बुरे वक़्त का आना इत्तेफ़ाक़ ही समझते रहे हम
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” दिल में बस जाना फिर रूठ के चले जाना हमदम कभी मान जाना तो कभी बे-ख़ता सताना हमदम । जोड़ता फिर रहा हसरतें मुहब्बत की राह में सनम इक छोर से तुझ पर आके […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” दिल में बस जाना फिर रूठ के चले जाना हमदम कभी मान जाना तो कभी बे-ख़ता सताना हमदम । जोड़ता फिर रहा हसरतें मुहब्बत की राह में सनम इक छोर से तुझ पर आके […]
कवि :- राजकुमार जैन “राजन” पृष्ठ:- 120 मूल्य:- 240/- प्रथम संस्करण:- 2018 प्रकाशक:- अयन प्रकाशन,1/20,महरौली, नई दिल्ली 110030 समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित” कवि, साहित्यकार बाल साहित्यकार राजकुमार जैन “राजन “की कृति ‘खोजना होगा अमृत कलश” […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़िराक़ एक फक्कड़ व्यक्तित्व का नाम है। पाँव से सिर तक की उनकी सभ्यता देखने के बाद कोई भी व्यक्ति एक बार ठिठक कर रह जाता था। उनकी टोपी से बाहर निकलने […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उठती है हर लहर आँखों के सामने , गिरती है हर लहर आँखों के सामने। सभ्यता की अगुवाई बेहयाई कर रही, आँखों का पानी मर रहा आँखों के सामने। पाक़ीज़गी से […]
— प्रदीप कुमार तिवारी सकल जग का ये सकल खेल मानव शेर तो प्रकृति सवा शेर छोटा वार मानव बार-बार करता उसके ऊपर प्रकृति का एक ही वार भारी पड़ता झूठी कहानी है यह कि […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इंसाँ झूठे होते हैं इंसाँ का दर्द झूठा नहीं होता इन होंठों पर भी हंसी होती गर अपना कोई रूठा नहीं होता। मैं जानता हूं कि आंखों में बसे रुख़ को मिटाया नहीं जाता, यादों में समाये अपनों को भुलाया नहीं जाता। रह–रहकर याद आती है अपनों की ये ग़म छुपाया नहीं जाता, सपनों में डूबी पलकों की कतारों को यूं उठाया नहीं जाता। इंसाँ झूठे होते हैं इंसाँ का दर्द झूठा नहीं होता इन होंठों पर भी हंसी होती गर अपना कोई रूठा नहीं होता।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ बूढ़े दरख़्त पहले से ज़्यादा हवादार हो गये इश्क़ में हम पहले से ज़्यादा वफ़ादार हो गये । उनसे दिल की बात कहने का हुनर सीख लिया लब-ए-इज़हार पहले से ज़्यादा असरदार हो गये […]
युगपुरुष को सादर श्रद्धांजलि डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी साँसो का बंधन तोड़ , यादों की गठरी छोड़ , राष्ट्रपंथ के पथिक , तू भला किधर गया ? एक युग ठहर गया ………… वह थे अजातशत्रु, […]
अटल के पटल बन्द हों सब विकल, उनकी पीड़ा नहीं अब सही जा रही। अपने हों या पराए दुखी सब दिखें, उनके दर्शन को जनता झुकी जा रही।। अब तक जो किया और जैसा रहा, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सुगबुगाहट हो तो, अब आग उठनी चाहिए, हो कहीं भी आग तो, आग लगनी चाहिए। बहुत सोये हो तुम! अब जग जाने को सोचो, उठाओ अब मशाल, लपट उठनी चाहिए। बूढ़ा भारत […]
दीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761 सत्ता चरित्र है बड़ा विचित्र सत्ता चरित्र, उजले चेहरे धुंधले होते हम आम सुधी जन, लाख जतन कर सच्चाई को समझ ना पाते हाथ रगड़ते फिर पछताते ।। […]
