हम तो काँटा हैं मोहब्बत का छला क्या करते ?
जगन्नाथ शुक्ल…✍(प्रयागराज) हम तो काँटा हैं मोहब्बत का छला क्या करते? गुल ही नादाँ है भँवरे से गिला क्या करते?हम तो हर हाल में शाखों से जुड़े रहते हैं; दिल के तूफ़ाँ में मुला क्या […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍(प्रयागराज) हम तो काँटा हैं मोहब्बत का छला क्या करते? गुल ही नादाँ है भँवरे से गिला क्या करते?हम तो हर हाल में शाखों से जुड़े रहते हैं; दिल के तूफ़ाँ में मुला क्या […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- ज़िन्दगी में अर्थ की परिव्याप्ति सुरसुरी-सी लगने लगी है। देह की खुरचन सायास-अनायास केंचुल की भाँति उतरती आ रही है। कालखण्ड स्थितप्रज्ञ की भूमिका में अनासक्त योगी-सदृश “एकोहम् सर्वेषाम्” को अभिमन्त्रित कर […]
●आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का पुण्यतिथि-समारोह सम्पन्न “भाषा की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी एक विलक्षण साधक थे। वे सरल और सुबोध भाषा के पक्षधर थे। गूढ़ विषयों के निदर्शन में उनकी भाषा संयत और आचार्यत्व […]
कवयित्री:- दीपाली पांडेय” दीया” प्रकाशक:- साहित्य संगम संस्थान प्रकाशन इंदौर मध्यप्रदेश मूल्य :- 100/- पृष्ठ:- 40 समीक्षक:- *राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित’* ( राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी) एक दिया उम्मीद का कृति के प्रबंध संपादक छन्दाचार्य आदरणीय शेलेन्द्र […]
जगन्नाथ शुक्ल..✍(प्रयागराज) जिनके चरणों की रज चन्दन वो दशरथनन्दन भटक रहे; नाममात्र लेकर जिनका खल सारा सुख-वैभव गटक रहे। बोझ नहीं सह सकती जनता वादों के हत्यारों की; झूठ- फ़रेब भरे कृत्यों से सौहार्द – प्रेम सब चटक रहे। […]
नीना अन्दोत्रा पठानिया- चलो उर्मी तैयार हो जाओ , मार्किट जाना है कुछ सामान लाने वाला है। ग़ज़लें सुन रही उर्मी को उसकी सास नीलम ने कहा । चलते है माँ बस एक लास्ट सुनने […]
आकांक्षा मिश्रा- यह हर्ष का मौसम है सुनकर तुम्हें अजीब लगेगा मौसम तो आते हैं और जाते हैं लेकिन हम रहते है मौसम में ही एक लंबे अंतराल के बाद तुम्हें देखती हूं तो लगता […]
शिवांकित तिवारी, युवा कवि,लेखक एवं प्रेरक, सतना (म.प्र.) माँ शब्द मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा गुमान है, माँ ही मेरी जिंदगी और माँ से ही मेरी पहचान है। अंधेरों से उजालों तक के इस सफर में, […]
जयति जैन ‘नूतन’ मतदान करने जा तो रहे हो पर इतना ध्यान धरना । साम दाम दंड भेद काम है शैतान का बस इससे ही तुम बचना । सौ सही मगर चार गलत हों काम […]
कवि राजेश पुरोहित काम क्रोध लोभ मोह के शत्रु। रात दिन महाभारत है करते।। मन के रणक्षेत्र के ये महारथी। कभी किसी से कम न पड़ते।। अपने अपने बाहुबल दिखाते। एक दूजे से झगड़ते- लड़ते।। […]
भवानीमंडी :- हिंदी के विकास और नए नए साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से गठित साहित्य संगम संस्थान, दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, अमीर खुसरो सभागार, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, मेट्रो गेट नंबर […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज) शब्द हूँ ;शान्त हूँ; मत समझ श्रान्त हूँ। वर्ण के भेद से वाक्य में क्लान्त हूँ।। वो तो श्रृंगार से थी मोहब्बत मुझे; ओज धारण करूँ या नहीं; भ्रान्त हूँ। थोड़ी बदली […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज) ०९६७००१००१७ ईश्वर आपस में नहीं झगड़ते इंसानों को मत लड़वाओ तुम। मन्दिर-मसज़िद बहुत हुआ अब बनवाओ रुग्णालय तुम।। असमय कलियाँ मुरझा जातीं, बिखरे शूलों के भय से। विदुर-नीति भी शरमा जातीं, कपटी […]
