poem
कविता : बदलाव
हालात मत पूछिएबदलते रहते हैं।समय मत पूछिएगुजरता रहता है।मोहब्बत मत कीजिएहोती रहती है।दिल्लगी मत कीजिएदिलदार औरो से भीदिल लगाते रहते हैं।परिस्थिति मत देखिएस्थिति बदलती रहती है।हमसफर जल्दीमत बनाइएहमराही बदलते रहते हैं। राजीव डोगरा (भाषा अध्यापक)राजकीय […]
याद आते हैं वह दिन
याद आते हैं वह दिन ,जब हम साथ होते थे।लड़ते झगड़ते फिर मनाते ,वो दिन भी क्या खास होते थे।जो कभी हमें खास समझते हैं,वह अब अनजान बनकर फिरते हैं।अब कितनी बातें छुपाते हो ,जो […]
जड़-चेतन हैं काँपते, माँग रहे हैं ताप
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक– ठिठुरन ठिठकी ठण्ढ मे, टूट देह की जोड़। माघ-पूस की शीत मे, धरती पड़े न गोड़१।। दो– हवा हवाई हाल है, ख़तरे मे मुसकान। जीव-जगत् जड़ दिख रहा, जाड़े […]
हंस वंश अवतंस-सम, मुरली की है तान
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक– दिल दिमाग़ से दूर है, मति-गति भी है दूर। बन्द दिखें आँखें खुलीं, अच्छे हमसे सूर।। दो– रूप रूपसी से कहे, रुतबा का नहिं जोड़। रूप-रंग१ रचना रचे, रूपक […]
विरह में जीवन का उत्कर्ष, जनवरी लाती है नव वर्ष
जनवरी लाती है नव वर्ष ।दिसम्बर जाता है हर वर्ष ।नवल उत्साह, तरंग, उमंग,वर्ष भर चलते हैं संघर्ष ।। सुनहली प्रात, रुपहली शान ।प्रभाती सुमधुर पंछी गान ।विविध रंग पुष्प, वल्लरी-रास,प्रकृति अवलोकन देता हर्ष ।। […]
नये साल मे
नये साल मेंएक नए युग काआगाज होगा।महाकाल महाकालीके भक्तों काजय-जयकार होगा।छाया था जोजीवन में घोर अंधकारउसमें भीप्रकाश होगा।हार चुके हैंजो हम दावउसमें भीजीत का आयाम होगा।करते हैं जोहमसे नफरतनए साल मेंउनको भीहमसे प्यार होगा। राजीव […]
देहावसान के सन्निकट पहुँचते मेरे सहयात्री!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे विश्वसनीय एकवर्षीय सहयात्री!अपने बलिष्ठ कन्धों पर,तीन सौ पैंसठ दिवसीय अनियन्त्रित-नियन्त्रित भारप्रतिक्षण लादकर,अनवरत-अनथक यात्रा करते-करते,तुम अतीतोन्मुख होते जा रहे हो।त्वरित गति मे कृषकाय१ होते,तुम्हारे स्कन्धप्रान्त२,अब क्लान्त३ हो रहे हैं।तुम श्रान्त४ […]
रह गए थे जो सपने अधूरे
प्रान्शुल त्रिपाठी, रीवा, मध्य प्रदेश चलो फिर से नए जोश नए उल्लास से नववर्ष मनाते हैं,रह गए थे जो सपने अधूरे अभी उन्हें अब फिर से सजाते हैं ।कौन अपना कौन पराया इस भेदभाव को […]
अखबार तो अखबार होता है
अखबार तो अखबार होता है। बीते दिन क्या हुआ कहां, क्या कल होने वाला।आज कहां पर कैम्प लगेगा, कौन है आने वाला।।अखबार में लिखी खबर पढ़के, एतबार होता है।अखबार तो अखबार होता है।। एक बार […]
मत वहन करो
मत वहन करो मेरे विचार कोमुझे भी नहीं चाहिएतुमसे अलंकार के भूषण।मत वहन करो मेरी वाणी कोमुझे भी नहीं चाहिएतुमसे छंदों के बंधन।मत वहन करो मेरे अंतर्द्वंद कोमुझे भी नहीं चाहिएतुमसे परिछंदों के द्वंद।मत वहन […]
अब बहुत सो चुके….