प्रदीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761 गिरती है सीमा पर लाशें चैन से हम तुम सोतें हैं। भूख से व्याकुल बच्चे उस दिन, सैनिक के घर रोते हैं।। हम शहीद कह के उनको, काम […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (पत्रकार, बघौली, हरदोई) ऊँश्री गुरूवे नमः गुरू सर्वोपरि 15 अगस्त 2018 स्वतन्त्रता दिवस अमर रहे ! राष्ट्रीय पर्व के अवसर मौलिक मनभावों के पुष्प आदर श्रद्धा से सादर समर्पित हैं। (1) देश […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ छोटे से दिमाग़ में बसा ली है दुनियाँ चारों और कौन देखता है चौतीस हो गयीं बर्बाद मुजफ्फरपुर कौन देखता है । उन्नाव, सूरत, मणिपुर, दिल्ली कौनसा हिस्सा बचा मेरे हिन्दुस्तान अब रोना आता है मुझको बच्चियाँ लाचार, कौन देखता है । जब तक बीते न ख़ुद पे बड़े व्यस्त हैं हम चलो प्रार्थना ही करलें पुकारें बेटियाँ कौन देखता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ गले लगते दोस्त बोला क्या छोड़ दिया चैन से जीना सीख लिया सारा दिन फेसबुक पर रहना छोड़ दिया चैन से जीना सीख लिया । व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी हर रोज नए पचड़े सर दर्द […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय किसी की बात पर न जाइए हुज़ूर ! किसी की बात पर न आइए हुज़ूर ! दीगर बात है कोई बात ही नहीं, भरा हो पेट तो मत खाइए हुज़ूर ! ज़ख़्मों […]
डॉ रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद कुछ ख़्वाब बुन लेना जीना आसान हो जायेगा दिल की सुनलेना मिज़ाज शादमान हो जायेगा मुद्दत लगती है दिलकश फ़साना बन जाने को हिम्मत रख वक़्त पे इश्क़ मेहरबान हो जायेगा टूटना और फिर बिखर जाना आदत है शीशे की हो मुस्तक़िल अंदाज़ ज़माना क़द्रदान हो जायेगा लर्ज़िश-ए-ख़याल में ज़र्द किस काम का है बशर जानें तो हुनर तिरा मुल्क़ निगहबान हो जायेगा मंज़िल-ए-इश्क़ में बाकीं हैं इम्तिहान और अभी ब-नामें मुहब्बत ‘राहत’ बेख़ौफ़ क़ुर्बान हो जायेगा ॥
‘डॉ रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद मैं क्या मिरी आरज़ू क्या लाखों टूट गए यहाँ तू क्या तिरी जुस्तजू क्या लाखों छूट गए यहाँ । चश्म-ए-हैराँ देख हाल पूँछ लेते हैं लोग मिरा क़रीबी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बीज घृणा का हर तरफ़, उगने लगी खटास। हाथ प्रेम ने झटक लिये, दूर हो गयी आस।। गोरखधन्धा दिख रहा, खेल निराले खेल। बाहर से दुश्मन लगें, अन्दर से है मेल।। राजनीति […]
************************************** जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) अभिनन्दन की आस लिए मैं जीवन जीता जाता हूँ। कर्मयोग का साधक मैं नित भगवत्- गीता गाता हूँ।। अभिनन्दन की……………………….………….. भेद-भाव के इस कानन में स्वाभिमान का प्रहरी हूँ, प्रेम-भाव में […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जी एक कुशल वक्ता, सन्त राजनेता तथा विदेह-जैसे वीतरागी महामानव थे। वे एक उत्कृष्ट शब्दधर्मी और सम्पन्न विचारक थे। कुछ ही लोग यह जानते हैं कि वे एक […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आज (३१ जुलाई) प्रेमचन्द की जन्मतिथि है । प्रेमचन्द के लेखन की सार्थकता और प्रासंगिकता इस विषय में है कि उन्होंने देश के मध्यवर्गीय चरित्र को विस्तीर्ण और वास्तविकता में दृष्टिपात करने […]
महेन्द्र महर्षि , 31.7.2018. गुरूग्राम- चारपाई पर लेटा बुद्ध प्रकाश , जिसे घर पड़ौस के लोग लाड़ में बुधवा कहकर बुलाते हैं , आसमान में चमकते तारों को देखता – देखता न जाने कब सो […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सवाल तुमसे, बीमार बीज क्यों बोते हो? जवाब देते ही अतीत को तुम रोते क्यों हो? मज़ा तब है, जब पर्वाज़ में बलन्दी हो, जागते हो कथनी में और करनी में सोते […]
– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आपकी लेखनी यदि ‘पराधीनता’ की ओर बढ़ने के लिए मचल रही हो तो उसे पहले दुलराइए-पुचकारिए- समझाइए; उसके बाद भी उस धृष्ट की अक्खड़पना दूर न हो तो झट उस लेखनी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ख़ुशियाँ हुईं बरबाद, मुझे कोई ग़म नहीं, जानता था, तुम सबमें, है कोई कम नहीं। इत्तिफ़ाक़ था उस रोज़, मिल रहे थे सब गले, पीठ पे निशाना, लगानेवालों में हम नहीं। सीना […]
डॉ. रूपेश जैन- जब ज़िन्दा था तो काश तुम सीख लेती जीने का क़ायदा शम-ए-तुर्बत१ की रौशनी में ग़मज़दा होने का क्या फ़ायदा । इख़्लास-ओ-मोहब्बत२ जुरूरी है मुख़्तसर३ सी ज़िंदगी में अपना बनाने को शर्त-ए-मुरव्वत४ रखने का क्या फ़ायदा । सर-ए-दीवार५ रोती […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश पल रहा है तुम्हारी कोख में उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़। उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान, जिसका […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय शाम ढली दीये को जलने दो, नींद में सपनों को पलने दो। प्यास बढ़ती है तो बढ़ जाए, बर्फ़ को पानी में गलने दो। दम न तोड़ ले ख़्वाहिश कहीं, उसको अब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद नज़ाकत-ए-जानाँ1 देखकर सुकून-ए-बे-कराँ2 आ जाये चाहता हूँ बेबाक इश्क़ मिरे बे-सोज़3 ज़माना आ जाये मुज़्मर4 तेरी अच्छाई हम-नफ़्स मुझमे, क़िस्मत मिरी लिखे जब तारीख़े-मुहब्बत5 तो हमारा फ़साना आ जाये माना हरहाल मुस्कुराते रहना […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद उम्र भर सवालों में उलझते रहे, स्नेह के स्पर्श को तरसते रहे फिर भी सुकूँ दे जाती हैं तन्हाईयाँ आख़िर किश्तोंमें हँसते रहे । आँखों में मौजूद शर्म […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” क्या रखा है तेरी याद में उम्र भर बे-सुकून क्यों जीते रहें उम्र भर दिल-लगाया-ओ-इश्क़-आजमाया तमन्ना क्यों सताती रहे उम्र भर हँसता हूँ ख़्याल पे कि तुम मेरे हो ग़ैरों को क्यों तड़पते रहें […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ पाने की चाह में खोने का डर सताता है बिना कुछ पाये ही दिल सहम जाता है फ़ितरत में जुड़ा है ये डर जाना सहम जाना रुका था न रुकेगा इंसाँ […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ एक दिन मेरे दोस्त को, मैं लगा गुमसुम बोला वो, क्या सोच रहे हो तुम बातें बहुत सी हैं सोच रहा हूँ, क्या सोचूँ, बोला मैं। अलग-अलग हैं कितनी बातें […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ना कुछ सोचो ना कुछ करो, क्योंकि चाय के प्यालों से होठों का फासला हो गयी है जिंदगी। भूख से बिलखती रूहों को मत देखो शान-औ-शौकत के भोजों१ में खो गयी है जिंदगी। बस सहारा ढूढ़ते, सड़क पे फट गए जूतों से क्या सुबह शाम बदलती गाड़ियों का कारवाँ हो गयी है जिंदगी। तन पे फटे हुए कपडे मत देखो नए तंग मिनी स्कर्ट सी छोटी हो गयी है जिंदगी। पानी की तड़प भूल कर महंगीं शराब की बोतलों में खो गयी है जिंदगी। फुटपाथ पे सोती हजारों निगाहों की कसक छोड़ के इक तन्हा बदन लिए, हजारों कमरों में सो गयी है जिंदगी। हजारों सवाल खामोश खड़े; बस सुलगती सिगरेट के धुएं सी हो गयी है जिंदगी। शब्दार्थ: १. भोजों:- दावतों
