आइए! मन से संकल्प करें–
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ★ इस विषय पर जनमत-संग्रह कराया जाये कि देशवासी कैसा नेता चाहते हैं।★ किसी भी प्रकार के राजनेता बनने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता स्नातक रहेगी और वह किसी भी […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ★ इस विषय पर जनमत-संग्रह कराया जाये कि देशवासी कैसा नेता चाहते हैं।★ किसी भी प्रकार के राजनेता बनने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता स्नातक रहेगी और वह किसी भी […]
जय देवनागरी-जय हिन्दी।★ इस सूचनात्मक टिप्पणी में अशुद्धि/अशुद्धियाँ ढूँढ़ें।
अब हमारी पाठशाला आन्तर्जालिक (ऑन-लाइन) रूप में शीघ्र प्रसारित होगी, जो हमारे सुविधानुसार संचालित होगी। पहला विषय– मौखिक और लिखित भाषा (लेखन-पठन-पाठन तथा उच्चारण)। ★ आप लिखते कुछ हैं और उच्चारण कुछ करते हैं। आप […]
समाचार-चैनल : ‘समाचार Plus’ का भाषिक अज्ञानइस चित्र को ध्यानपूर्वक देखिए। इसमें अंकित समाचार-शीर्षक को पढ़िए। पहली बात, यह समाचार-शीर्षक नहीं है, क्योंकि वही समाचार-शीर्षक उपयुक्त कहलाता है, जो क्रिया-रहित हो। यह तो एक वाक्य […]
★ ‘विज्ञानी’ और ‘वैज्ञानिक’ में अन्तर १- वह एक विज्ञानी है। √२- वह एक वैज्ञानिक है। ×३- वह वैज्ञानिक क्षेत्र का व्यक्ति है। √४- देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। √५- डॉ० होमीजहाँगीर भाभा एक […]
★ कोश और कोष ‘कोश’ नैसर्गिक है, जबकि ‘कोष’ अनैसर्गिक/ कृत्रिम। आप ‘कोशिका’ का प्रयोग करते हैं; क्योंकि वह निसर्ग/ प्रकृति-जन्य है। आप उसे ‘कोषिका’ नहीं कह सकते। ‘कोष’ द्रव्यादिक से सम्बद्ध है। द्रव्यादिक नैसर्गिक […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भोजपूरी के हड़ाह लिक्खाड़), परियागराज भोजपूरी ‘चिनियाबादाम’ न हवे ए बाबू कि अँगुठवा दबाई के फोरि देहला आ मुँहवाँ में ढुकाइ लेहल। जेकरा फराकी ठोकला के बदिया……धोवे के सहूर ना […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हृदय में जब न ‘हर्ष’ हो और न ही ‘विषाद’ तब की स्थिति ‘आनन्द’ है। ऐसी मनोदशा ‘स्थितिप्रज्ञ’ की कोटि के अन्तर्गत रेखांकित होती है। एक वास्तविक संन्यासी (कदाचित् यत्र-तत्र […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय देख! बूढ़वा कइले बा अनेत, मुअला पर पनियो ना जुरी। ऊ दुरगतिया होखी ओकर, हेनर-बेनर सब होइ ओकर। ओकरा के जेतना सराप ओतने कम बा। अचक बान आई आ ओकरा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ढाबों और अन्य प्रकार के शाकाहारी भोजनालयों में जब भी मैं भोजन करने के लिए जाता हूँ तब अधिकतर भोजनालयों में ‘व्यावहारिक समाजवाद’ देखता हूँ। मैं भोजन ग्रहण करने के […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय यों ही कोई महामना नहीं बन जाता। जिस व्यक्ति ने अपनी झोली फैलाकर जनसामान्य और जनविशेष से एक महत् सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति के […]