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जीभर आँखें खोलो! देखो इन नामर्द दरवाज़ों को; सिटकिनियों के इशारे पर नाचते आ रहे हैं। भीतर का माहौल अघोषित आपातकालीन इन्तज़ामात१ के हवाले है। हवा बेचैन है; दरवाज़े को […]
किसी के पास वक्त नहीं
इस भागदौड़ की जिंदगी में किसी के पास वक्त नहीं ,कुछ अपनों के लिए समय निकालें ,वरना ,जिंदगी यूँ ही निकलती जा रही ,हम अपनों के साथ वक्त नहीं बिता पा रहे हैं ,परिवार के […]
ठिठुरन बढ़ने लगी
दिन छोटे रात लम्बी होने लगीगुनगुनी धूप छत पे उतरने लगी।बढने लगी हाँ ठिठुरन बढने लगी। आ गई ठण्ड रजाई ले लीजिए,दूध के संग मलाई ले लीजिए।बाजरे की रोटी; बेसन की करी,घी-मक्खन की तराई ले […]
जनवरी आ रही है
फिर एक बार दिसंबर जा रहा है माहे जनवरी आ रही है,बहुत खुश दिख रहे हो क्या सुकून कि घड़ी आ रही है,ये तो बताओ दिन तारीख साल के सिवा कुछ और भी बदलेगा,या जो […]
माँ तू मेरे जीवन की बुनियाद
माँ तू मेरे जीवन की वो बुनियाद हैजिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहींमेरे बिना बोले मेरे चेहरे सेमेरे दिल की हर इक वो बात बूझ लेती होजिसे मैं बोल नहीं पातापरछाई की तरह चलती है […]
बारिश की वो पहली बूंदें
बारिश की वो पहली बूंदे कलियों कीपलकों पर बैठकर टिमटिमाई होंगी,बहती हुई बयारों से लिपटकर सर्दनन्हीं शबनम छुपकर के नहाई होगी। दरीचों से निकलकर के महीन बूंदेंफिर प्रांगण मे चुपके से गिरी होंगी,कमरे के नर्म-नर्म […]
लगती हैं क्यों सबको परायी बेटियाँ
ग़ज़ल : बह्र- 2212 2212 2212 निहाल सिंह, झुञ्झनू, राजस्थान फूलों के जैसे मुस्कराई बेटियाँभंवरों के जैसे गुनगुनाई बेटियाँ। माँ, बेटी, अनुजा और तिय के रूप मेंरिश्ता वो सब से ही निभाई बेटियाँ। बेटे की […]
कविता : आक्रोश
मुझे आक्रोश है आज भीउन लोगों से जिन्होंनेमेरा साथ तब छोड़ाजब मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी। मुझे आक्रोश है आज भीउन लोगो से जिन्होंनेमेरी मोहब्बत को तब ठुकरयाजब मुझे किसी के प्यार की जरूरत थी। […]
शिक्षा से ही गरीबी दूर होगी
बाबूजी! कहांँ चलना है?आ जाइए ! मेरे रिक्शे में बैठिए!आप घबराइए नहीं मैं आराम से चलूंँगा ,मुझे कहीं गड्ढा या ब्रेकर मिलेगामैं रिक्शा की गति धीरे कर लूँगा। अम्मा आओ!पहले बैग हमको थमा करआराम से […]
मै चरणदास समाज हूँ
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरी नामर्दगी, मर्दों की टोली का नेतृत्व कर रही है। भोले-भाले ज़बाँ पर लगे तालों की चाबियाँ, मुखिया की जेब मे हैं। वह ललकारता है :– हैसियत हो तो जेब […]
बड़े बुजुर्गों से मिलता है आशीर्वाद
बड़े बुजुर्गों से मिलता आशीर्वादबेटी तुम हो! माँ सीता! जैसी;त्याग समर्पण की देवी, साक्षात् लक्ष्मी ,जिस घर में जाओगी बिटिया!वह घर ख़ुशियों से भर जाएगा ,मांँ सीता के जैसे ही ; तुममें प्रेम है,धैर्यता ,गंभीरता […]
मानव जीवन बहुत अमूल्य है
