तेरा नाम ले के डूबे, दीवानगी पे रोये
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- पल-पल जो बढ़ रही है उस तिश्नगी पे रोए | ग़म-ए-ज़िन्दगी से ज़्यादा ग़म-ए-आशिक़ी पे रोए || मेरा राब्ता नहीं अब कुछ तुझसे रह गया है | रग-रग में फिर […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- पल-पल जो बढ़ रही है उस तिश्नगी पे रोए | ग़म-ए-ज़िन्दगी से ज़्यादा ग़म-ए-आशिक़ी पे रोए || मेरा राब्ता नहीं अब कुछ तुझसे रह गया है | रग-रग में फिर […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- जान मेरी छोड़ मुझको अगर जाएगी | ज़िन्दगी टूट कर के बिखर जाएगी || इन गुलाबों से ख़ुद को सजा लीजिए | कुछ तो इनकी भी लाली निखर जाएगी || […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ – बहुत तुमने सताया है चले आओ मुझे लेने | बहुत तुमने रुलाया है चले आओ मुझे लेने || नहीं जी पाएंगे तुम बिन बहुत तुम याद आते हो […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- ज़रा सोचो अधूरे ख़्वाब सजाने कौन आएगा | अगर रूठी तो अब तुमको मनाने कौन आएगा || सोचा मिलता चलूँ तुमसे कहीं मैं जा रहा था और | बहाने कर […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) बहारें चल कर आएंगी तेरा दामन सजाने को | मैं फिर से लौट आऊँगा तेरी दुनिया बसाने को || तुझे मिलने की ख़ातिर ग़र क़यामत का सफ़र ही है | […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) मुझको नहीं मालूम है कैसे तेरे अन्दर ज़िन्दा हूँ मैं तेरे दिल की क़ैद में रोता टूटा एक परिन्दा हूँ मैं। सारे जहाँ की ख़ुशियों को मैं ठोकर मार के […]
भावना दीपक मेहरा (कमला नगर, आगरा)- हम न समझा सके क्या हुआ देर तक औ तमाशा वहां पर लगा देर तक । की नहीं हमने कोई खता थी मगर क्यों मिली थी हमें फिर सजा […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) – तुम्हारे दिल में मेरे कुछ छिपे जज़्बात रह जाएं | मुझे तुम छोड़ न पाओ ऐसे हालात रह जाएं || मैं सब कुछ भूल भी जाऊँ मुझे […]
आदित्य त्रिपाठी, सहायक अध्यापक बे०शि०प० भला कब कौन समझा है! भला कब कौन समझेगा! हृदय की वेदना तेरे सिवा अब कौन समझेगा? मैं तुझको आजमा लेता मगर क्या आजमाऊँगा, तुम्हारे प्यार से दीपित दिये दिल […]
डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी (चिकित्सक/युवा साहित्यकार)- बंदर को आइना दिखाना , बात कठिन । मूरख को सच भी समझाना, बात कठिन। . साबुन से नहला दो ,ये कर सकते हो ! पर कुत्ते को गाय […]
मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) सज़ाएं काट लूँगा मैं तुम्हारा नाम न लूँगा | कभी भी अब ज़माने में प्यार से काम न लूँगा || मुहब्बत में असर होता तो ये हालात न होते | […]
डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- सोने जैसा खरा नही हूँ । पर इतना भी बुरा नही हूँ । मुद्दों को मत मीत बनाओ , मत राई को मेरु बनाओ। मेरे घाव बहुत दुखते हैं, मत खंजर […]
