दिल का दर्द बयां करने को अगर मुझे अल्फाज न मिलते

January 17, 2018 0

सत्याधार ‘सत्या’ पल प्रति पल लाचारी होती , जीना भी दूभर हो जाता , दिल का दर्द बयां करने को अगर मुझे अल्फाज न मिलते। उसने इस लायक भी मुझको समझा कभी नहीं जीवन में […]

जी हाँ, मैं प्यार बेचता हूँ

January 17, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आइए जनाब! मैं प्यार बेचता हूँ। किसिम-किसिम का प्यार तरह-तरह का प्यार भाँति-भाँति का प्यार नाना प्रकार का प्यार विविध प्रकार का प्यार। आप प्यार, आम प्यार, ख़ास प्यार मर्दाना प्यार, जनाना […]

मैं कहता त्यौहार है खिचड़ी

January 16, 2018 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद चहुँओर मची है होड़ा – होड़ी, कहीं गुरुपर्व कहीं पे लोहड़ी! कहीं बिहू है,है कहीं पे पोंगल, मैं कहता त्यौहार है खिचड़ी ! कहीं स्नान,तो कहीं होता दान, हमारी संस्कृति है बड़ी […]

मैं उस वतन का चराग़ हूँ, चलती जहाँ अब गोलियाँ

January 14, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मैं उस वतन का चराग़ हूँ, जहाँ आँधियाँ-आँधियाँ। चीर-हरण होता हर प्रहर, चलती जहाँ अब गोलियाँ। विस्थापित शराफ़त हो रही, नंगों की दिखतीं टोलियाँ। कार्पोरेट का डंका बज रहा, फैली हैं सबकी […]

हाँ, साहेब! यही चुनाव है

January 12, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- साहेब! यही चुनाव है। चुनावी मौसम है, दलदल में अब पाँव हैं। हवा का रुख़ नामालूम, दो नावों में पाँव हैं।। साहेब! यही चुनाव है। हत्यारे, बलात्कारी, व्यभिचारी चहुँ ओर, धर्म, जाति, […]

रूठो, जीभर रूठो, मनाऊँगा नहीं

January 12, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय –  रूठो, जीभर रूठो, मनाऊँगा नहीं, रोओ, जीभर रोओ, हँसाऊँगा नहीं। दोनेभर जलेबी लिये दूर क्यों खड़े? पास आ जाओ, फुसलाऊँगा नहीं। ज़ख़्म बूढ़े देखते, तुम जवान हो गये, घबराओ मत, तुमसे […]

ग़ज़ल : उन्हें फ़िक्र क्यों रही ?

January 10, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – हम रहगुज़र हैं अपने, उन्हें फ़िक्र क्यों रही, मंज़िल बनी है अपनी, उन्हें फ़िक्र क्यों रही ? घर-बार अपना छोड़कर, वीराने में आ गये, रिश्तों की दुहाई की, उन्हें फ़िक्र क्यों […]

ग़ज़ल – ऐ मेरे ज़मीर! उठ

January 8, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बरबादी लाने को बैठा, देश में शैतान है, इन्सां क्या, भगवान् भी, हरदम परेशान है। नीति कुछ, नीयत कुछ, कर्त्तव्य भी अलग, उसकी ही दुनिया में, शौकत और शान है। सबक़ सिखायें […]

ज़माने की रीति कितनी निराली है प्यारे

January 7, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : वह सच बोलता भी है, इसका यक़ीं नहीं होता, झूठ तो उसके ख़ून के हर बूँद से टपकता है। दो : वह नाचीज़ अपनी नाज़्नीन पे नाज़ है करता, यह […]

ज़रा साज़ छेड़ो, तराने उठेंगे,

January 5, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ज़रा साज़ छेड़ो, तराने उठेंगे, शम्अ जलाओ, परवाने बढ़ेंगे। चिलमन को मत उठाओ अभी, बहुत सारे दुश्मन, पुराने मिलेंगे। मन को दबा, यों बैठे हो क्यों? अभी दिल जवाँ है, दीवाने मिलेंगे। […]