ऊपर दी गयी संस्थान की टीन-पट्टिका को ध्यानपूर्वक देखें। वह संस्थान ‘भरद्वाज-आश्रम’, प्रयागराज के सामनेवाले मार्ग पर स्थित है। टीन की यह पट्टिका वर्षों से संस्थान के प्रवेशद्वार के ऊपर लगी हुई है। इस संस्थान […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मुझे ऐसा कोई भी व्यक्ति पसन्द नहीं है, जो कहता कुछ हो और करता कुछ हो। ऐसों से मैं दूरी बना लेता हूँ। अधिकतर ‘लिक्खाड़’ और ‘वाचाल’ लोग ‘महिला- स्वातन्त्र्य’ […]
प्रिय शिष्यवृन्द! आप जब शोधप्रबन्ध अथवा निम्नांकित विषयगत आशय के कर्म कर रहे होते हैं तब शब्दप्रयोग के प्रति आपको सतर्क-सन्नद्ध-सावधान रहना होगा। ऐसा इसलिए कि शोधकर्म करने-कराने का अर्थ ही है कि सम्बद्ध विद्यार्थी […]
कृपया निम्न टंकित चार शब्दों को गम्भीरतापूर्वक समझें। १- बाह्य— बाहरी, बाहर का, बाहर की ओर२- वाह्य— वहन (ढोने) करने-योग्य; जैसे– वाहन, वाहक आदिक।३- अन्तर्राष्ट्रीय— अपने राष्ट्र में होनेवाला; अपने राष्ट्र की भीतरी बातों से […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मनमन्दिर की पूजा प्रत्येक व्यक्ति करना आरम्भ कर दे तो व्यर्थ के दिखनेवाले और मानव-मानव के बीच वर्जना की दीवार खड़ी करनेवाले समस्त आराधनास्थल औचित्यरहित हो जायें। नारद नारायण के […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जीवन अब मझधार में, नदी-पार है गाँव।नहीं सहारा दिख रहा, नहीं है कोई ठाँव।।दो–आश्वासन हर रोज़ का, मृत्यु दिखाती आँख।साहस उड़ पाता नहीं, क़तर दिया है पाँख।।तीन–चिपकी तन सन्तान है, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय दो ही जातियाँ हैं :— पहली, महिला (प्रकृति) की और दूसरी, पुरुष की; परन्तु ‘दोगलों’ की कोई जाति नहीं होती, जो ‘रंग और रूप’ बदलने में माहिर होते हैं। जैसे […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कहूँ वा न कहूँ, फिर चुप भी रहा नहीं जाता,तदबीर!१ तू ही बता इस चुप्पी का राज़ क्या है?दो–सूरत बेमानी है, तस्वीर बनाये नहीं बनती,सीरत२ अनजानी है, तासीर३ जो नहीं […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अभिनय में वह शक्ति है, जो पाषाण को भी द्रवीभूत कर दे। ‘सदमा’ अर्थात् आघात मनुष्य को एक ऐसी मानसिक अवस्था में प्रवेश कराता है, जहाँ उसका जीवन किसी अभिनय […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वक़्त-बेवक़्त की स्याह परछाइयाँचुपके से दाख़िल होती हैंमेरे अँधेरे घर में।अट्टालिकाओं के भार सेलहूलुहान नीवँकब दम तोड़ देगी,इसे वक़्त भी नहीं जानता;क्योंकि वह जी रहा होता है,अपना वर्तमान।बेवक़्त तो एक […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ५ अगस्त की तारीख़ में लेबनान की राजधानी बेरूत में विस्फोटक पदार्थ का भयावह प्रभाव दिख रहा है। विस्फोट कैसे हुआ? जितने मुँह-उतनी बातें। […]
——० संरचना-पक्ष ०—– ★ रचना— किसी भी उस पद्य अथवा गद्य-कृति को ‘रचना’ कहते हैं, जिसका प्रवाह नैसर्गिक होता है और सर्जन करने के लिए किसी का आश्रय नहीं लेना पड़ता। ★ लेख— किसी विषय […]
कोरोना ने औसत भारतीय की कमर तोड़ दी है; आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है। लाखों लोग की नौकरियाँ छिन चुकी हैं। शिक्षण संस्थानों की ओर से सक्रिय आन्तर्जालिक पढ़ाई कराने की बात की जा […]