राघवेन्द्र कुमार “राघव” राजनीति के रंगे सियारों सेसारी उम्मीदें बेमानी हैं। सत्ता लोलुपता के कारणमर गया आँख का पानी है। भीतर विद्रोही मार रहेबाहर आतंकी काट रहे। लेकिन हम हैं बेशर्म बड़ेराजनीति ही हाँक रहे। […]
डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी ऐ मेरी देश की बहरी सरकार ! भला कब तक तू निंदा का राग यूँ अलापेगी? क्लीव हो चुके हैं देश के चालक सभी, दिल्ली की सोई हुई सत्ता कब जागेगी? […]
कृष्ण प्रिया- क्या लौट आई थी प्रतिध्वनि मेरी! स्वर न हो सका शंखनाद! उस दिन ख्वाबों के घाट तुम ही तो चले आए थे न श्याम मेरी आंखों में अविश्वास घनेरे थे कैसे करती विश्वास […]
सुधेश- चलते चलते हाथ पाँव थकते चलने की चाह नहीँ मरती देखते देखते आँखेँ धुँधलातीँ देखने की चाह नहीँ मरती दुनिया की चखचख सुनते कान बधिर सुनने की चाह नहीँ मरती घर बाहर का सब […]
डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- वो मेस वाला लड़का , जो खाना लेकर आता है। मेरे मन में वो ढेरो सवाल छोड़ जाता है । अभी उमर उसकी क्या होगी? दस ,बारह या तेरह , यही […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मन का प्यासा दूर है, तन का प्यासा पास।मृगमरीचिका ही दिखे, थोथी होती आस।।दो–रूप रूपसी रुत नहीं, रंग नूर अवसान।पलक झपकती आँख है, मची है घमासान।।तीन–गणित बदलता धूप का, जलती […]
योगेश समदर्शी (हास्य एवं ओज कवि)- जुगनू कुछ सूरज को हमने अब धमकाते देखे हैं सिंहों पर हमने कुछ गीदङ रौब जमाते देखे हैं बहकावे में आकर जिसने हाथ में पत्थर थाम लिए और शत्रु […]
पिण्टू कुमार पाल- आसमां भी आपका, जमी भी आपकी, हौसला भी आपका, उड़ान भी आपकी, उड़ो तो आसमान की ऊँचाई नाप दो, गिरो तो समंदर की गहराई नाप दो. भरो तुम बहुत ऊँची उड़ान, पर […]
—डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इश्क़ किया तो फिर न रख इतना नाज़ुक दिल माशूक़ से मिलना नहीं आसां ये राहे मुस्तक़िल । तैयार मुसीबत को न कर सकूंगा दिल मुंतकिल क़ुर्बान इस ग़म को तिरि ख़्वाहिश मिरि मंज़िल । मुक़द्दर यूँ सही महबूब तिरि उल्फ़त में बिस्मिल तसव्वुर में तिरा छूना हक़ीक़त में हुआ दाख़िल । कोई हद नहीं बेसब्र दिल जो कभी था मुतहम्मिल गले जो लगे अब हिजाब कैसा हो रहा मैं ग़ाफ़िल । तिरे आने से हैं अरमान जवाँ हसरतें हुई कामिल हो रहा बेहाल सँभालो मुझे मिरे हमदम फ़ाज़िल । नाशाद न देखूं तुझे कभी तिरे होने से है महफ़िल कैसे जा सकोगे दूर रखता हूँ यादों को मुत्तसिल ॥
पंकज चतुर्वेदी – जैसे-जैसे पकड़ तुम्हारी सख़्त होती है कश्मीर छूटता जाता है जिनकी हथियार में आस्था है वे समझ नहीं पाते कि प्यार का विकल्प नहीं है तुम उनसे अलग नहीं हो तुम नहीं […]
आकांक्षा मिश्रा (युवा साहित्यकार)- उसने कहा मेरे पास शब्द हैं तुम्हें जानने के लिए इतने शब्द हालात सम्भालने के काम आ सके क्या कहूँ ? अभी-अभी हृदय की पीड़ा बढ़ रही तुम अभी मौन हो […]
उषा लाल – जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ मेरी बेटी लगती है ! घड़ी घड़ी जिज्ञासित हो कर बहुत प्रश्न वह करती है भर कौतूहल आँखों में हर नई वस्तु को तकती है ! बात […]