भारत की अर्थी

January 3, 2018 0

आशीष सागर- कलम तोड़ने वाले अक्सर किरदार यहाँ बिक जाते है , खबर के अगले दिन ही रद्दी में अख़बार यहाँ बिक जाते हैं । ब्यूरोक्रेसी की क्या बात करे अब तमाशबीन है जनता भी, […]

महाविद्यालय के ”कवि सम्मेलन” में बही काव्य रसधारा

January 2, 2018 0

शिव यादव (बिलग्राम)-              हरदोई- श्री ठाकुर जी महाराज स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हेरवल (मल्लावां) के रजत जयंती वर्ष और महामना मदन मोहन मालवीय जयंती के उपलक्ष्य में महाविद्यालय सभागार में ” […]

एक कवि का दृष्टिबोध

January 2, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- पसीने से हो तर-ब-तर, हवा चलती रही बेक़द्र। सूरज मद्धिम हो रहा, दीये-बाती-सा जलकर। गुस्ताख़ियाँ बूढ़ी हो रहीं, साल का ख़त्म एक सफ़र। आगाज़ अंजाम से यों बोला, ”तूने बरपाये बहुत क़ह्र। […]

अतीत होते मेरे सहयात्री!

January 1, 2018 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- अपने बलिष्ठ कन्धों पर तीन सौ पैंसठ दिनों के भार पल-पल लाद कर अनवरत-अनथक यात्रा करते-करते अतीतोन्मुख सहयात्री! तुम क्लान्त हो चुके हो। अब तुम्हें चिर-निद्रा की ओर बढ़ना है तुम्हारे जीवन […]

चेतावनी के स्वर

December 30, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राख में सुगबुगाहट है, जगाओ मत, ख़ाक हो जाओगे, पास आओ मत। मेरे मौन को ‘मौन’ मत समझ लेना, कितने ‘गिरे’ हो, ज़बाँ खुलवाओ मत। तुम्हारे सलीक़े की गणित हमने पढ़ ली […]

बालगीत : चारों तरफ है घना कुहासा, सूरज की किरणें अलसाईं

December 28, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद किट किट करती ठण्ढी आई सबको याद रजाई आई । झर झर झर झर हवा बह रही , जगह जगह अलाव जलाई। ओस की बूँदें हैं मुसकाई, सर्दी से कलियाँ मुरझाईं। चारों […]

भींनी-भींनी बदरिया छाई मोरी नगरी

December 26, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-  भींनी -भींनी बदरिया छाई मोरी नगरी। टूटी – फ़ूटी अटरिया की मोरी बखरी।। करम करता हूँ भाग्य फिर भी स्थिर बना, मेरे जीवन में छाया कुहासा घना। मेरी मासूमियत है बिखर सी […]

दसों दिशाओं में हो मातम, अब घर – घर में गद्दार के

December 26, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’- प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24 अब तो धर्मशत्रु पहचानो, भारत कहे पुकार के । सत्ता के लालच में तुम क्यों, चरणों में हो गद्दार के ॥ कब तक छद्म देश भक्ति, भारत […]

सब बातों को छोड़कर

December 26, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा – ______________________________ दिसम्बर की सर्दी रजाई में दुबके हुए इंसान मायूस से आये नजर कभी भोर में चलते उस महिला को देखते , इधर के दिनों सातवां महीना चल रहा है एक साथ […]

बातें- जज्बे

December 20, 2017 0

डाॅ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय- 0 उनके दर पे पहुँच कर भी, पहुँच न सका, नज़रें यों झुकीं, हम सलाम कह न पाये। 0 रंजो-ग़म भूलकर, हम ज्यों गले मिले, ख़ंजर जिगर के पार, मिलते रहे गले। […]

एक अभिव्यक्ति—-

December 17, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- कविता मेरी ठिठुर रही है, निष्ठुर ठण्डी आहों से। डरता हूँ वो बिछुड़ न जाए, प्रेम भरी इन राहों से।। घुटन नहीं ये प्रेम है मेरा, जानो कितना विवश हूँ मैं, जैसे […]