—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जनसंख्या की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य, बेरोज़गारी की दृष्टि से देश का सर्वाधिक अनियोजित राज्य, आपराधिक कृत्यों के विचार से सर्वाधिक चिन्तनीय राज्य, ग़रीबी और भुखमरी की दृष्टि […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय “इंक़िलाब ज़िन्दाबाद” का उद्घोष बलिया की धरती से अब भी उठ रहा है। चित्तू पाण्डेय, मंगल पाण्डेय, रामदहिन ओझा आदिक ऐसे वीर सपूत थे, जिन्होंने अँगरेज़ों के दाँत खट्टे कर […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इस समय चीन भारतीय सीमा में घुसा हुआ है और वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहा है। उसने ‘फींगर ४,५,६’ के पास अपने सैनिकों के लिए हस्पताल बना […]
‘म्लेच्छ-भाषा’ क्या है? अस्पष्ट भाषा/अपभ्रंश भाषा ‘म्लेच्छ-भाषा’ है। जिन वर्णों का उच्चारण व्यक्त न हो, वह ‘म्लेच्छ-भाषा’ कहलाती है। किरात, खस, बर्बर, पह्लव, पौण्ड्र, द्रविड, शक, शबर, सिंहल, यवन आदिक जातियाँ-जनजातियाँ- बर्बर जातियाँ ‘म्लेच्छ’ कहलाती […]
यहाँ उन शब्दों के प्रयोग के लिए अनुरोध किया गया है, जो शुद्ध हैं और उपयुक्त भी। कृपया अपने लेखन में उन शुद्ध शब्दों को स्थान देकर समाज का भाषिक मार्गदर्शन करें। ★ ‘प्रावधान’ के […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय गुरु ‘गुरु’ ही है। जैसे ही कोई शिष्य यह विचार कर विद्या ग्रहण करता है कि वह अपने ‘गुरु’ की सिद्धि का अतिक्रमण कर स्वयं को सिद्ध करेगा, वैसे ही […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय समाजवादी पार्टी जब तक सत्ता में बनी रही तब तक उत्तरप्रदेश गर्दिश में रहा, तब तरह-तरह के अपराधों के सामने तत्कालीन सरकार करबद्ध मुद्रा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’ आदिक अक्षर यदि संयुक्ताक्षर हैं तो दोहा-संरचना में ‘दो मात्राओं’ की गणना क्यों नहीं? जब संयुक्ताक्षर के उच्चारण में दो प्रकार की ध्वनि का सम्मिश्रण है तब […]
जिन्होंने पी०सी०एस०-साक्षात्कार परीक्षा में हमारे विद्यार्थियों से प्रश्न किया है– मुख्यमन्त्री शब्द से पहले ‘श्री’ लगेगा अथवा नहीं, उनसे हमारा प्रश्न है– उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री का नाम हमने नीचे लिखा है। आपको इनमें से शुद्ध […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘भाषापरिष्कार-समिति’ केन्द्रीय कार्यालय, प्रयागराज। शब्द : भारी बहुमत से; प्रचण्ड बहुमत से; बहुत भारी बहुमत से; भयंकर बहुमत से ये सभी शब्द अब सार्वजनिक सम्पत्ति बन चुके हैं; ज़ाहिर है, ‘पंचायती […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मनु पाण्डेय गिरिफ़्तार आरोपित शशिकान्त पाण्डेय की पत्नी बतायी जा रही है और पुलिस-मुठभेड़ में मारे गये अपराधी प्रेमप्रकाश पाण्डेय की पुत्रवधू। शशिकान्त पाण्डेय मृतक विकास दुबे का ममेरा भाई […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारे देश के प्रधानमन्त्री कहते हैं : मैं ‘जनता का सेवक’ हूँ; मैं आप सबका ‘प्रधान चौकीदार’ हूँ; परन्तु विडम्बना देखिए, उनका काम ‘चौकीदारी’ का और मीडिया की सुर्ख़ियों में […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारे प्रथम श्रेणी के राजनेताओं की आँखों में विश्वासघात के चित्र झिलमिलाते आ रहे हैं। वे आत्मविश्वास, आत्मबल तथा इच्छाशक्ति से रहित हैं; चरित्र, चाल, चेहरे से क्षत-विक्षत हैं; मनसा-वाचा-कर्मणा […]