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक —–पाप-बोध—- पाप का कण-कण मेरी जिह्वा से टकराता है और ले जाता है– एक ऐसे गह्वर में, जहाँ पुण्य का प्रताप आन्दोलित हो रहा है और मेरा पाप सिर चढ़ कर […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ अपनी तमन्नाओं पे शर्मिंदा क्यूँ हुआ जाये एक हम ही नहीं जिनके ख़्वाब टूटे हैं इस दौर से गुजरे हैं ये जान-ओ-दिल संगीन माहौल में जख़्म सम्हाल रखे हैं नजर उठाई बेचैनी शर्मा के मुस्कुरा गयी ख़्बाब कुछ हसीन दिल से लगा रखे हैं दियार-ए-सहर१ में दर्द-शनास२ हूँ तो क्या बेरब्त उम्मीदों में ग़मज़दा और भी हैं अहद-ए-वफ़ा३ करके ‘राहत’ जुबां चुप है वर्ना आरजुओं के ऐवां४ और भी है शब्दार्थ: १. दियार-ए-सहर – सुबह की दुनियाँ २. दर्द-शनास – दर्द समझने बाला ३. अहद-ए-वफ़ा – प्रेम प्रतिज्ञा ४. ऐवां – महल
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब ख़ुद को लुटा दो, वतन के लिए, अब ख़ुद को खिला दो, चमन के लिए। ये आसां नहीं, जितना समझते हो तुम, तरस जाओगे दो गज़, कफ़न के लिए। बेशक, ज़माना […]
पेशे ख़िदमत हैं, चन्द अश्आर डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : तुम्हारी क्या बिसात, जो मुझे ललकारोगे? शब्द-तीर चलने पर, शेर भी दहल जाते हैं। दो : कुछ कर सकने की औक़ात नहीं, तो चुप बैठो, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भूख से बिलबिलाती आँतें; चीथड़ों में लिपटी-चिपटी अपनी पथराई आँखें पालती; टुकुर-टुकुर ताकती आँखों से झपटने की तैयारी करती मेले-झमेले की गवाह बनती; आस-विश्वास की फटही झोली लिये तमन्नाओं-अरमानों की लाश ढोती […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सिर पर कफ़न, बाँध कर आ गया, सीने पर पत्थर, दबाकर आ गया। शिकवा, शिकायत, गिला भी नहीं, अफ़साना अब जलाकर आ गया। मुफ़्लिस कैसे, कह दिया उसने? ख़ज़ाना दिखाकर, उसे आ […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) मैं प्रेम पथिक आवारा भँवरा, काँटों से भी प्यार करूँ, अधर लिखें चुम्बन की पाती, नयनों से संवाद करूँ। ऋतु वसंत की मादकता हो, या पावस के भारी दिन, उर में बजती नित […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बातों-ही-बातों में, ‘आदर्श’ अब बँटने लगे, जनाब को देखो, मुद्दों से, कैसे हैं हटने लगे! राम तो राजसिंहासन, त्याग कर आगे बढ़े, कैसे रामभक्त हैं, जो कुर्सी से सटने लगे! आश्वासन देते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जो उजड़ गया वह दयार हूँ, जो बिछड़ गया वह प्यार हूँ। कुछ याद आये तो कहो, जो बिसर गया वह क़रार हूँ। इल्ज़ाम सिर पर है मेरे, क़ातिल नहीं, फ़रार हूँ। […]
आज एक जुलाई है आषाढ़-मास है। कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-सम्राट कालिदास का ‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है। पावस-ऋतु का आगमन और सम्प्रति, वर्षा की मूसलाधार प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों के गह्वर में छोड़ आती हैं। अन्तहीन-सी बूँदें ग्रीष्म की […]
©जगन्नाथ शुक्ल….✍ (इलाहाबाद) किस हक़ से कहते हो कश्मीर हमारा है, खुद के हाथों भारत माँ का शीश उतारा है। ग़र चाहत है खुशियाँ बरसें लहराये केसर घाटी में, ३७०धारा ख़तम करो,धरती ने आज […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ, कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ। जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर, क़ानून को भी आईना, दिखातीं कुर्सियाँ। ग़रीब का चूल्हा है, उधारी में […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशक, तुम्हारे चिन्तन चुराये हुए हैं। किराये की कोख से जन्मे या फिर परखनली में उपजे तुम्हारे वे शब्द हैं, जिन्हें पक्षाघात ने जकड़ लिया है। कोई थिरकन नहीं? प्रतिक्रिया-रहित संवेदना-शून्य तुम्हारा […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रात घिरती रही, दीप जलता रहा। साज-श्रृंगार+ करती रही ज़िन्दग़ी, रूप भरती-सँवरती रही ज़िन्दग़ी। बेख़बर वक़्त की स्याह परछाइयाँ, उम्र चढ़ती-उतरती रही ज़िन्दग़ी। साध के फूल कुँभला गये द्वार पर, प्यास की […]