योगेश समदर्शी (कवि/प्रकाशक)- मैं जिसे लिख ही न पाया, पीर मुझको खा रही है और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है। १. मुझमे कोई हँस रहा है, हाथ में विषधर लपेटे और मैं […]
डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- ऐ! रुको! रुको! मेरे अतीत,मत वर्तमान से खेल करो ! गाया तुमको मैने अतीत!जैसे कि कोई शोक गीत।तुम वर्तमान से दूर रहो,मत करो मेरे उर को सभीत।तुम मिट्टी थे, ये सोना […]
योगेश समदर्शी ( हास्य एवं ओज कवि)- लिखने से ना काम चलेगा, अब सडको पर आना होगा । मात भारती के गीतों को, घर घर जा कर गान होगा । सेना का अपमान देख कर, […]
सत्याधर (कुरसठ, हरदोई)- कब तक दिल का रोना रोयें,अब मत करिये उसको य़ाद ।जितनी गुजरी रो-रो गुजरी,शेष जो है ना कर बरबाद । खाकी, खादी, मुंसिफ, मुजरिमसब मिल बैठे हैं फिर तोकौन सुनेगा अपनी बोलोअब […]
योगेश समदर्शी (हास्य एवं ओज कवि)- गाँव बस खेत वालों का कभी भी नहीं रहा गाँव के लिए धोबी, कहार भी जरूरी थे । नाई और धीमर व बढ़ई जुलाहा सभी गावँ की व्यवस्था में […]
डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- जिंदगी को मैंने नजदीक से निहारा है । जेठ की दुपहरी में देखा बदन जलता हुआ। पसीने की बूंदो से तर बतर , वो काला नर, बैलों के साथ मे ही […]
अमित धर्मसिंह- गमले के गुलाब की तरह नहीं,हम कुकुरमुत्ते की तरह उगे । माली के फव्वारे नेनहीं सींचीं हमारी जड़ें,हमारी जड़ों नेपत्थर का सीना चीरकरखोजा पानीकुटज की तरह । कुम्हार के हाथों ने नहीं गढ़ा […]
उषा लाल– फागुन की बयार मनभावनपूनम का है चाँद ,जले होलिका अबकी ऐसीहर ले सबकी क्लांत !हो गुलाल रस प्रेम रंग कापिचकारी में प्रीत!गले मिलें सब इक दूजे केगिरा द्वेष की भीत!दहन करें अपने […]
आकांक्षा मिश्रा- बात कुछअटपटी सा लगी होगीलेकिन बात शुरू हुई,कहा हैं आप ?शायद मन झल्ला गया होगानिःसन्देह दोनो ही !आखिर ढाई शब्द के प्रश्न का उत्तर मिलाक्यों ?मौन एक क्षण होकरमायूसी ने दस्तक दे दीबस […]
डॉ.अन्नपूर्णा सिसोदिया ‘अमन’- जिंदगी आग है, संघर्ष की तपते रहिये हर लपट से कुंदन बन निखरते रहिये । अरुणिमा की रेख बन करती उजली राहें जिंदगी भोर है, हर घडी चलते रहिये । सुगंध सी […]
आकांक्षा मिश्रा- किसी पुरुष के सानिध्य में रहकर, स्त्री वाद की बात करे तो पूरी तरह से छिछलापन हैं कुरूपता लिए बेगढ़न्त बातें उतरती नहीं कड़वे घूंट की तरह पूजती हैं पत्थरों में अमरसुहाग के […]
–बाबूलाल दहिया (पद्मश्री)
डॉ० दिवाकर दत्त त्रिपाठ (चिकित्सक/युवा गीतकार)- कभी कभी इस उर की पीड़ा, पतझड़ जैसी हो जाती है ।रंग बिरंगी दुनिया , यह जब सेमल फूल सरीखी लगती ।कोयल की वह कूक कर्णप्रिय, कानो को तब […]
आकांक्षा मिश्रा (बस्ती)- सब गलियाँ सुनसान हैंखनकती आवाजें भी ख़ामोश हैं बचपन कमरों में कैद हुआ स्वयं के जीवन का बोध करता हुआअपनी माँ के प्रेम से दूर हैं गलियों में अंधेरा घना जीवन को भेदता […]