—- ० आत्ममन्थन ०—- — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आप हमारी जय-जयकार करें और हम आपकी। आप कूड़ा-कचरा से ‘मनदर्पण’ (फेसबुक) को भर दीजिए और हम कहेंगे— वाह! क्या स्वर्ण-रत्न है। हममें साहित्य और भाषा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘दो-तिहाई’ शब्द देश में सत्ता-सुख भोगने के लिए है; राजधर्म से वंचित रखने के लिए है तो ‘निरंकुशता’ का चरित्र जीने के लिए है। हाँ, दो-तिहाई बहुमत प्राय: पूर्णत: विश्वसनीय […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जीव-जगत् भ्रमजाल में, ब्रह्म निकटता खोय।मानव दानव बन गया, फिर काहें को रोय।।दो–रूप-रूपसी-दंग है, दिखता ज्ञात अज्ञात।सार-सार से रहित है, मानव दिखे न ज्ञात।।तीन–विष-वल्लरी सृष्टि में, होता दूषित वात।जीवनरूप विरूप […]
अभिव्यक्ति-शंख ————————- मेरे बाहुपाश के शब्दकोश सेस्नेह-सदाशयता-शालीनताअन्तर्हित हो चुकी हैं।मेरे पदचाप को सुनोऔर पग-रज को देखो–कोलाहल से परेआर्त स्वर का अनुभव करो–रक्त-रंजित मेरी आकांक्षा सेसाक्षात् करो।वर्जना की श्रृंखला+ में आबद्धमेरा अभिलाष,मेरी उत्कण्ठाआतुर हैं; उद्यत हैं; […]
प्रथमत: ‘लेखन’ और ‘रचना’ की वस्तुपरकता और विषयपरकता पर दृष्टिनिक्षेपित करना अत्यावश्यक है। इन दोनों शब्दों की अर्थ, अवधारणा तथा परिभाषा में भिन्नता है। ‘लेखन’ तो किसी भी प्रकार का हो सकता है; परन्तु ‘रचना’ […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय —आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आज के अधिकतर गुरु अर्थात् तथाकथित ‘सर’ अपने गर्हित आचरण की स्थापना ‘स्वयं’ कर चुके हैं। वे स्वयं को बाज़ार में ‘विक्रेता’ के रूप में […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आत्मीय अमित्र-मित्रवृन्द! यहाँ ऐसे व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या (भारी संख्या, बहुत अधिक संख्या प्रयोग अशुद्ध है।) है, जो किसी के भी सम्प्रेषण पर टिप्पणी करने के लिए गुण-अवगुण’ को […]
मेरे हृदयप्रान्त की साम्राज्ञी कामिनी कविते! तुम्हारे सर्वांग पर जब मैंने पहली बार दृष्टि-अनुलेपन किया था तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था, मानो प्रकृति-सुरभि तुम्हारे अंग-प्रत्यंग और स्निग्ध प्राणों पर ओस भीगे हुए पुष्प की […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आज भारत की अर्थ-व्यवस्था उन बन्दरों के हाथों में है, जो उस्तरा लेकर देश की सामान्य जनता की कटौती में सेंध लगाकर ‘कतर-ब्योंत’ करने […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमार देसवा के बेचि-बाचि, खा गइल ए नेता जी!असल आपन रूपवा, देखाइ गइल ए नेता जी!बाड़ा भरोसिया कई के, तहरा के जितइनी हम,आपन दाँव-पेंचवा, देखाइ गइल तू ए नेता जी!बेसरम […]