रे रे झरने, तेरा निनाद ! सुनकर बज उठता ह्रदय-नाद । अन्तस् में भरता, आह्लाद । सानन्द दृशा, लगतीं भरने । रे रे झरने ! प्यारे झरने ।। तेरा प्रलाप, कल-कल कुल-कुल, हर धार चपल, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ओकर बियहवा बिदेसे में कराई दीहल जाऊ का? आपन ओनिए रहि के फरियावत रही। काहें से कि जब देख तब, ओकरा गोड़वा में शनिचरे चढ़ल रहेले। हमरा इहो लागता कि ओ जनम […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निभृत-निलय में वितान तानता मन, निश्शब्द-मूक याचना– सम्पृक्त उर्वशी-मेनका का तन। अनाघ्रात पुष्प-सा– सर्वांग सौन्दर्यस्वामिनी-द्वय की कान्ति, समग्र संसार-संसूचित– कमनीय कामिनी के क्लान्त कपोलों की भ्रान्ति। रूप, रस, गन्ध स्पर्श का आकर्षण, […]
इन्द्रेश भदौरिया रायबरेली- काला – भूरा है मटमैला। बिच्छू होता बहुत विषैला। आठ पैर से चलने वाला। छोटे कीट निगलने वाला। दो हाथों से पकड़ शिकार। खा जाता है उसको मार। बहुत विषैला इसका डंक। […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़नकार हो तो अपना फ़न दिखाओ न, महज़ बातों में मुझको अब उलझाओ न। देखो! मंज़िल आर्ज़ू अब है कर रही मेरी मुझे बढ़ने दो, अब मुझको फुसलाओ न। कुछ बातें हैं […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : देखते-ही-देखते, हम बाज़ार हो गये, सपनों के सारे यहाँ, ख़रीदार हो गये। गरदन झटक पंछी-मानिंद, उड़ते रहे जो, बेशक, वही अब हमारे, तलबगार हो गये। दो : ज़िन्दगी से छेड़ख़ानी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय समग्र भारत का परिधान है हिन्दी, राष्ट्रीय आन-बान औ’ शान है हिन्दी। भाषाओं में है शीर्ष स्थान पर स्थित, जीवन-मरण का आख्यान है हिन्दी। आओ! करें नमन अपनी राजभाषा को, हमारे आचरण […]
एक अभिव्यक्ति डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय महसूस तो अब होता है बहुत, ज़िन्दगी को है उलझाया बहुत। पाया कब और खोता रहा कहाँ, इन प्रश्नों को है सुलझाया बहुत। हर चौराहे पर प्रश्न लटकते रहे, लोकसत्ता […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : शुष्क पड़ी संवेदना, घायल रक्त-सम्बन्ध। अजब खेल है मोह का, कैसा यह अनुबन्ध? दो : मेरा-तेरा किस लिए, माया से अब डोल। गठरी दाबे काँख में, द्वार हृदय का खोल।। […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : कल तक था जो जगद्गुरु, भ्रष्ट बन गया देश। दिखते सब बहुरुपिये, तरह-तरह के वेश।। दो : कुम्भकर्णी सब नींद में, नहीं किसी को होश। बाँट देश को सब रहे, […]
कवि राजेश पुरोहित (राजस्थान) योग आत्मा से परमात्मा का मिलन निर्मलता स्वच्छता का संदेश मानसिक शांति का उपाय तन बने सुदृढ़ मन मे जगे आत्मविश्वास नई उमंग नई चेतना नई स्फूर्ति नए उल्लास का उदय […]
नीना अन्दोत्रा पठानिया, पठानकोट ,पंजाब – सारे बयान सरिता के खिलाफ जा रहे थे , हर बयान के बाद एक-एक उम्मीद दम तोड़ रही थी । हर आँख उस से कई सवाल कर रही थी […]
जयति जैन “नूतन”, भोपाल (युवा लेखिका , सामाजिक चिंतक) पिता ही तो थे वो जिन्होनें हर ख्वाहिश पूरी की थी कोई क्या समझ सकेगा उस स्नेह से भरे अगाध प्रेम को । वर्षों तक पसीने […]
ठंडी रात मैं – तुम इश्क करवटें सिलवटें हिचकियां सिसकियां देती हैं गवाही…