डॉ. आकांक्षा मिश्रा, बस्ती (उ. प्र.) प्रेम में डूबकर जख्म खाई लड़कियाँ आखिर हार जाती हैं ..। जीवन का हर दाँव , संवरने से पहले ही बिखर जाती हैं ..। जीवन से भी ; मंजिल […]
आकांक्षा मिश्रा, बस्ती उत्तर -प्रदेश- हे मनुष्य ! तुम कभी विफल नहीं हुए फिर अकारण निराश क्यों ? कल्पना के अधीन होकर स्थिरता का कैसा विस्तार कर रहा है मनुष्य । प्रकृति का स्पर्श ही […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–धर्म कहे दुनिया जिसे, भटका-भटका ज्ञान।कर्ममार्ग अज्ञात है, अटका-अटका ध्यान।।दो–महँगाई मुरदा हुई, मस्जिद हुई जवान।मन्दिर धन्धा बन गया, काट रहे सब कान।।तीन–बाबा बुल्डोजर बने, चला रहे हैं बाण।कहाँ न्याय-अन्याय है, […]
◆ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–सत् संवाद-शून्य है, लुप्त धरा का धाम।कलियुग को हम क्या कहें, जहाँ फँसे हैं राम।।दो–राम-नाम की लूट मे, भक्त फँसे हनुमान्।नेत्र घृणा की बन्द कर, सन्मति दे भगवान्।।तीन–भाँज रहे तलवार […]
Pawan Kashyap- तेरी इन झील सी आंखों में, जो ये नूर दिखता है । तेरे चेहरे की मदहोशी में, ये मन चूर दिखता है । कहीं जुल्फों का गिर जाना, कहीं अधरों का खुल जाना […]
सुधेश – ३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १०, दिल्ली ११००७५ भारत की जनसंख्या थी जब तैतीस करोड़ तब उतने ही थे देवता आज सवा सौ करोड़ में कितने देवता है ? शायद कुछ […]
सुधेश- पास के बगीचे मेँ एक बूढा पेड आँधी मेँ औँधे मुँह पडा था न माली पास आया न लकडी चोर धूप मेँ सूखा पानी मेँ गला यतीम सा पडा रहा कमबख्त मरने को। महीनोँ […]
डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)- यदि पत्थर हो जाऊँ और कोई उस पर फूल चढ़ा दे तो पत्थर भी पुजने लगता है वहाँ खड़ा होता है मन्दिर भक्तों की लगती भीड़ […]
डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय )
डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) ३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १० – सरकती सरकती चढ़ गई हिमालय कुछ दिनों बाद कोरी चमड़ी में खाज उठी सोचा एवरेस्ट की सैर करूँ […]
अमित द्विवेदी- एक पाषाण सा है मेरा अंतस जब कलम की नोक से तराशता हूँ तो साकार हो जाते है कई अनसुलझे रिश्ते कुछ अनकहे।
डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)- भीतर ज्वर में तन तपता बाहर कोकिल कूक रही मीठी वाणी भीनी भीनी बयार सरकती कत्थक नर्तकी सी । भाई ज्वर जल्दी उतरो बाहर लाखों का […]
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रयागराज के सघन पदातिक पथ परविश्रान्त-क्लान्त शयन करती प्रौढ़ा,आजीविका-साधन से समन्वय-सामंजस्य स्थापित करती;अद्भुत एकान्वित और पार्थक्य केआचरण की सभ्यता प्रदर्शित करती;अवचेतन से साक्षात् करती,मानो सांसारिकता से सुदूरकिसी निभृत निलय में […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (लेखक/कवि, पत्रकार {हिन्दुस्तान} एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ )- गुरु पितु मातु प्रणाम तुम्हें, तुम बिन कौन हमारा है | बतियाने वाले बहुत दोस्त, संकट में कौन सहारा है || हे स्वर्ग के वासी […]