पिछले दिनों मैंने उक्त विषय में एक राष्ट्रीयकृत बैंक के प्रबन्धक और अपने शुभचिन्तक से वार्त्ता की थी। मैंने उनसे ‘आपदा-विपदा राहतकोष’ नाम से एक बचत खाता खोलने का आग्रह किया था। उन्होंने बताया था– […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय विफलता आप हैं और सफलता भी | जीवन के दो केन्द्र-बिन्दु हैं– सकारात्मक और नकारात्मक | जहाँ से आप अपनी जीवन-यात्रा आरम्भ करते हैं, वहीं पर वे दोनों विन्दु अवस्थित हैं, […]
‘गुरुपूर्णिमा’ पर विशेष———- — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक वह समय था, जब अध्यापक की सम्पूर्ण समाज में सर्वाधिक मान-प्रतिष्ठा हुआ करती थी, तब यह उदात्त शब्दावली शोभा देती थी, “आचार्य देवो भव।” एक समय […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बउराइ गइल मनवाँ,अझुराइ गइल मनवाँ।कबो घाम कबो छाहीं,खउराइ गइल मनवाँ।झमझमाझम बूनी,सझुराइ गइल मनवाँ।सोझा तहरा होखते,भहराइ गइल मनवाँ।चिंहुकला से ओकरा,अगराइ गइल मनवाँ। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ जुलाई […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चीन की भारत के प्रति जो दुरभिसन्धि थी, वह अब प्रत्यक्ष हो चुकी है। भारत के राज्य सिक्किम की ओर चीन के बढ़ते क़दमों को भारतीय सैनिकों ने ठहर जाने […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भारत-चीन-सीमा पर आज (३ जुलाई) जाकर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का सीमा पर डटे भारत के सैनिकों से मिलना; घायल भारतीय सैनिकों को सुखद आश्वासन […]
विचारणीय ० ————— इस असार संसार में बड़ी संख्या में ऐसे मनुष्य हैं, जो मूल्यों के क्षरण के प्रति चिन्तित रहते हैं; किन्तु जब उन कारकों का प्रतिकार करने का समय आता है तब ऐसे […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आज कैलेण्डर में टँकी तिथिएक जुलाई,आँखों-में-आँखें डालतीन सौ पैंसठ दिनों की दैनन्दिनी उघारे,सिद्धहस्त ज्योतिषी-सदृश अतीत-वाचन कर रही है।आषाढ़-मास के उमड़ते-घुमड़ते बादल देख,कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-चूड़ामणिकवि-सम्राट कालिदास का‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है।पावस-ऋतु […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ,कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ।जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर,क़ानून को भी आईन:, दिखातीं कुर्सियाँ।उधारी में जलता दिख रहा, ग़रीब का चूल्हा,अमीर का […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशक,तुम्हारे चिन्तन चुराये हुए हैं।किराये की कोख से जन्मेया फिर परखनली में उपजेतुम्हारे वे शब्द हैं,जिन्हें पक्षाघात ने जकड़ लिया है।कोई थिरकन नहीं?प्रतिक्रिया-रहित संवेदना-शून्यतुम्हारा शब्द-जगत!कबाड़ख़ाने से उठाकरलायी गयी लेखनीविकृत संसार […]
—आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रणय-पंछी विकल उड़ने के लिए,ताकता हर क्षण गगन की ओर है |किन्तु ममता की करुण विरह-व्यथा,ज्ञान-पथ को आज देती मोड़ है |धैर्य की सीमा सबल को तोड़ कर,दर्द की लतिका हरी […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय यक़ीन नहीं आतामैं ख़ुद को देख रहा हूँ।अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के गलियारे मेंमैं ढूँढ़ रहा हूँअपने न होकर भी हो जाने के साक्ष्य कोपर हर बारख़ुद को ख़ुद सेठगा […]