राग द्वेष लालच को हटाकर, अहंंकार को जड़ से मिटाकर, नई उमंग से उजियाला लाओ तुम। चहूँ दिशा में फैला है घनघोर अंधेरा, अब ले भी आओ नया सवेरा, जगमग मन के दीप जलाओ तुम […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद से प्रयागराज) बेमतलब के रिश्तों सङ्ग कितना रहते? अपमानों के गरल कण्ठ कितना सहते? सबने है मुझको बेग़ैरत-सा समझा; मैं ही था जो रिश्तों में था बैठा उलझा। बिन समझे मुझको उलझन […]
लेखिका:-जयति जैन “नूतन” प्रकाशक:-अन्तरा शब्द शक्ति प्रकाशन इंदौर, मध्यप्रदेश (मातृभाषा उन्नयन संस्थान के सौजन्य से प्रकाशित) पृष्ठ:-32 मूल्य:-55/- समीक्षक:-राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित” देश की युवा लेखिका व सामाजिक चिंतक जयति जैन”नूतन” की प्रस्तुत करती राष्ट्र […]
रचनाकार:-कैलाश मंडलोई कदम्ब पृष्ठ:-19 प्रकाशक:- साहित्य संगम संस्थान समीक्षक:-राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित” प्रस्तुत पुस्तक साहित्य संगम रचनाकार विशेषांक के अंतर्गत रचनाकार कैलाश मंडलोई “कदम्ब” की रचनाओ का विशेष अंक है । कृति का मुखावरण आकर्षक […]
बृजेश पाण्डेय ‘बृजकिशोर’ जगमग जगमग ज्योति जली है। दीवाली की धूम मची है।। दीपोत्सव की रजनी आयी। दीपों की माला बुन लायी।। घर में मंगल मूर्ति विराजे। रिद्धि-सिद्धि भी संग सुसाजे।। लक्ष्मी – पूजन सभी […]
दीपक श्रीवास्तव “दीपू” आओ इस दीपावली हम कुछ खास करे । जलाकर चिराग रोशन जहाँ करे ।। मैया की मूरत हो , प्रण हम करे। न हो कोई मायूस कोशिश ये हम करे ।। आओ […]
राघवेन्द्र कुमार “राघव”- मृत्तिका निर्मित दिये से है अमावस काँपती । जलते हुए नन्हें दिये से डरकर निशा है भागती । दीपक देह की अभिव्यंजना से […]
आकांक्षा मिश्रा, गोंडा उत्तर- प्रदेश तेरे साथ सदा मेरा विरोध ,अब मुझे सहा जाता नहीं । दिन प्रतिदिन तूने मुझ पर ऋण का भार ,रहें बढ़ाते इस आभार भरे शब्दों से सदा सिमटी सी कोने […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : तन्त्र लोक का है कहाँ, चहूँ दिशा हैं चोर। मुँह काला हो रात में, चन्दन चमके भोर।। दो : तन पाप में ख़ूब रमा, पुण्य नहीं है पास। चेहरा है […]
जग का दुःख है रोया हमने, अपना दुखड़ा भूल गये। उस पथ के पथराही हैं हम; जिस पथ में नित शूल नये। सारा सावन आँखों में ही, रुक कर मानो सूख गया। इतने पर भी […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) बिन सोने की लङ्का का ग़र मैं रावण बन जाऊँ तो; क्या सम्भव है धराधाम से राम उठाने आएँगे? ख़ुद तम्बू में रह करके जो भक्तों से न रुष्ट हुये; आगे करके […]
जगन्नाथ शुक्ल..✍ (इलाहाबाद) तीरगी का कह्र नित बढ़ा जा रहा है। रोज़ जुम्ला नया इक गढा जा रहा है।। माना हलचल नहीं है शहर में तिरे; दूर कोई बवण्डर चला जा रहा है। नाम बदलना […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय डोली ‘हिन्दुत्व’ औ’ ‘विकास’ की उठी, ‘न्यू इण्डिया’ के लुटेरे ‘कहार’ देखिए! ‘अच्छे दिन’ की चिड़िया फुर्र हो गयी, सौ डिग्रीवाला चुनावी बुख़ार देखिए! धर्म से शून्य, पर ज्ञान बाँटने में दक्ष, […]
