुमसे मिलने आई थी ,कहनी थी तुमसे एक बात ,तुमको देख कर भूल गई ,तुम्हें देखती रह गई सारी रात ,बात अधूरी रह गई। दिल का क्या सुनाऊँ तुम्हें हालतेरे सिवाय ना आए कोई ख्यालमन […]
मैने जिसे चाहा , वह चाहता किसी और को ,जिसके लिए मैं तड़पी, वह तड़पा किसी और के लिए ,मैंने जिसे बेपनाह प्यार किया , वह प्यार किया किसी और को ,मैं जिसके लिए रोई […]
नफ़रत सोच समझ कर करनामोहब्बत होने केआसार होते हैं। बात सोच समझ कर करनाइश्क से सबनासार होते हैं। दिल की बात सोच समझ कर करनाअपनों में भी कईगद्दार होते हैं। हमराही को हमसफर सोच समझकर […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हास कोइतिहास मत बनने दो;उपहास को,परिहास मत बनने दो।आगत-अनागतथाली मे तेल-बाती लिये,प्रतीक्षा सह रहे हैं;बाट जोह रहे हैं; उस पल का,जब तुम अपने होनेअथवा न होने की प्रतीति का,अनुभव कराओगे।मेरे […]
जल है सबके लिए अनमोल,इसका नहीं है कोई मोल।जल है जीवन का सार,मत करो इसे बर्बाद।पानी से है जीवन की आस,इसे बचाने का करो प्रयास।जल की एक एक बूंद है कीमतीइसमें ही सबकी जान है […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ग़म-ख़ुशी का फ़र्क़, महसूस होता है;यहाँ न कोई अपना, महसूस होता है।सौग़ात में मिलता रहा, दर्द का पिटारा;रिश्तों में दरार, अब महसूस होता है।जवानी ने भी छीन लीं, किलकारियाँ;बचपन बुढ़ापे-सा, […]
तुम भूल गए हो या याद हूंँ मैंअपनी धुन में खोए हुए रहते हो ,मन में आस लिए , तेरी राह में ,पलकें बिछाए बैठी रहती हूँ । कहीं खो गई हूंँ या याद हूंँ […]
जो चेहरे परनकाब लिए फिरते हैंअक्सर वही मोहब्बत केआसार लिए फिरते हैं।बोलना है तोकुछ बोलिए जनाबक्यों ऐसे चेहरे परमुस्कान लिए फिरते हैं।लबों से लबजोड़ ही लिए हैं तोबोलिए कुछ जनाबक्यों आंखों केइशारे किए फिरते हैं।लिखना […]
आज दशहरे की घड़ी आयी।झूठ पर सच की जीत है आयी।रामचंद्र ने रावण मारा।तोड़ दिया अभिमानी काअभिमान सारा।एक बुराई रोज हटाओ।और दशहरा रोज मनाओ।विजय सत्य की हुईं हमेशाहारती सदा बुराई आयी।जिसने भी अभिमान किया हैउसने […]
विजय सत्य की हुई हमेशाहारी सदा बुराई है।आया दशहरे का उत्सवकरनी सबकी भलाई है।बुराई को जलाना हैदशहरे का उत्सव मनाना है।अब नहीं और हमें बुराईको बढ़ाना है।दशहरे के दिन हमें अपनेअंदर के रावण को जलाना […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पत्नी उवाच :–सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़।कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।।हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह।खटपट भी होता रहे, अलग न होगी […]
दशहरा आयादशहरा आयाबच्चों ने है ।रावण का पुतला बनायाराम बनकरआग वाला तीर चलाया।फटे पटाखे, फेंके फूल,बच्चों ने खुशियाँ मनायीं भरपूर।दिवाली के 20 दिनपहले है आता।रावण हर शहर मेंजलाया जाता।दूर-दूर से लोगदेखने है आते।इसलिए कुल्लू का […]
दशहरे का त्यौहार है आयासबके लिये खुशियों की सौगात है लाया।दशहरे का है यह त्यौहारअच्छाई पर होगी बुराई की हार।सदियों से यह त्यौहार मनाया।राम के हाथोंरावण का पुतला जलाया।हमको भी अपने दिल सेबुराई को मिटाना […]
जन-जन कीपरंपरा है दशहराजिसे मनाता हैपूरा हिंदुस्तान हमारा।आओ मिलकररावण को जलायेऔर इस त्यौहार कामहत्व सबको बताएं।जलता हुआ रावणदिखलाकर सबकोबुराई पर अच्छाई कीजीत दिखलाएं। वंशिका, 7वीं की छात्राराजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक, गाहलिया, कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
5 अक्टूबर को एक त्यौहार आया है,इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है।दशहरे के नाम से इसे पुकारा जाता है।श्री राम ने इस दिन विजय पाई थी,रावण के साथ बुराई […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चिन्दी-चिन्दी रातें पायीं,फाँकों में मुलाक़ात रही।मुरझायीं पंखुरियाँ देखीं,सहमी-सकुची बात रही।बेमुराद आँसू हैं छलके,याद पुरानी घात रही।दुलराते बूढ़े ज़ख़्मों को,बची-खुची बस रात रही।दौड़ा-धूपा हाथ न आया,परवशता की लात रही।भूखा पेट मौन […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरी निगाहों की भाषा मत लिख!मेरी नज़रों की आशा मत लिख!देख! मंज़र जवाँ हो रहा हौले-हौले,मेरे नेत्रों की अभिलाषा मत लिख!तुझे बूझते-बूझते बुझता जा रहा,मेरी आँखों की परिभाषा मत लिख!ज़माना […]
——०एक अभिव्यक्ति०—— ● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कोई कट गया उनकी नज़रों से,पर्द: हट गया उनकी नज़रों से।झुकीं निगाहें क़ह्र बरपाती रहीं,मन फट गया उनकी नज़रों से।ग़ैरों मे शामिल थे और अपनो मे,अपना बँट गया […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय केने से तू अइलू,केने से तू गइलू।अदतिया न छूटलि,घींच-घाँच के खइलू।सोगहग भा खाँड़ी-चुकी,मिलल जौन पइलू।नीमन भा बाउर,अपना मन के कइलू।पहले रहलू करियठ,चीकन अब कहइलू।तुहूँ ए लोकवा में,अपना लेखा भइलू। (सर्वाधिकार सुरक्षित– […]
●आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति।मन्दिर मे मूरत दिखे, उड़न-छू हुई शक्ति।।दो–पट्टी बाँधे आँख मे, देश जगाता चोर।भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब शोर।।तीन–अजब-ग़ज़ब के लोग हैं, शर्म-हया से […]
हम अपनों के बिन अधूरे हैं ,छोटा सा जीवन ! देखा है हमनेअपनों के बिन, ये जिंदगी अधूरी हैहम अपनो के बिन अधूरे हैं। छोटा सा जीवन!सपने हैं मेरे बस इन्हीं से, देखा है हमने,बिन […]
सुधीर अवस्थी परदेसी (ग्रामीण पत्रकार) : वर्तमान में अखबारों को पत्रकार नहीं कमाऊ पूत चाहिए। जोकि संस्थान को अच्छे से अच्छा विज्ञापन कलेक्ट कर के दे सकें और अखबार की प्रसार संख्या को लगातार बढ़ाते […]