आइए! शब्द-मन्थन कर, शब्द-सामर्थ्य अर्जित करें। ★ शब्द है— ‘आयाम’। प्राय: हमारे अधिकतर अध्यापक, विद्वज्जन, साहित्यकार, समीक्षक, मीडियाकर्मी आदिक ‘आयाम’ का अनुपयुक्त प्रयोग करते-कराते आ रहे हैं— चाहे वह वाचिक हो अथवा लिखित हो; फलत:, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय नियम-क़ानून तो लोकतन्त्र को जीनेवाले हम गुनहगारों के लिए है। अब आँखें चियार करके देखिए– इनके और अनुयायियों ने कितना प्यारा आदर्श प्रस्तुत किया है। सरकारी लोग हमें सरकारी ‘सोसल […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘हिन्दी’ विषय कितना आसान है, इसे उत्तरप्रदेश का एक ‘कुकुर’ भी जानता है; लेकिन वह ‘देवनागरी लिपि’ में भौंक नहीं पाता। हमारे देश जाना-माना […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वह हवा क्या, जिसकी कोई रवानी न हो,वह वफ़ा क्या, जिसकी कोई दीवानी न हो।ये अन्दाज़े बयाँ जज़्बात की अँगड़ाइयाँ हैं,वह लफ़्ज़ क्या, जिसमें आग और पानी न हो।हिज़्र की […]
त्वरित टिप्पणी 0——— — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘योग’ की आड़ में बाबा रामदेव ने जो कलाकारी दिखायी है, उससे विश्व के सभी सम्बन्धित लोग हतप्रभ हो चुके हैं। […]
हमार बरखारानी!जीयत रह। आ हेने के हाल-चाल ठीके बा। आपन सुनाव। आ जान तारू। तहरा के सइगर देखले, एक साल हो गइल। एने पाता चलल हा कि आपना रिसतेदारी में तू आइल रहलू हा आ […]
दो भ्राता— अनुज पं० विष्णुप्रकाश त्रिपाठी (राष्ट्रीय सम्पादक– ‘दैनिक जागरण’), नोएडा और अग्रज आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद् और समीक्षक), प्रयागराज अपनी मातृभाषा ‘भारत की भाल-बिन्दी— हिन्दी’ और उसकी लिपि ‘देवनागरी’ को उसकी शुचिता के […]
— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़नकार हो तो अपना फ़न दिखाओ न,महज़ बातों में मुझको अब उलझाओ न।देखो! मंज़िल आर्ज़ू अब है कर रही मेरीमुझे बढ़ने दो, अब मुझको फुसलाओ न।कुछ बातें हैं ज़ेह्न में, सँभाल […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय नक़्लचियों को जब मौलिकता की समझ नहीं होती तब उनमें से कोई ‘बेबीनार’; कोई ‘बेबिनार’; कोई वेबिनार तो कोई वेबीनार का प्रयोग कर रहा है। हिन्दी की तो समझ नहीं, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चाचा झगड़ू– अरे बेटवा रगड़ू! तुम्हार फटफटिया क का होइ गा? भतीजा रगड़ू– चाचा! इ बताव, तुम्हार उमर कित्ता होय? झगड़ू– अरे बेटवा साठ कै पार। रगड़ू– त एका कहा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निभृत-निलय में वितान तानता मन,निश्शब्द-मूक याचना–सम्पृक्त उर्वशी-मेनका का तन।अनाघ्रात पुष्प-सा–सर्वांग सौन्दर्यस्वामिनी-द्वय की कान्ति,समग्र संसार-संसूचित–कमनीय कामिनी के क्लान्त कपोलों की भ्रान्ति।रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का आकर्षण,जीवन्त अदृश्य पथ–अप्राप्य संस्पर्श का विस्मित […]