मेरे प्यारे बच्चों सुनो!बड़े भाग्य से मानुष तन पाया ,आओ , इस जीवन को सार्थक कर लें ,किस उद्देश्य यह जीवन मिला ,आओ , हम इसको जाने ,एक – एक पल बड़ा है मूल्यवान ,रात्रि […]
कविता – आने के पहले
आकांक्षा मिश्रा, उत्तर प्रदेश अनन्त प्रतीक्षा बादतुम्हें मैंने पायाएक बार न कोई सवालन कोई जानने की जिज्ञासा मेरे हृदय में कुछ पीड़ाउमड़ रही थीतुमसे शिकायत करकेजी हल्का करना चाह रही थीऐसा न हुआमन की चिंताओं […]
मछली पर कविता : मछली! तुम एकनिष्ठ हो
हे! जलजीवनतुम मस्त रहती हो अपनी दुनिया मेंना तुममें भेदभाव की भावनातुम प्रेममयी होतालाब, नदियांँ, सागर की तुम रानी होअहं नहीं तुमको अपनी सुंदरता पर।रंग-विरंगी दिखती होतुम तो मेरे मन को भाती हो,जल से करती […]
शतरंज की चाल
हमारी सूझबूझ हमारे जीवन को सफल बनाती है,सफलता मिलें जिंदगी में,कभी-कभी मुझे शतरंज की चाल चलनी पड़ती है। मैं सोच समझकर निर्णय लेती हूँ,नित कदम आगे बढ़ाती हूँ,कठिन परिस्थितियों में भी! समस्या का समाधान करती […]
कविता : कोई पता नहीं
अपने थे या बेगानेकोई पता नहीं।गम देगे या खुशियांकोई पता नहीं।मुस्कुरा कर गए यारुलाकर गएकोई पता नहीं।हंसते हुए रुला गएया रुलाते हुए हंसा गएकोई पता नहीं।बेनाम का नाम कर गएया फिर बदनाम कर गएकोई पता […]
बेईमान चाहत
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उखाड़ फेंको उस बूढ़े बरगद को, जो समावेशी चरित्र भूलकर आत्म-केन्द्रित हो चुका है। उसका समन्वयवादी चरित्र एकपक्षीय बनकर रह गया है। वह अन्य बीजों के अंकुरण होने, पौधों के […]
मेरे हुजूर!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशर्म निगाहों का भ्रम तोड़िए हुजूर!झूठी आदतों को आप छोड़िए हुजूर!मर रहा आँखों का पानी आपका हर बार,बिखरा है देश अपना, उसे जोड़िए हुजूर!सब्ज़बाग़ देखकर आँखें गयी हैं थक,नज़रें ज़ुम्लेबाज़ी […]
ढपोरशंखी नीयत है छल रही
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• खेती-किसानी है जल रही, शासन की नीति है खल रही। कौन-सा गुनाह था किसानों का? उनकी ख़ुशी हाथ है मल रही। धोखा बना आश्वासन का सूरज, चहुँ दिशि बदली […]
बिनब्याही अपूर्णता
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय तुम्हारी पूर्णतारास नहीं आती मुझे;क्योंकि तुम द्रुतगामी प्रकृति से युक्त हो।हाँ, मै अपूर्ण हूँ।तुम मुग्ध हो, अपनी पूर्णता परऔर मुझे गर्व है, अपनी अपूर्णता पर;क्योंकि आज मुझेएहसास हो रहा है :–रिक्तता […]
रूप और कला का संघर्षण
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रूप ने कला से कहा :–तेरा दृष्टि-अनुलेपन है अनुपम,तू रूप को सुरूप करती है।विरूप को कुरूप रचती हैतू सुरूप को विद्रूप बनाती है।तू रंग-रोगन करती हैऔर उकेरी गयी व्यथा-कथा को,एक […]
देख शून्य की ओर, अपनी व्यथा सुनाती हूंँ
शून्य मैं अपने जीवन सेजब कभी हताश होती हूंँ , देख शून्य की ओरअपनी व्यथा सुनाती हूंँ। मौन होकर वह मुझे सुनता ,मेरे मन का बोझ हल्का होता , चेतना प्रकाश से कहती –उसकी चुप्पी […]
आख़िर कब तक?