हायकु : मद्यपान

December 17, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद मधुशाला में जा के हाला पिये जगहँसाई व्याकुल प्रिय घर भूत का डेरा रूठा जीवन यकृत नष्ट दृग छाया अँधेरा सब बेकार देशी-विदेशी जीवन शत्रु हमीं अधरप्रिया जीवनशैली हर आयुवर्ग में फैला […]

उत्तरदायी

December 9, 2017 0

आकांक्षा मिश्रा–  इन विगत वर्षों में अनगिनत सवालों ने बहुत परेशान तुम्हे परेशानिया उठाई नही कुटिल मुस्कान नई चालें चल रही थी अगले दिन के लिए मुग्धा अनायाश भटक रही थी ओट में चाहों में […]

एक बेग़ाने के नाम पत्र

December 7, 2017 0

आकांक्षा मिश्र- पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ तुम व्यवस्थित जीवन जीने के लिए घर का नक्शा बदल रहे हो । साथ ही जीने का सलीका भी । अच्छा है गतिमान जिंदगी के कई […]

किसने क्या कहा?

December 6, 2017 0

 डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जब मैं जीवन का मूल अस्तित्व तलाश करने लगा तब हृदय ने अतिवादी कहा | जब मन को मन में पैठाने लगा तब शरीर ने उत्पाती कहा जब विचार का विचार से […]

हिन्द की एकता

December 5, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- शंख और अजान से होती है भोर मेरे भारत की, ये बात है हमारे अटल विश्वास और आदत की। हिन्द की शान में हम एक ही हैं जान लो ‘जगन’ बात है […]

भूल जाओगे हमें यह पाप है

December 4, 2017 0

पवन कश्यप (युवा गीतकार, हरदोई)- यदि नयन रोते रहे संताप होगा। भूल जाओगे हमें यह पाप होगा।। हरि से हरि नारद बने थे, प्रेम मे बस वह सने थे। शब्दों के फेरो में फसकर, मायूसी […]

सूरज की किरणें

November 30, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद, मो०- ९६७००१००१७ अरुणोदय हो गया शिखर में, किरणों से सुरभित हो गई धरा। पशु-पक्षी भी हो गए प्रफुल्लित, धरती का दामन है हरा – भरा। कलियां पुष्पित होकर मुसकाईं, चञ्चरीक ने किया […]

एक अभिव्यक्ति

November 28, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- तुम्हारी पूर्णता भाती नहीं मुझे क्योंकि तुम मुझसे द्रुत गति में दूर हो रहे हो। हाँ, मैं अपूर्ण हूँ। तुम मुग्ध हो, अपनी पूर्णता पर और मैं गर्वित हूँ, अपनी अपूर्णता पर […]

ग़ज़ल- अन्धों का शहर है यहाँ जागते रहो

November 28, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद हर आँख है उनींदी सी आँकते रहो। अन्धों का शहर है यहाँ जागते रहो।। आँखों में है मुहब्बत या है नुमाईश, हर पल निगाहें उनकी भाँपते रहो। कैसा है दस्तूर और कैसा […]

हाइकु : मिट्टी

November 27, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- * १* मैं ही मिट्टी हूँ! धरा की चहक हूँ! सुरभित हूँ! *२* चाक की शान हूँ! सोंधी सी महक हूँ! मैं तिलक हूँ! *३* मैं करीब हूँ! मौत में नसीब हूँ! […]

जीव एवं प्रकृति

November 24, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद बाग़ किनारे खेत है मेरा, बाग़ में है खगवृन्दों का डेरा। विविध रूप और रंग -बिरंगी , संग में लातीं अपनी साथी संगी। तरह-तरह के हैं ये गाना गाती, हर मन को […]

दृगबन्धों न नीर बहे

November 23, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद कविते!तेरे दृगबन्धों से न नीर बहे, मणिबन्धों से मिलकर ये पीर कहे। मेरा हृदय तेरा हृदय संश्लिष्ट होकर, क्यों दुनिया भर के ये तीर सहें । कविते!तेरे दृगबन्धों……………. अद्भुत है तुझमें यूँ […]

तलाश…..