आदित्य कर्ण दरभंगा, बिहार (मिथलांचल) ऐ मौत तूने तो जमींदार बना दिया। जब ज़िंदा था तो घूमता था, दर-ओ-बदर, अब मर गया तो इतना बड़ा श्मशान दिला दिया। भटकते रहे उम्र भर, चैन-ओ-सुकून के लिए, […]
करवा चौथ व्रत की पूर्व सन्ध्या पर धर्मपत्नी को समर्पित सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ कीमौलिक रचना- प्रिय अर्धांगिनी क्या दे दूं, जो तुमको खुश कर पाऊँ मैं। जो करवा चौथ का ब्रत रखा, कैसे आभार जताऊँ […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) चौंक उठता हूँ मैं अक़्सर रातों में; ज़िस्म तड़पता मिलता , जज़्बातों में। मन में उठता गुबार परेशां करता; क्या से क्या हो गये बातों -बातों में? दिल तो कचोटता होगा तुम्हारा […]
शालू मिश्रा, युवा कवयित्री, नोहर (हनुमानगढ़) राजस्थान याचक बनकर तुमनें मुझे मांगा था मात पिता से, मन कर्म वचनो से मैने भी तुम्हारा साथ दिया। चूँङी बिदींया मेहदीं से करके सोलह श्रृंगार, प्यार भरी माँग को […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) निरा झूठ को सच बताया न जाये; काँच से पर्वत को डराया न जाये। ख़ुद के दामन का दाग़ धोने को ; दूसरों के अरमां डुबोया न जाये। हठ को उम्मीद का […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) ऋषि भरद्वाज के यज्ञ की आग हूँ। मैं युगों-युगों से तीर्थराज प्रयाग हूँ।। सूर्य-चन्द्र की ज्योति तक आबाद हूँ, मैं ही अकबर का अल्लाहाबाद हूँ। चन्द्रशेखर आज़ाद के हृदय का ताप हूँ, […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) आज दर्पण का जीवन लगा दाँव में; सच दिखाया था क्यों झूठ की छाँव में? आँखों में दर्द था, दिल में थी शिकन ; पथ में काँटा चुभा जब तेरे पाँव में। […]
प्रकाशक :- बाल केबिनेट शासकीय नवीन प्राथमिक विद्यालय (शाला सिद्धि) नयापुरा माकनी जनशिक्षा केन्द्र नागदा जिला धार मध्यप्रदेश प्रेरणा स्रोत:- गोपाल कौशल सहायक अध्यापक, नेशनल मोटिवेटर,नवोदय क्रान्ति भारत समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित” कवि, साहित्यकार […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) जिसे मैं चाहता हूँ वो चाहत हो तुम जिसे मैंने पाया मेरी अमानत है तुम तन्हा-ए-दिल तुझसे ना बिछड़ पाऊँगा बिछड़ा तो एक पल भी जी नहीं पाऊंगा मेरी जिंदगी के […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) किसी को मंदिर, किसी को मस्जिद बना लेने दो। गरीबों की आह , उनकी पुकार यूँ ही दब जाने दो।। कोई मर रहा भुखा उन्हें यूँ ही मर जाने दो। गर […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) क्या खता हुई है हमसे तु मुझे याद करती नहीं है.. कभी करती थी बातें सात जन्मों की अब इक पल साथ दे राजी नहीं है.. गर खुश है तू मुझको […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक) इलाहाबाद का नाम आते ही प्रथम पंक्ति में जिस सारस्वत हस्ताक्षर का नाम-रूप दिखता है, वह सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का है। मेदिनी, पश्चिमबंगाल में जन्म लेनेवाले सूर्य कुमार ने ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी […]