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जुम्हूरियत१^ को नंगा दिखाओगे कब तक? बेशर्मी की सीरत२ दिखाओगे कब तक? जाहिल-मवाली दिखे हैं हर जानिब३, लुच्चों को सिर पे बिठाओगे कब तक? तवाइफ़^ से बढ़कर सियासत है दिखती, माख़ौल […]
मन से मन की
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरी अनहद१ बाँसुरी प्रलय की धुन सुनाती है। कातर२ आँखें, जन-जीवन से पृथक् दृष्टि-अनुलेपन३ करती हैं, काल के कपोलों पर। मुझ पर दृष्टि चुभोती, विहँसती, अल्हड़ गौरैया पंख झाड़ फुर्र […]
स्वजन बनते दुर्जन
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आस्थाविश्वासआश्वासनश्रद्धाभक्तिसमर्पणसाहित्य के विषय हैंऔर सिद्धान्त के भी।व्यवहार के जगत् मेइनका प्रयोजनछल-प्रपंच से है।स्वजनदुर्जन बन जाते हैं।एक निर्वात् दृष्टिबोधप्रकट होता है,और चरित्र परदृष्टि-अनुलेपन कराकरअन्तर्हित हो जाता है।अकस्मात् चिर-संचितक्षणिक विश्वास भीकापुरुष बन […]
एक प्रयोगधर्मी-दार्शनिक अभिव्यक्ति
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय शरीर मुझसे दूर जा रहा है,वा शरीर से दूर जा रहा हूँ।अशरीरी रहकर जीवन की कल्पनासमृद्धि के अन्तिम छोर पर अडिग खड़ी है।चर्मचक्षु से परे अपरा-पराविद्याका स्मृति-वातायनमन-गाम्भीर्य का दोहन नहीं […]
एक और चेहरा
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे चेहरे पे जो चेहरा है,हक़ीक़त बयाँ नहीं करता;वह चिटकता भी नहीं।उसका पारदर्शी चरित्रअक्खड़ बन चुका है।भेद की एक अबेध्य नगरी,उसके आस-पास बसा दी गयी है।उसमे अपने हैं; पर रास […]
संघर्ष में आनंद छुपा है, उसे ढूंँढ लेना तुम
संघर्ष में आनंद छुपा है ,उसे ढूंँढ लेना तुम! फूलों की तरह खिलना तुम!कांँटों के बीच में रहकर भी!ज़िंदगी में आगे बढ़ना,और जीवन को समझना,फूलों की तरह मुस्कुराना सीख लेना तुम! आता है उतार – […]
निजीकरण से त्रस्त है, शिक्षित युवा समाज
अभी नहीं मैदान तय, ठोंक रहे हैं ताल।मुझको भी भविष्य में शायद, मिल जाये कुछ माल ।। चढ़ा बुखार चुनाव का, कर्मठ हुए अधीर ।नौसिखिये भी हो चले, सैद्धांतिक वीर ।। सेवा करूँ समाज की, […]
कोई भी मौसम आये
कोई भी मौसम आए और जाए ,मेरा दिल तेरे लिए ही धड़केगा बदल जाए ज़माना ,तेरा दीवाना न बदलेगा। मैंने तुझसे , जो वादा किया ,तेरा आशिक़ निभाएगा। मुझ पर भरोसा कर लो ! तुम […]
अन्धेरा भीतर भरा, बाहर दीप-प्रकाश
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–इधर लाश-अम्बार है, उधर चुनावी बोल।लज्जा हँस-हँस घूमकर, पीट रही है ढोल।।दो–लोग बने लतख़ोर हैं, आँख हुई हैं बन्द।नेता हैं सब जानते, रचते तब फरफन्द।।तीन–अन्धेरा भीतर भरा, बाहर दीप-प्रकाश।भूख देह […]
काश! मेरा भाई मेरे पास होता
काश! तू मेरे पास होताजिंदगी में कोईगम न होता।अपना हाथमेरे सिर पर रखता।काश! मेरा भाईमेरे पास होता।यूं तो बहुत हैतेरी जगह परपर जहां तेरी जगह होती हैवहां कोई ओरनहीं होता।काश मेरा भाईमेरी जिंदगी में होताजिंदगी […]
हर जगह हरियाली छायी है
हर जगह हरियाली छायी है,पेड़-पौधों ने हरियाली बिछायी है ।हर जगह रंगीन नजारा है,यह रंग-विरंगे फूलों ने बनाया है ।भोले-भाले लोग वहां,हिमाचल जैसा देश हो जहांलड़ाई-झगड़ों से दूर है रहते,एकदूसरे में प्यार की भावना को […]
ज़ह्र-ज़ह्र होता पर्यावरण!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हुस्न की रंगत,चाह की संगत;अब ‘भाती’ नहीं।तनहा-तनहा तन,रीता-रीता मन;अब ‘साथी’ नहीं।उदास है घोंसला,ज़ह्र-ज़ह्र पर्यावरण;चिड़िया ‘आती’ नहीं।प्रकृति नहीं स्वच्छ,वायुमण्डल विषाक्त;कलुषता ‘जाती’ नहीं। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ नवम्बर, […]
एक अभिव्यक्ति
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय काल के कपोलों पर,अप्रत्याशित शैली मेजैसे ही मैने अधरों से हस्ताक्षर किये,वह संन्यस्त-सा भाव लिये बोला,“तुमने भेद जिया का क्यों खोला?”मेरा मन भोला, कुछ नहीं बोला। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० […]