November 23, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मेरे दोस्त! मुझे तलाश है तुम्हारे  मेरा न होकर भी कुछ होने का | हर तलाश मुझे झुठला देती है; स्वाभिमान को गिरवी रख गले में विवशता की घण्टी लटका बहलाती रहती […]

इतिहास बीमार है—

November 22, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय   इतिहास के फड़फड़ाते पृष्ठ कर रहे हैं, असामयिक मौत का इन्तिज़ार  और बदलता युग, वार्धक्य का एहसास करते हुए समय के चरमराते पलंग पर खाँसता है। इंसान बूढ़े होते इतिहास की […]

 कब तक

November 21, 2017 0

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- कल भी मरी थी कल भी मरेगी । आखिर वो कितनी बार जलेगी । पहले तो तन को भेड़िया बन नोच डाला । शरीर से आत्मा तक जगह-जगह छेद डाला । लाश […]

मेरा भारत सुन्दर भारत

November 19, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- देश हमारा सन्त सरीखा मुकुट हिमालय है जिसका । कटि में बनी मेखला गङ्गा सागर पग धोता है जिसका।। धन्य है भारत भूमि सखे!  धन्य है इसकी अतुल कान्ति। इस मिट्टी के […]

दिल की धड़कन मिली और दिल भा गया : पवन कश्यप (हरदोई)

November 15, 2017 0

मुद्दतों से जिसे खोजता मैं रहा, स्वप्न मे था अभी तक वो दिन आ गया । तुमसे मिलकर लगा मिल गया ये जहाँ, दिल की धड़कन मिली और दिल भा गया । तुमने देखा मुझे […]

गीत : प्रिय न जाओ अभी चांदनी रात है

November 15, 2017 0

आदित्य त्रिपाठी “यादवेन्द्र”- नैन की नैन से हो रही बात है । प्रिय न जाओ अभी चांदनी रात है ॥ बावरी हूँ विरह में तुम्हारे पिया । आपके प्यार की मैं दुखारी पिया । आस […]

कविता : अन्तर्मन

November 14, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- जीवन हो इतना दीप्ति प्रखर, चढ़ जाओ तुम उन्मुक्त शिखर। मन में न हो कोई आवेश कभी, बन जाओ हृदय के मुख्य प्रहर।। सरल हृदय के हो तुम स्वामी, मेरे मन मन्दिर […]

कविता : उन्हें मालूम है

November 14, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- होठों से मुसकान उतरी कब-कैसे, उन्हें मालूम है, चेहरे पे कालिख़ पुती कब-कैसे, उन्हें मालूम है | चाहत शर्मिन्दा बन गयी और वे तमाशाई रहे, तिनका-मानिन्द ख़्वाब बिखरा कैसे, उन्हें मालूम है […]

गाँव और प्रकृति

November 13, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- गाँव हमारे है बड़ा निराले, जैसे धरती अमृत के प्याले। प्रेम जहाँ बसता है पग -२ में, कभी न पड़ते स्नेह में छाले।।१।। धरती बिछौना गगन है चादर, एक -दूजे का हृदय […]

हिन्दी माता

November 12, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- हिन्दी माता की सेवा में, निज भाव समर्पित करता हूँ । अपना सौन्दर्य बढ़ाता हूँ, माता के ही नित गुण गाता हूँ। श्रृंगार,करुण औ हास्य संग, शब्द प्रसून नित अर्पित करता हूँ।। […]

माँ की ममता 

November 10, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-           कहीं लग न जाए मेरे कलेजे के टुकड़े को ठण्ड, यह सोच माँ के कलेजे में बर्फ सी जम जाती है। धूप से न झुलस जाए मेरे मासूम […]

हे! मातृशक्ति है नमन तुम्हें

November 7, 2017 0

 जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद (उ०प्र०) हे! मातृशक्ति है नमन तुम्हें, ये मेरा जीवन है दान तुम्हारा। है शत् शत् वन्दन मातु तुम्हें, स्नेह,कान्ति और मान तुम्हारा। हे!सहनशक्ति की प्रतिमूर्ति मातु, अद्भुत शक्ति सम्मान हमारा। जीवनदर्शन की […]