—-आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–शुष्क पड़ी संवेदना, आहत निज सम्बन्ध।अजब खेल है मोह का, कैसा यह अनुबन्ध?दो–मेरा-तेरा किस लिए, माया से अब डोल।गठरी दाबे काँख में, द्वार हृदय का खोल।।तीन–छक कर अब है जी लिया, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘दैनिक जागरण-परिवार’ ने ‘हिंदी हैं हम’ के अन्तर्गत हमारी भाषा-शुचिता अभियान को गति देते हुए, ‘शहीद-शहादत’ तथा ‘शहीद की पत्नी’ के स्थान पर हमारी भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा मूल्यबोध से […]
‘अरबी-फ़ारसी’ शब्दों का शुद्ध प्रयोग करना सीखें आज हम लीक से हटकर उस मार्ग पर चलेंगे, जिस पर चलने का साहस हमारे ‘विद्वज्जन’ नहीं कर पाते हैं; और वह मार्ग है, ‘विलक्षण ज्ञानमार्ग’। हम जब […]
आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय ऊपर के दोनों चित्र ‘आज तक’ समाचार-चैनल के हैं। स्टुडियो से एंकर मीनाक्षी ‘लेह’ में पहुँचे अपने संवाददाता मंजीत से प्रश्न-प्रतिप्रश्न कर चीन के विरुद्ध की जा रही-की गयी भारत की […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारे सम्पादकीय के शीर्षक को समझने के लिए भारत के विदेशमन्त्री एस० जयशंकर के इस अदूरदर्शितापूर्ण कथन को समझा जा सकता है– गलवान में […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–तेरी चोंचलेबाज़ी-ज़ुम्लेबाज़ी सबने देख ली है,उलटी गिनती शुरू हो गयी, जनता अब जागने को है।दो–मुझसे कुछ पूछने से तुम्हें ‘तुम्हारा हासिल’ क्या?पगडंडियों को छोड़ता नहीं, ‘चौराहों’ पे जवाब देता नहीं।तीन–इन्क़िलाब […]
त्वरित टिप्पणी — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारे देश के ग़द्दार नेताओं ने ‘हिन्दू-मुसलमान’, ‘मन्दिर-मस्जिद’, ‘जयश्रीराम-भगवा’, ‘भारत-पाकिस्तान’ आदिक के सब्ज़बाग़ दिखाकर देश की धर्मान्ध जनता को भटकाने और उन्हें छलने के अलावा कुछ नहीं किया […]
चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बाक़लम मैंने ‘सच’ की निगाहबानी की है,क़लमबेचकर तमाशा दिखानेवाले कहीं और हैं।दो–हवा मंज़ूर करती है, मेरी दीवानगी,उसे मालूम है, मेरी कैफ़ीयत का जुनूँ।तीन–ख़त और ख़ुतूत की बातें अब […]
चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–यक़ीं हो गया, वह क़ाबिले-तारीफ़ नहीं,खड़ा ज़मीं पे और उड़ता आसमाँ में है।दो–मैं जिधर जाना चाहूँ, जाने दो, रोको न मुझे,इशारों-इशारों में किसी रिश्ते का नाम न दो।तीन […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–नुमाइश किसकी लगी है, यह तो पता न चला,आँखें खुलीं तो जुम्हूरियत१ का हाथ बँधा पाया।दो–ज़ुल्मत२ हर सू, चिराग़ अब बन्धक है,एलान कर दो, रौशनी मैं उगाता हूँ।तीन :ज़ोरआज़्मा ज़ोरेबाज़ू […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आम जनता गऊ है, जैसा चाहो, दूहो, सोखो, नोचो-बकोटो और विरोध करने पर ‘राष्ट्रद्रोह’ का केस ठोंकवाकर जेल में ठूँसवा दो। देश की सरकार के […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रयागराज के उस वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का पलक झपकते ही पद की तैनाती से बाहर करते हुए, प्रतीक्षारत कर दिया गया है। ऐसा इसलिए कि अनिरुद्ध पंकज नामक कर्त्तव्यपरायण पुलिस-अधिकारी […]