सवालात मन से उलझते रहे
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय नूरानी१ चेहरा सोता रहा, चश्मोचिराग़२ रोता रहा। मसाइल३ से वाक़िफ़ रहा ही कहाँ, ख़ुद-से-खुद-को ही ढोता रहा। अन्दाज़े बयाँ चश्मे नम४ का यहाँ, ज़ेह्न५ मे जाने क्या बोता रहा। कश्ती […]
हिन्दी कविता– रहने दो
कुछ ख्वाब कुछ यादेंमुझ में रहने दोन मिल सको तो न मिलोखुद को मुझ में ही रहने दो।बीता हुआ वक्त औरबीती हुई बातेंकभी लौट कर नहीं आती,मगर फिर भीउन यादों कोमुझ में सिमटे रहने दो।जो […]
आजादी का अमृत महोत्सव
बड़ी धूमधाम से आजादी का अमृत महोत्सव मनायेंगे ,गली-मोहल्लों में भारत के शूरवीरों की गाथा गायेंगे। सत्य, अहिंसा, प्रेम के पुजारी बापू का दर्शन हम अपनाएंगे,बैरी ना माने तो आजाद बनकर दिखलाएंगे। मातृभूमि की रक्षा […]
होती है तो निन्दा होने दे
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सूरज को शर्मिन्दा होने दे, चाहत को परिन्दा होने दे। हिम्मत को सजा ले होठों पे, ज़ालिम को दरिन्दा होने दे। ज़ुल्फ़ों को झटक दे चेहरे से, औ’ ख़ुद को […]
विषाक्त उत्सवधर्मिता!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय दीपवर्तिका की ज्वलनशीलतालोकमानस की सहनशीलता।पृथक्-पृथक् पथ पर परिलक्षितदो समानान्तर दूरी पर गतिमान।संवाद-हेतु अवकाश पर प्रश्नचिह्नकिस-हेतु लोक का दीप-प्रज्वलन?मात्र आमोद-प्रमोद का विज्ञापन?दीप-प्रज्वलन निहितार्थ से नितान्त परे,प्रकृतिसंहारक मनोवृत्ति का प्रदर्शन?प्रतिस्पर्द्धा का नग्न […]
जागो एक बार
जागो एक बारअपनी अंतरात्मा कीआवाज़ के लिए।जागो एक बारअपने हृदय में पनपत्तिअभिलाषाओं के लिए।जागो एक बारअपने अंतर्मन में छिपीसत्यनिष्ठा के लिए।जागो एक बारअपनी स्वतंत्रता कीमर्यादा कोकायम रखने के लिए।जागो एक बारस्वयं के अंतर्मन में छिपीअंतरात्मा […]
ज़िंदगी की रफ़्तार
तेज रफ़्तार से मैं चलती रही,कभी पीछे मुड़ के देखा नहीं ,करना है जीवन में बहुत कार्य,घर – परिवार से लेकर बाहर तकमैं तेज रफ्तार में दौड़ती रही,तनिक भी नहीं किया आराम,समय एक दिन वह […]
दीपावली आयी
अंँधेरा है जीवन में ,थोड़ा – सा उजाला मिल जाए ,पल दो पल में ,दु:ख के बादल छट जाए,एक किरण हमको भी मिल जाए,थोड़ा – सा हम भी हंँस लें । घर घर ख़ुशियांँ लेकर […]
दीपावली पर कविता : दीपकों के धर्म से रात भी है जागती
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’– मृत्तिका निर्मित दीये से है अमावस काँपती। जलते हुए नन्हें दीये से डरकर निशा है भागती। दीपक-देह की अभिव्यंजना से रात जगमग हो रही। दीपकों के धर्म से रात भी अब […]
मेरी बात अधूरी रह गयी
तुमसे मिलने आई थी ,कहनी थी तुमसे एक बात ,तुमको देख कर भूल गई ,तुम्हें देखती रह गई सारी रात ,बात अधूरी रह गई। दिल का क्या सुनाऊँ तुम्हें हालतेरे सिवाय ना आए कोई ख्यालमन […]
मोहब्बत की दास्तान
मैने जिसे चाहा , वह चाहता किसी और को ,जिसके लिए मैं तड़पी, वह तड़पा किसी और के लिए ,मैंने जिसे बेपनाह प्यार किया , वह प्यार किया किसी और को ,मैं जिसके लिए रोई […]
मोहब्बत होने के आसार
नफ़रत सोच समझ कर करनामोहब्बत होने केआसार होते हैं। बात सोच समझ कर करनाइश्क से सबनासार होते हैं। दिल की बात सोच समझ कर करनाअपनों में भी कईगद्दार होते हैं। हमराही को हमसफर सोच समझकर […]
गतिमान् लक्ष्य
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हास कोइतिहास मत बनने दो;उपहास को,परिहास मत बनने दो।आगत-अनागतथाली मे तेल-बाती लिये,प्रतीक्षा सह रहे हैं;बाट जोह रहे हैं; उस पल का,जब तुम अपने होनेअथवा न होने की प्रतीति का,अनुभव कराओगे।मेरे […]
जल है सबके लिये अनमोल
जल है सबके लिए अनमोल,इसका नहीं है कोई मोल।जल है जीवन का सार,मत करो इसे बर्बाद।पानी से है जीवन की आस,इसे बचाने का करो प्रयास।जल की एक एक बूंद है कीमतीइसमें ही सबकी जान है […]
आओ! चल चलें ‘पृथ्वी’ उस दिशा मे हम…..