दिवाकर दत्त त्रिपाठी- होरी का गोदान कभी क्या हो पायेगा ? पाँच पाँच करके हैं बीते साल कई ।चोर उचक्के हुयें हैं मालामाल कई ।खादी पहन के कइयों देश को लूट रहेखादी बुनने वालें हैं […]
पिण्टू कुमार पाल- सोच रहा हूंँ एक गीत लिखूं, मेरे मन का मीत लिखूं, या तेरे मन की प्रीति लिखूं, प्रकृति का सौन्दर्य लिखूं, या विधवा के मन की व्यथा लिखूं, कहाँ हैं आप ? […]
आकांक्षा मिश्रा- तुम्हें….!!कभी-कभी चिठ्ठियाँ लिखाकरुँगी । चिठ्ठियाँ तुम्हारे नाम की पता मेरे घर का ही होगापढ़कर खुश तुम होना कुशल मेरे परिजन का ही होगा ।सिहर जायेगा हृदय…….ये जानकर , तुम्हारे द्वार परदिया आज भी जलता […]
आकांक्षा मिश्रा- बात कुछ अटपटा सा लगा होगालेकिन बात शुरू हुई,कहा हैं आप ? शायद मन झल्ला गया होगानिःसन्देह दोनों ही !आखिर ढाई शब्द के प्रश्न का उत्तर मिलाक्यों ? आशीर्वाद की अभिलाषा मौन एक […]
इश्क़ की रातेंऔर इश्क़ की बातेंअक्सर महँगी पड़ती है। ज्यादा समझदारी औरलगी हुई इश्क़ बीमारीअक्सर महँगी पड़ती है। गैरों के साथ यारी औरअपनों के साथ गद्दारीअक्सर महंगी पड़ती है। जरूरत से ज्यादा समझदारीऔर गैरों से […]
राश दादा राश (दार्शनिक/साहित्यकार)- जमीं से उठता वो ;जो आसमाँ नजर आता है ये सही नहीं वो आशियाँ बनाता है बलुआई रेत के संशय सुखद लुभाए ,, ,, मृगमरीचिका जो टूटे धैर्य का बन्धन करूँ […]
डॉ. आकांक्षा मिश्रा- एक स्त्री आधी से ज्यादा दूरी अकेले तय करती हैं , तुम्हारे सारे अधिकारों को कर्तव्य मानकर सफर जारी करती हुई तुम्हें मुक्त कर देती हैं मुड़कर मत देखो , अधूरी रहेगी […]
राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ – जलियांवाला बाग
★आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राम!तुम पैदा क्यों हुए?तुम तो क्रय-विक्रय के लिएमात्र एक वस्तु-सदृश हो चुके हो।तुम एक ऐसा विज्ञापन हो,जिसे सीने पर साटकर उन्मादी भीड़हिंसा का जुलूस निकाल रही है।तुम्हारे नाम के रहस्य से […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ –लखनऊ-हरदोई राजमार्ग, टावर प्लाट, सुन्नी, हरदोई (उ॰प्र॰) युवा साथियों जोश मे आओ, अपने देश की शान को | विश्व गुरु भारत भूमि के, मिलके बढ़ाओ मान को || केवल अपने तक सीमित रहना, […]
जीवन बहुत छोटा है,इसे खुशी से बिताओ।क्रोध बहुत खराब है,उसे हमेशा दबाकर रखो।आंखें बहुत नशीली है,इन से आंसू मत बहाओ।होंठ बहुत खूबसूरत हैं,इनकी मुस्कुराते हुए शान बढ़ाओ।दिल में बहुत कुछ छुपाया है,इसे छुपाओ नहीं जताओ।मन […]
दास्तां चलती रहीएक तरफ ,थोड़ी सी नादानियां भरीएक तरफ सब्र का तालीमएक तरफ हुक्म की पेशकसीथोड़ी रहमतें भी होदिलों में रंजिशें न बचेथोड़ी अदायगी रहे । आकांक्षा मिश्रा, गोण्डा
सब यही सुना कर कहते हैं,मैं एक गधा आवारा हूँ।मानवता जिनमें होती है,बस उसी प्यार का मारा हूँ।। सबकी अपनी दुनिया होती,मैं भी अपने में जीता हूँ।ढोता हूँ जग का भार,और कटुताओं को चुप पीता […]