एक ‘विद्रोही’ की डायरी ”डंके की चोट पर” अन्त:करण से निकले शब्द महासागर के तटप्रान्त के निभृत निलय (एकान्त स्थान) पर जब स्वयं को खड़ा पाता हूँ तब जीवन का सच्चा पक्ष मेरे समक्ष आ […]
–– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अपर्णा यादव को ‘वाई’ श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री ने आदेश क्यों किया? किस आतंकवादी ने उन्हें धमकी दी है? इतना ही नहीं, अपर्णा यादव […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उत्तरप्रदेश में प्रतिदिन छद्म शिक्षकों के चेहरे सामने आ रहे हैं और उन्हें गिरिफ़्तार भी किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि अलीगढ़ के पालीमुकीमपुर के बिजौली ब्लॉक […]
‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय देश के किसी भी सिद्धपीठ मन्दिर के देवी-देव से वरदान माँगने पर यदि उसकी पूर्णता हो जाती तो आज देश में कोई ग़रीब नहीं […]
——– ‘नुक़्त:’ का प्रयोग ——– किस भाषान्तर्गत किस-किस शब्द में नुक़्त: (बिन्दी; अरबीभाषा का शब्द) का प्रयोग होगा, यह सतत अध्ययन और साधना का विषय है। बिना अध्ययन और अध्यवसाय के अनुचित प्रश्न-प्रतिप्रश्न करना, जड़बुद्धिता […]
आज शिक्षाजगत् में ग़लत तरीक़े से प्रश्नपत्र बनवाये जाते हैं; परीक्षाओं से पूर्व प्रश्नपत्रपत्र बिक रहे हैं; छद्म शैक्षिक प्रमाणपत्र बनाये जा रहे हैं। रिश्वत और पहुँच के आधार पर साक्षात्-परीक्षाओं के आयोजन होते हैं; […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पथिक !परिचित पड़ाओं की प्रतीक्षाकब तक सहते रहोगे?अपरिचित राहें होतींतो पाँवों के छालेयों शिकायत नहीं करते।मरहम की तलाश में भटकनाकब भूल पाओगे?भिखारिन पगडण्डियों परकिसी पहचानी क़दमों की आहटजब-जब तुम्हारे कानों […]
कृपया ध्यान करें (‘ध्यान दें’ अशुद्ध प्रयोग है; क्योंकि ध्यान क्रियात्मक शब्द है। ध्यान किया जाता है; दिया नहीं जाता।) १- यथोचित स्थलों पर तिथि के बाद अल्प विरामचिह्न (,) लगाकर वर्ष लिखा जाता है; […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अनामिका शुक्ला (पुत्री सुभाष शुक्ला) :– अनामिका सिंह, प्रिया सिंह, सुप्रिया सिंह, प्रिया जाटव (पुत्री महीपाल सिंह) और अब रीना (पुत्री चन्द्रभान सिंह) ……. पहले फ़र्रुख़ाबाद के किसी गाँव की निवासिनी, […]
प्रिय भाई कोरोना! जुग-जुग जियो। इटली, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका आदिक देशों में तुम्हारा भाव बढ़ रहा था तब मुझे श्रीराम की तरह से कहना पड़ा था– अपि स्वर्णमय कोरोना पाश्चात्य देश: न […]
देववाणी संस्कृत-भाषा में पच्चीस ग्रन्थों– ‘अध्यात्म रामायण’, ‘रामगीतागोविन्दम्’, ‘गीताशंकर’, ‘संगीतमाधवम्’, ‘राहुलरचनामृतं’, ‘गीतगिरीशम्’ आदिक के सम्पादक ‘शास्त्रचूणामणि’ से अलंकृत; ‘संगमनी’ नामक पत्रिका के विश्रुत सम्पादक तथा हिन्दी साहित्य-सम्मेलन प्रयाग’ के विद्वान् निवर्तमान प्रधानमन्त्री पण्डित प्रभात शास्त्री […]