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ग़म-ख़ुशी का फ़र्क़, महसूस होता है;यहाँ न कोई अपना, महसूस होता है।सौग़ात में मिलता रहा, दर्द का पिटारा;रिश्तों में दरार, अब महसूस होता है।जवानी ने भी छीन लीं, किलकारियाँ;बचपन बुढ़ापे-सा, […]
याद हूंँ मैं
तुम भूल गए हो या याद हूंँ मैंअपनी धुन में खोए हुए रहते हो ,मन में आस लिए , तेरी राह में ,पलकें बिछाए बैठी रहती हूँ । कहीं खो गई हूंँ या याद हूंँ […]
नयी मोहब्बत
जो चेहरे परनकाब लिए फिरते हैंअक्सर वही मोहब्बत केआसार लिए फिरते हैं।बोलना है तोकुछ बोलिए जनाबक्यों ऐसे चेहरे परमुस्कान लिए फिरते हैं।लबों से लबजोड़ ही लिए हैं तोबोलिए कुछ जनाबक्यों आंखों केइशारे किए फिरते हैं।लिखना […]
जिसने भी अभिमान किया है, उसने हमेशा मुँह की खायी
आज दशहरे की घड़ी आयी।झूठ पर सच की जीत है आयी।रामचंद्र ने रावण मारा।तोड़ दिया अभिमानी काअभिमान सारा।एक बुराई रोज हटाओ।और दशहरा रोज मनाओ।विजय सत्य की हुईं हमेशाहारती सदा बुराई आयी।जिसने भी अभिमान किया हैउसने […]
विजय सत्य की हुई हमेशा हारी सदा बुराई है
विजय सत्य की हुई हमेशाहारी सदा बुराई है।आया दशहरे का उत्सवकरनी सबकी भलाई है।बुराई को जलाना हैदशहरे का उत्सव मनाना है।अब नहीं और हमें बुराईको बढ़ाना है।दशहरे के दिन हमें अपनेअंदर के रावण को जलाना […]
जीवन का सारांश
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पत्नी उवाच :–सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़।कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।।हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह।खटपट भी होता रहे, अलग न होगी […]
कुल्लू का दशहरा
दशहरा आयादशहरा आयाबच्चों ने है ।रावण का पुतला बनायाराम बनकरआग वाला तीर चलाया।फटे पटाखे, फेंके फूल,बच्चों ने खुशियाँ मनायीं भरपूर।दिवाली के 20 दिनपहले है आता।रावण हर शहर मेंजलाया जाता।दूर-दूर से लोगदेखने है आते।इसलिए कुल्लू का […]
दशहरे का त्यौहार है आया
दशहरे का त्यौहार है आयासबके लिये खुशियों की सौगात है लाया।दशहरे का है यह त्यौहारअच्छाई पर होगी बुराई की हार।सदियों से यह त्यौहार मनाया।राम के हाथोंरावण का पुतला जलाया।हमको भी अपने दिल सेबुराई को मिटाना […]
दशहरा
जन-जन कीपरंपरा है दशहराजिसे मनाता हैपूरा हिंदुस्तान हमारा।आओ मिलकररावण को जलायेऔर इस त्यौहार कामहत्व सबको बताएं।जलता हुआ रावणदिखलाकर सबकोबुराई पर अच्छाई कीजीत दिखलाएं। वंशिका, 7वीं की छात्राराजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक, गाहलिया, कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
बुराई पर अच्छाई की जीत
5 अक्टूबर को एक त्यौहार आया है,इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है।दशहरे के नाम से इसे पुकारा जाता है।श्री राम ने इस दिन विजय पाई थी,रावण के साथ बुराई […]
विडम्बनावश!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चिन्दी-चिन्दी रातें पायीं,फाँकों में मुलाक़ात रही।मुरझायीं पंखुरियाँ देखीं,सहमी-सकुची बात रही।बेमुराद आँसू हैं छलके,याद पुरानी घात रही।दुलराते बूढ़े ज़ख़्मों को,बची-खुची बस रात रही।दौड़ा-धूपा हाथ न आया,परवशता की लात रही।भूखा पेट मौन […]