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) चले आये थके-हारे ,इन जज़्बातों के सहारे ही, ये दिल मत तोड़ना पगली,जो धड़के तेरे सहारे ही। इसे मत भूल जाना तुम,इसका अपमान मत करना, बड़ा मासूम-सा ये दिल, इसे मजबूर मत करना। […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ वेष दिगम्बर धारी मुनिवर करुणा अब जगाएँगे पार करो खेवैया नहीं तो हम भव में ठहर जाएँगे । भक्ति भाव से आपको पुकारें हे! विशुद्ध महासंत कृपा प्रकटाओ अपनी नहीं तो […]
राघवेन्द्र कुमार “राघव”- अन्त:विचारों में उलझा न जाने कब मैं, एक अजीब सी बस्ती में आ गया । बस्ती बड़ी ही खुशनुमा और रंगीन थी । किन्तु वहां की हवा में अनजान सी उदासी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इक हूक-सी उठी है अब क्या कहूँ तुम्हें? ज़ख़्मी तन-बदन है अब क्या कहूँ तुम्हें! हर रात मुझसे रूठी दिन भी उदास है, क़दम भी बहके-बहके अब क्या कहूँ तुम्हें? इक अनकही […]
नीना अन्दोत्रा पठानिया (पंजाब) “ रमा सोनू को अच्छी तरह से ढक ले ,आगे से चुड़ैल आ रही है , करम जली अपना तो सब कुछ खा गई अब सबके बच्चों पर नज़र रखती है […]
राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’- धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं | मेहनतकश मज़दूर मगर हम भूखे ही मर जाते हैं | धन की चमक के आगे हम कहीं ठहर न पाते हैं […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जे-जे रहे दोस्त सब दुसमन होइ गइले, हमारा रहतिया में काँटा बोई गइले! बड़ा हँसी आवेला ‘बाबू’ के चल्हकिया पर, जे सुरूज के गोला के चनरमा समुझि गइले! डूबत उ खूब देखइहें […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हिचकी का सबब क्या है, बताइए हुज़ूर! परेशाँ हाले दिल को, अब सुनाइए हुज़ूर! कब तक भरमाइएगा, बाज़ीगरी दिखा के, चेहरा पे चेहरे अब तो न, लगाइए हुज़ूर! लोग आपकी हक़ीक़त से, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आज (२० मई, २०१८ ई०) कविवर पण्डित सुमित्रानन्दन पन्त की जन्मतिथि है। कल्पना के साथ सुमधुर कोमलता भी पन्त के काव्य में आरम्भ से ही संलक्षित होती है। वे प्रकृति का मातृरूप […]
संदर्भ :- 20 मई , जन्म दिवस राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित“ सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को हुआ। हिंदी साहित्य में चगयवादी युग के प्रमुख कवियों में पंत जी का नाम प्रमुख है। […]
एक अभिव्यक्ति डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पगडण्डियों पर जोड़-घटाना गुणा-भाग करता हुआ पथिक, जो समीकरण बना चुका है, वह भीड़ की आँखों में काँटा बन, खटक रहा है। समय की नाक पर क़दम-ताल करता गिद्ध :– […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब हथेली पर सूरज उगाता हूँ मैं, अपनी आँखों में चन्दा बसाता हूँ मैं। सीने में दहकता है आग का गोला, भूख लगने पर उसको चबाता हूँ मैं। आँखों में उग आये […]
सुधीर अवस्थी परदेशी मां लिखूं तेरे बारे में क्या, वाक्य बनते हैं नहीं। गद्य-पद्य कहूं क्या मैं, आंसू थमते हैं नहीं।। प्रेम तेरा प्यारा इतना, तुमसा नहिं कोई और है। हूं अंधेरी रात मैया, तू […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कौन-सा अपराध! कैसी गुस्ताख़ी! मैं तो था, मात्र मांस का एक लोथड़ा। शक़्ल अख़्तियार करने से पहले ही मेरे वजूद को मिटा डाला? तुम ममत्व और अपनत्व के द्वन्द्व में उलझी रही, […]
शोकपूर्ण अभिव्यक्ति :———— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मनसा-वाचा-कर्मणा, सौ में शून्य पाय। बटन दबाना सोचकर, जाये मुँह की खाय।। बात मन की बिसर गया, तन में खोजे प्रीत। क़िला हवा में बन रहा, बालू की है […]
कवि राजेश पुरोहित अभिनेता फ़िल्म कम राजनीति में ज्यादा अच्छा अभिनय करते जय जय भारत जान से प्यारा देश हमारा भारत प्यार ढाई अक्षर का सुंदर नाम रखो याद सदा तिरंगा दिल में रहता है […]