हे ऋद्धि सिद्धि के ममदातातुमही हो मेरे भाग्य विधातापूर्ण करो प्रभुजी सब काजाॐ गं गं गं गणपति-गणेशाभक्त तेरा, पड़ा घने-क्लेशातुम्हीं आन दूर करो द्वेषाॐ कं कं कं कालिके-नंदनकरूं गौरी – सुत स्नेह वंदनभरो ह्रदय मेरे […]
जग की पीड़ा ,पीड़ा में तुमको पायाइस दुनिया की लय मेंसब कुछ खोकरयादों की छुई मुई सी धूप बनबिखर रही जग में प्रांतर के कोने मेंछाया की सुखद रूप मेंकल तुमको पाया ,आजतुम्हारी यादों कोइस […]
रक्षा करो माँ जगदंबे कालीरक्षा करो माँ जगदंबे काली…… तुम हो दुर्गा तुम ही कालीकरती हो तुम अपने बल सेसारे जगत की रखवालीमेरी भी रक्षा करो माँ जगदंबे काली।रक्षा करो माँ जगदंबे काली…… तुम हो […]
★ बिम्ब-विधान और प्रतीक-योजना का अनुशीलन करें। ★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आजमहुआटपकना भूल-सा गया है।फुनगी पर बैठी गौरैयाचहकना भूल-सी गयी है।तितलीपंखों को सिमटायेसशंक नेत्रों सेकुछ ढूँढ़-सी रही है।कोटर से झाँकता उल्लूबूढ़े अजगर की पीठ […]
डॉ.अन्नपूर्णा सिसोदिया ‘अमन’- विद्यालय जाते समय आजकल सड़क के दोनों ओर सजे खेतों में गेहूं की बालियों की स्वर्ण लहरियों का मनमोहक दृश्य देख उपजे भाव..धन्यवाद प्रकृति इतना देने के लिए – फागुनी बयार के […]
मैं कब हारामैं कब जीतामुझे इससे कोई फर्क नहीं। कौन अपनाकौन परायामुझे इससे कोई फर्क नहीं। मैं क्यों रोयामैं क्यों हंसामुझे इससे कोई फर्क नहीं। कौन मेराकौन तेरामुझे इससे कोई फर्क नहीं। क्या खोयाक्या पायामुझे […]
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ताल कितना मिला रहा, छटक रहा हर राग।मिलता उत्तर भी नहीं, खेलूँ कैसे फाग।।देवर-भाभी में कहाँ, भला दिखे अनुराग।बाहर-बाहर प्रेम है, भीतर-भीतर आग।।रस्सी लेकर सब जुटे, बढ़ा-बढ़ाकर बैर।आँखें मन की बन्द […]
होली का त्योहार है आया,खुशियों की बौछार है लाया।फागुन मास आता है ,रंगों का त्योहार लाता है।रंग बिरंगे गुलाल उड़ाए,हर चेहरे पर रंग लगाए।प्यार के रंग से भरी पिचकारी ,एक दूसरे पर बच्चों ने मारी।होलिका […]
बदसूरत थी,खूबसूरत न थी।सड़ गए थे पंचतंत्र जैसे,बदबू आ रही थी शरीर से।न जाने उन दरिंदों को,खुशबू लगी किस तंत्र की।लोग जिनसे डरते हैं, पूजते हैं,ब्रह्मबाबा, डीह बाबा, शहीद बाबा के पास।घने जंगलों में, पटरियों […]
Don’t consider daughter as a burdenDaughters are the basis of life.Daughters are the pride of every home,Respect them from the heart.To eradicate infanticide,Girls have to be given the right to live.It’s one’s destiny to have […]
तेरी महफ़िल में शोर कहाँ ?मेरे सिवातेरा कोई यहाँ और कहाँ?लोग कहते हैंतुम हर लफ़्ज़ कोपकड़ लेते हो।फिर तुम्हारी जिंदगी मेंमोहब्बत के पन्नों परइश्क की दास्तां कहाँ?लोग कहते हैंहर आशिक तेरा यहाँ।फिर तेरे चाहने वालों […]
जीवन के सिन्धु सेतु पर दिखा कई देशों का पहरा। जहाँ, बह गई निजता, मनुष्यता सदा एक सानिध्य की चेष्टा। असंख्य आकांक्षाओं से निकली जीवन की एक सुंदर रेखा। हमने जिसको देखा भावशून्य न ही […]