मेरे नयनो की प्रत्याशा मत लिख!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरी निगाहों की भाषा मत लिख!मेरी नज़रों की आशा मत लिख!देख! मंज़र जवाँ हो रहा हौले-हौले,मेरे नेत्रों की अभिलाषा मत लिख!तुझे बूझते-बूझते बुझता जा रहा,मेरी आँखों की परिभाषा मत लिख!ज़माना […]
अपना बँट गया उनकी नज़रों से
——०एक अभिव्यक्ति०—— ● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कोई कट गया उनकी नज़रों से,पर्द: हट गया उनकी नज़रों से।झुकीं निगाहें क़ह्र बरपाती रहीं,मन फट गया उनकी नज़रों से।ग़ैरों मे शामिल थे और अपनो मे,अपना बँट गया […]
एगो भोजपुरी हो जाऊ
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय केने से तू अइलू,केने से तू गइलू।अदतिया न छूटलि,घींच-घाँच के खइलू।सोगहग भा खाँड़ी-चुकी,मिलल जौन पइलू।नीमन भा बाउर,अपना मन के कइलू।पहले रहलू करियठ,चीकन अब कहइलू।तुहूँ ए लोकवा में,अपना लेखा भइलू। (सर्वाधिकार सुरक्षित– […]
न्याय-देवता कह रहे, लाओ! घर मे सौत
●आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति।मन्दिर मे मूरत दिखे, उड़न-छू हुई शक्ति।।दो–पट्टी बाँधे आँख मे, देश जगाता चोर।भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब शोर।।तीन–अजब-ग़ज़ब के लोग हैं, शर्म-हया से […]
मेरी ख़ुशियाँ, मेरे घर मे
1–मेरा घर छोटा–सा ही पर ,मेरे घर में रहनेवालों का दिल बहुत ही बड़ा है । 2–मैं महंगी वस्तुओं से नहीं,मैं बेला ,गुलाब , गुड़हल ,चंपा , चमेली फूलों से ,घर को सजा कर रखती […]
हिन्दी कविता : ख़्वाहिश
ख्वाहिश है मेरी उड़ने कीमुझे गिरना न सिखाइए।ख्वाहिश है मेरी मोहब्बत कीमुझे नफ़रत न सिखाइए।ख्वाहिश है मेरी जीतने कीमुझे हारना न सिखाइए।ख्वाहिश है मेरी मुस्कुराने कीमुझे रुलाना न सिखाइए।ख्वाहिश है मेरी जीने कीमुझे मरना न […]
हे संध्या रुको
हे संध्या ! रुको !थोड़ा धीरे – धीरे जानाइतनी जल्दी भी क्या है ?लौट आने दो!उन्हें अपने घरों में,जो सुबह से निकले हैंदो वक्त रोटी की तलाश में, मैं बैठी हूं अकेली,ना सखियाँ, ना कोई […]
रस मे डूबी गागरी, छन्दों का त्योहार”
‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’, प्रयागराज की ओर से हिन्दी-पखवाड़े के अवसर पर प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाले सांस्कृतिक महोत्सव ‘भाषारस-गागरी’ का आयोजन १८ सितम्बर को ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज मे किया गया। आरम्भ मे दीप-प्रज्वलन कर सांस्कृतिक समारोह का […]
मृत्यु का जयघोष
मृत्यु का जयघोष होगाना तुम होगे ना हम होंगे।मृत्यु का हाहाकार होगान पाप होंगे ना पुण्य होंगे।मृत्यु का तांडव होगान अपने होंगे न पराए होंगे।मृत्यु का नाच होगान घर होगा न गृहस्थी होगी।मृत्यु का रुदन […]
संभाल लेना
मैं पंथ से विपंथ न हो जाऊंमुझे संभाल लेना मेरे ईश्वर।मैं भक्त से अभक्त न बन जाऊंमुझे संभाल लेना मेरे ईश्वर।मैं पुण्य से पाप की तरफ न बढ़ जाऊंमुझे संभाल लेना मेरे ईश्वर।मैं न्याय से […]
नारी की अस्मिता
हर नारी की कहानी एक ही जैसी लगती ,कैसे कहूंँ मैं, अंतर्मन में पीड़ा को छुपाएंसपने को सजाती, औरों परअपार स्नेह लुटाती, स्वयं प्रेम की बोली के लिए तड़प जाती, एक नारी की व्यथा कोकौन […]