पढ़ो बेटी – लड़ो बेटी फिल्म ” द फ्रीलांसर मीडिया ” के बैनर तले बनने वाली तीसरी फिल्म है । फिल्म बेटी बचाओ – बेटी पढाओ विषय पर आधारित हैं । फिल्म की कहानी, पटकथा […]
बृजेश पाण्डेय ‘बृजकिशोर’ बेनीगंज गाँव में रामदयाल नाम का एक युवक रहता था। उसके परिवार (फैमिली) में माता-पिता और दो छोटी बहनें थीं। पाँच बीघे खेती योग्य जमीन है। समीप […]
– कवि राजेश पुरोहित, भवानीमंडी पाटी पोथी लेन चालां आपां स्कूल में सरकारी स्कूल की बाताँ सबे बतावां रे कि चालां स्कूल में……. फोकट में मिल री रे किताबां सरकारी स्कूल में गुरुदेव भी घर […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘कर’ ‘नाटक’ अपने-अपने उस्ताद के साथ जम्हूरे पहुँच गये हैं; ,वहीं हमने भी अपने उस्ताद और जम्हूरे भेज दिये हैं। “तो बोल जमूरे!” “हाँ ओस्ताद!” “जमूरे! ‘कर’ ‘नाटक’ का चुनावी बुखार क्या […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) सिद्धान्तों की शिला पड़ी, निर्वीर्य मनुज धिक्कार रही। काई लगी पीठिका में , हठ की नागिन बैठी फुफकार रही। दंश झेलता है समाज , औ नित राष्ट्र बहाता अश्रुधार, मानव तेरी चञ्चलता […]
—– जयति जैन “नूतन” —– युवा लेखिका, सामाज़िक चिन्तक मैं बीमार हूँ लेकिन मैं किसी से कह नहीं सकती कि मैं बीमार हूँ । शरीर थकावट से चूर है सुकून बहुत दूर है लेकिन मैं […]
कवि राजेश पुरोहित (शिक्षक एवम साहित्यकार) 98,पुरोहित कुटी, श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी, जिला झालावाड़, राजस्थान परीक्षाएं समाप्त होते ही। लो अब रिजल्ट भी आ गया। अब कावेरी को बच्चों को स्कूल की चिंता सताने […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) क्या रखा है वेद ऋचाओं में, सब छिपा है रक्त शिराओं में। बाँहें फड़कें , भुज दण्ड उठे, क्या रखा है, कृत्रिम आभाओं में। क्या रखा………………………. स्पन्दित हृदय भी सिहर उठे, दोलायमान […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे दोस्त! तुम्हारा चेहरा आज दल-परिवर्त्तन करता दिख रहा है। तुम्हारी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा की गाथा पैवन्द लगीं चादरें सुना रही हैं। लोलुपता और लिप्सा तुम्हारे चरित्र की पटकथा को आमिशाषी बना रही […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चैनो सुकूं हो मुल्क में, कुछ सोचिए हुज़ूर! ग़द्दार हैं सब दिख रहे, कुछ सोचिए हुज़ूर। सरहद पे गोली खा रहे, फ़ौजी को देखिए, भाषणबाज़ी से क्या होगा, कुछ सोचिए हुज़ूर। सौ […]
– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वह बिछड़ता है, कमाल की तरह, हवा हो जाता है, रुमाल की तरह। कहाँ से लाऊँ लौटाने की तरक़ीब, ज़ेह्न में वह घूमता सवाल की तरह। अच्छा है वह कहीं और […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मञ्च नहीं तो रञ्च नहीं है, संग मातु ग़र हिन्दी है। पुण्यप्रसूना विलसित दूना , भाषाओं की बिन्दी है।। मञ्च नहीं तो रञ्च……………………..………।।१।। शुभ्र धवलता अतुलित ममता, समता और सुनीता है। भाग्य […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) अधनंगे को नंगा करके ,पहना दो दया का चोला, आत्मबल न जगा सके,उठाए एहसानों का झोला। ऐसा कोई एक न रखो,जिसमें हो दृढ़ता औ साहस, जिससे सदा ही खेल चले, जिसमें भरा […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हर नज़र से नज़रें तुम मिलाया न करो, हर शख़्स से निगाहें खिलाया न करो। कितने एहतियात से तुम्हें सँभाले रखा है, हर किसी पे भरोसा तुम जताया न करो। बेहद ज़ालिम […]