एहसास करो जरा मेरी कमी ,थोड़ी सी तो महसूस करोगे।एहसास करो जरा मेरी बातें,थोड़ी सी तो याद करोगे।एहसास करो जरा मेरा प्यार,थोड़ा सा तो पछताओगे । एहसास करो जरा मेरी मोहब्बत ,थोड़ी सी तो समझ […]
शिवाजी पटेल, कुरसठ जन्म लेकर जैसे ही इस दुनिया में आता है। माँ-बाप का वह राजा बेटा कहलाता है। दिन पर दिन वह प्यार से बड़ा होता जाता है। बाप के कंधे पर हर जगह […]
बेटी को मत समझो भार,बेटियां हैं जिंदगी का आधार।बेटियां हैं हर घर की शान,दिल से करो उनका सम्मान।भ्रूण हत्या को मिटाना है,बेटियों को जीने का हक दिलाना है।बेटा होना किसी का भाग्य है ,बेटी होना […]
East or West,Bose sir is the best,North or South,Manoj sir is so couth. Up or down,He is BEOS’crown,Left or Right,He is so bright. Sky or the earth,His action spreadth,To the lazy or advance,He gives another […]
मुस्कुराहट की वजह बनोक्यों दर्द की वजह बनते हो ?मोहब्बत की वजह बनोक्यों नफरत की वजह बनते हो ?जीने की वजह बनोक्यों मृत्यु की वजह बनते हो ?निभाने की वजह बनोक्यों बिखरने की वजह बनते […]
शब्द पास मेरेकोई शोर नहींप्रारब्ध मेरा येरौशनी दीये कीपहाड़ की चोटी परअंधेरा छंट न सकासच्चाई है येदिखाई जरूर दूंगाप्रारब्ध मेरा ये lखून के स्याह धब्बेदिखा न सकामैं हर किसी कामेरा कोई न हुआजाहिल गँवार मैंदुनियाँ […]
मोहब्बत मरी नहींबेवफाई का शिकार हो गईशिद्दत से निभाने वाले आज भी हैं।यह दुनिया खाली नहींमुफ्त में खिलाने वालों सेसिंह आज भी जिंदा है।थोड़ी सेवा कर गरीबों कीफोटो खिंचवामदद करना एक रिवायत हो गईप्रभु दूर […]
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अँखिया के कजरा हेराइ गइले सजनी,हाथवा के मेहँदी खियाइ गइले सजनी।अजोरिया मे लौके हर ओरिया अन्हरिया,एहि घरवा दियवा बुताइ गइले सजनी।जोहत रहि गइनी चनरमा के चननिया,एही तरी अँखिया सुखाइ गइले […]
हे ! वाग्वादिनी माँहे ! वाग्वादिनी माँतू हमें ज्ञान देंतू हमें ध्यान दें।भटक रहें हमजीवन पथ परआकर हमें तू अब थाम लें।तू ब्राम्ह की मायातू ही महामायाहम फंसे मोहजालआकर हमें तू अब निकाल लें।तू ज्ञान […]
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–नेता आतंकी बने, बाँट रहे हैं देश।बोल विषैले बोलते, नक़्ली दिखता वेश।।दो–नेता इनको मत कहो, करते हैं व्यापार।मानवता को खा रहे, दिखें धरा पर भार।।तीन–घृणित कृत्य से युक्त हैं, दुर्गुण […]
कोरोना की महामारी है आई,हर जगह हलचल है मचाई।स्कूल कॉलेज बंद करवाएं,बच्चे ऑनलाइन क्लास लगवाएं ।कई लोगों ने अपनी जान गवाई,कोरोना से बचने की रखो तैयारी।तीसरी लहर है आई ,छोटे बच्चों पर पड़ी है भारी।सबको […]
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बनता-मिटता चित्र यहाँ, जीवन बन अभिशाप।मीठे फल सब चख रहे, बनकर के निष्पाप।।दो–भाँति-भाँति-जन हैं यहाँ, चतुर-चोर-चालाक।वाणी कोयल कूकती, दिखते मन से काक।।तीन–मन से दिखते दीन हैं, तन से सुन्दर अंग।चीर […]