वर्णभेद

November 6, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद वर्ण भेद का रोना रोने वालों, नित निज दृग नीर दिखने वालों। भूल गए उन पिछले दिन को, निज सम का हक़ खाने वालों । माना कुछ दिन थे दुर्दिन के, क्या […]

भाव, वर्ण के समन्वय से, मैं शब्द नए पिरोता हूँ

November 3, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- वर्ण की अँधेरी खोह में , नित भाव प्रसून उगाता हूँ। भाव, वर्ण के समन्वय से, मैं शब्द नए पिरोता हूँ ।। शब्द जोड़ जोड़कर , कविता रसधार बहाता हूँ। हिन्दी माता […]

माननीय और आम आदमी

November 2, 2017 0

आरती जायसवाल (कवयित्री एवं लेखिका) माननीय जब शहर में आते हैं रास्ते साफ हो जाते हैं कूड़े -करकट के साथ -साथ आम आदमियों को हटाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है पुलिस बल चौकन्ना हो जाता […]

एक अभिव्यक्ति : निगाहों को गुनहगार हो जाने दो

November 1, 2017 0

— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- निगाहों को गुनहगार हो जाने दो, होठों को गुलरुख़सार* हो जाने दो। * गुलाबफूल-जैसे पतझर का ज़ख़्म अब भी ताज़ा है, कैसे कहूँ, मौसमे बहार हो जाने दो। नज़रें बात बना […]

शब्द काव्याधार : कागज़ पे अंकुर हो ही जाएगा

October 31, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद शब्द बीज है काव्य सर्जन का, कागज़ पे अंकुर हो ही जाएगा। भाषा का मस्तक तिलक बनके, संस्कृति उजाला कर ही जाएगा। कहीं पे ये सदा उन्मुक्त दिखता है , तो कहीं […]

एक अभिव्यक्ति : धर्म से हैं शून्य, पर ज्ञान बाँटते, खिंची हिन्दू-मुसलिम दीवार देखिए

October 29, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- डोली ‘हिन्दुत्व’ और ‘विकास’ की उठी, ‘न्यू इण्डिया’ के लुटेरे कहार देखिए। देशहित दूर अब स्वहित पास-पास, सौ डिग्री चुनावी बुख़ार देखिए। धर्म से हैं शून्य, पर ज्ञान बाँटते, खिंची हिन्दू-मुसलिम दीवार […]

जो पिछड़े हैं वो नहीं जान पाये कि क्या है आरक्षण ?

October 29, 2017 0

डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी सिंहों की खातिर पिंजड़े है , श्वानों को सिंहासन मिलता । मिल रहे कैक्टस को गमले, कीचड़ के बीच कमल खिलता । होते अयोग्य हर दिन पदस्थ , मेधावी भटक रहे […]

कोइली की बेटी

October 29, 2017 0

अमित धर्मसिंह कोइली की बेटी बहुत जिद्दी थी। गरीब थी, बीमार थी और भूखी भी, फिर भी जी गयी कई दिन। क्योंकि वह जीना चाहती थी इसलिये माँग रही थी भात, वही भात जिसे तुम्हारी […]

जिन्हें रौशनी से डर था वो भी मुस्कुराने लगे

October 29, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद अँधेरा ग़र बढ़ा तो जुगनूं टिमटिमाने लगे, जिन्हें रौशनी से डर था वो भी मुस्कुराने लगे। एक मुक़म्मल दिया को न जलता देख कर, लोग जुगनूं की हैसियत को आजमाने लगे। फ़िक्र […]

अनुभूति के गह्वर में

October 28, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय क्लान्त-विश्रान्त एकाकी पथिक के कर्ण-कुहरों में अनुगूँजित स्वर-माधुर्य उसे साथ ले निसर्ग-पथ पर गतिमान् है | मोक्ष की अभीप्सा में इहलोक-परलोक की अन्तर्यात्रा गन्तव्य की अवधारणा के साथ संपृक्त होती संलक्षित हो […]