यादों की एक कॉपी
आखिरी भ्रम थाछटने लगा धुंध परछाईयों सेतुम मेरे साथ हो ! अजीब किनारे से चुप होकरप्रतिक्रिया देने के लिए हर बारएक सीधा सवाल कर जाते हो । आखिरी भ्रम थाये सीधी सरल जिंदगी अभीदो कदम […]
हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी
समूचे विश्व को जोड़ती है – हिंदीसहज सरल भावों की अभिव्यक्ति है – हिंदीसंयुक्त का महत्व बताती है – हिंदीहमारी एकता को दर्शाती है – हिंदीप्रेम की अविरल धारा बहती है – हिंदीजन में चेतना […]
हिन्दी दिवस: भाषारण्य में जब तक हिंदी रहेगी, धरा पर अभिव्यक्ति इसकी सर्वोत्तम रहेगी
ठिठुरती है ग्रीष्म में अब हिंदी वाणीवर्णमाला की नौका में आया है पानी। हिंदी के प्रियतम खिवैया बनकर इसमे बैठियेविपरीत धारा से ये आजन्म यात्रा कीजिए। हरिचरित के स्वरूप का यह बखान करतीदेश की संस्कृति […]
कविता : प्रेम
प्रेम उम्र नहींएहसास देखता है।प्रेम लगाव नहींतड़प देखता है।प्रेम मुस्कुराहट नहींआंखों में बहतेअश़्क देखता है।प्रेम हमउम्र नहींहमराही देखता है।प्रेम बहस नहींझुकाव देखता है।प्रेम बहता हुआ पानी नहींजलती हुई आग देखता है।प्रेम ह्रदय का रूप नहींचेहरे […]
कितने प्यारे हैं हमारे अध्यापक
धूल में मिट्टी के कण की तरह थे, आसमान का तारा बना दिया। कितने प्यारे हैं हमारे अध्यापक, हर काम के काबिल बना दिया। बहुत याद आओगे हमेशा, कौन समझाएगा हमें आप जैसा। हर काम […]
अंतरराष्ट्रीय वर्ल्ड रेकॉर्ड कवि सम्मेलन मे प्रदीप गढ़वाल ने जमाया रंग
कांगड़ा की नूरपुर तहसील में स्थित ग्योरा गांव के प्रदीप गढ़वाल ने महफिल अंतरराष्ट्रीय वर्ल्ड रेकॉर्ड कार्यक्रम में वाहवाही लूटी। बुलंदी साहित्य सेवा समिति के बैनर तले विश्व का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल कवि सम्मेलन […]
कविता : शिक्षक-दिवस
हर बार यह दिन आता है, शिक्षक दिवस यह कहलाता है। 5 सितंबर का दिन जब आता है, इसे डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। सही राह पर चलना सिखाते […]
नादान जीवन
कुछ नादानियांकुछ अठखेलियांबाकी है मुझ में ।क्षण-क्षण घूमतीमृत्यु के बीच मेंजीवांत जीवनबाकी है मुझ में।झूठ के चलते बवंडर मेंसत्य काजलता हुआ दीपकबाकी है मुझ में।जीवन मृत्यु के बोध मेंहे!ईश्वर तेरा ध्यानबाकी है मुझ में। राजीव […]
अब मैं सच्ची हार चुकी हूँ
वैसे तो जिंदा हूं,पर अंदर से मर चुकी हूं,हे जिंदगी !मैं तुझ से लड़-लड़ के थक चुकी हूं ।लोग कहते हैं यह करवह कर, पर मेरी मां कहती है ,तू जो कर पाए वह कर […]
जीवन-मृत्यु
जीवन और मृत्यु का भेदतुमको कुछ बतलाऊंगा।हो सका तो तुमकोसच्चा जीवन निर्वाह सिखलाऊंगा।क्षणभर का जीवनक्षणभर की मृत्युफिर भीतुमको कुछ बतलाऊंगा।भेदभाव की नीवजो रखी तुमनेंउसको भी एक दिन मिटाऊंगा।धर्म के नाम परअधर्म तुम करते होधर्म की […]
मगवा प्रकाशन की पुस्तक में संजना की प्रकाशित हुई कविता
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश : मगवा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक जय मां गंगा; जिसमें देश के विभिन्न राज्यों के लेखकों की कविताएं प्रकाशित हुई हैं, पुस्तक में गवर्नमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल गाहलियां की 12वीं कक्षा की […]