माँ गंगा

October 28, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद ऋतु काव्य जहाँ रिसता रहता , यह वह पावन संगम घाटी माँ। नमन तुम्हे हे! माँ गंगे, अविरल जिसकी परिपाटी माँ।।१।। हम कैसी तेरी संतान हैं माँ, कलुषित कर दी है छाती माँ। कैसे […]

शातिर राजनीति की बहार देखिए

October 27, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय डोली ‘हिन्दुत्व’ और ‘विकास’ की उठी, ‘न्यू इण्डिया’ के लुटेरे कहार देखिए। देशहित दूर अब स्वहित पास-पास, सौ डिग्री चुनावी बुख़ार देखिए। धर्म से हैं शून्य, पर ज्ञान बाँटते, खिंची हिन्दू-मुसलिम दीवार […]

जब जीवन ज्योतिर्मय हो जाए

October 25, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद जब जीवन ज्योतिर्मय हो जाए, मम हृदय समर्पित हो जाए। इस कोलाहल से मिले शान्ति नाथ! निज मार्ग प्रवर्तित हो जाए।।१।। सत्य सदा मम उद्गार बने, जीवन में न असत्य की रार […]

यादें मीत की

October 23, 2017 0

राहुल पाण्डेय ‘अविचल’- लेशमात्र भी खुशियाँ नहीं हृदय में मेरे हैं दीपों के इस पर्व से मुझको तनिक भी प्यार नहीँ ; मीत हमारा साथ छोड़ क्यों चला गया ? कैसे बताऊँ किस तरह जिया […]

चलो मनाएं भैया दूज

October 23, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- चलो  सब  मिल  मनाएं  भैया  दूज, देवि  समान  सभी  बहन  को  पूज! भाई  बहन  का  है  रिश्ता  अनूठा , भैया  अब  मत  बहना  पर  खीझ!! चलो…………………………………..।।१।। आज  के  दिन  बहना  घर  जाना, […]

ज़िन्दगी मेरी चाहत की मोहताज़ है

October 21, 2017 0

सौरभ कुमार पटेल (संगीतकार)- मैं तुझे शाम को रोज़ मिलता रहूँ, तू मुझे शाम को रोज़ मिलती रहे। ज़िन्दगी मेरी चाहत की मोहताज़ है, तेरी चाहत मुझे रोज़ मिलती रहे।। फूल खिलते रहें खुशबू आती […]

हे गजानन आपको, विनती मेरी स्वीकार हो

October 20, 2017 0

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (पत्रकार-लेखक) हे गजानन आपको, विनती मेरी स्वीकार हो । संग में हो कुबेर जी, लक्ष्मी कृपा भरमार हो । गुरूजी सत्मार्ग प्रणेता, मातु-पितु वरद हस्त हो । इतना सब मिल जाये तो […]

दीपावली की स्निग्धिता में, नव दीप फिर से जल उठे

October 20, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- दीपावली की स्निग्धिता में, नव दीप फिर से जल उठे। आशा और विश्वास के , नव पुष्प फिर से खिल उठे।। चहुँओर ओर हैं दुश्वारियाँ, जीवन में हैं कठिनाइयाँ। अंधकार और प्रकाश […]

भला क्यों?

October 20, 2017 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हे ईश्वर ! सचमुच, हम कितने चतुर मूर्ख हैं | मतभेद से मनभेद तक की यात्रा यों ही समाप्त नहीं हो जाती; मन-मस्तिष्क उद्वेलित कर देते हैं रक्त-शिराओं को | मस्तिष्क के […]

देख मनुज मैं तो पौधा हूँ

October 14, 2017 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- देख मनुज मैं तो पौधा हूँ, आज मैं फिर से औंधा हूँ। तूने काटा मेरे रग- रग को, तेरे लिए मैं केवल धंधा हूँ।। तूने तो मेरा तन लूट लिया, मेरे मन […]

1 11 12 13