राजन कुमार साह- (Writer/Motivator) जिंदगी एक जंग है, यूँ हार मानते नहीं। गर हो खडे मैदान में, कभी छोड़ भागते नहीं।। है जोरावर दुश्मन का , हम भी किसी से कम नहीं। गर हो हौसला […]
समीक्षक – संजय वर्मा ‘दॄष्टि ‘ मनावर (धार ) छंद काव्य के अंतर्गत ‘पाठशाला ‘ कवि राम शर्मा ‘परिंदा ‘ सुन्दर सजीला ज्ञानार्जन में उपयोगी संग्रह है | योगी नरहरि साहित्य मंच अछोदा (मनावर )प्रकाशक ,मुद्रक हुसैन […]
‘शारदेय’ सुषमा श्रीवास्तव, कानपुर, उत्तर प्रदेश जब-जब रंग बदलता मौसम, तब तब तुम याद आते हो, जब जब ठोकर खाती हूँ, तुम अश्कों में मुस्काते हो। मौसम की तरह तुम भी बदले, यह सोच के […]
डॉ०पृथ्वीनाथ पाण्डेय भाषा ले रसगागरी, चली पिया के देश। अगवानी में लिपि रही, मन्त्रमुग्ध परिवेश।। सौम्य कविता-कामिनी, ले रचना परिधान। उपमा, अद्भुत, सोरठा, सबका है सम्मान।। वहीं समीक्षा बैठकर, रहि माथा खुजलाय। कैसे-कैसे कवि यहाँ, […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) ख़मोशी में भी उनके कितनी अदब है, यही तो मोहब्बत का पहला सबब है। न बहके क़दम जिनके तन्हाइयों में , तभी दिल को बस उन्हीं की तलब है। पलटते हैं चिलमन […]
समीक्षक – संजय वर्मा ‘दॄष्टि ‘ मनावर जिला धार पत्रिका -शालेय पत्रिका बाल अभिव्यक्ति – स्वच्छता ही सेवा प्रकाशक – बाल केबिनेट शासकीय नवीन प्रा. वि. (शाला सिद्धि ) नयापुरा माकनी ,जन शिक्षा केंद्र नागदा […]
शालू मिश्रा, नोहर जिला – हनुमानगढ़ (राजस्थान) नव दुर्गा मात की महिमा है अपरंपार, नौ रूप है शक्ति तेरे जग की तू है पालनहार । सुनहरे रंगो की लेकर मन में फुहार, अद्भूत सिंह पे होकर चली […]
भारतीय वायु सेना के स्थापना दिवस के अवसर पर भारतीय वायु सेना को समर्पित विनय शुक्ल जी की बेहतरीन रचना : नीली वर्दी, नीला अंबर प्रबल, प्रचण्ड हे गरूड़ दिगम्बर क्षितिज नभ का हो या […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेसी’ बघौली- नवरात्र शुरू हो चुके मातु , आकर के दर्शन दे जाना। उपवास किया मां तेरे लिए, एक दिन मेरे भी घर आना।। पता मातु मुझे भली भांति, तुम हमको छोड़ न […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती परिणय की परिपाटी में तुम पर न्यौछावर हुआ तुम्हें अपना वर्तमान और भविष्य माना हर पग तेरे साथ चलने की कोशिश की, तुम में ही अपना सर्वस्व ढूँढा काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। हर रात उठ-उठ कर तेरे चेहरे में ख़ुद को ढूँढा हर सुबह उठ कर तेरे सोते हुये चेहरे का अजब सा मुँह मोड़ना देखकर ख़ुश हुआ तेरे बालों की महक से तेरी थकान का अंदाज़ा लगा सकता हूँ तेरे चेहरे की शिकन से तेरा मूड बता सकता हूँ काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। हालांकि गुलाबी शूट और बैंगनी साड़ी तुम पे जचती है गुलाब की चार पंखुड़ियाँ तेरी मुस्कान बढ़ाती हैं सूरज की कुछ ही किरणों में तुम थक जाती हो हवा के चंद झोंकों में ठण्ड से डर जाती हो काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। घर के किसी भी कोने में जब तुम होती हो क्या महसूस किया तुमने, हर थोड़ी देर में तुम्हें देख जाता हूँ काली टी-शर्ट में तेरा सोता हुआ फोटो देख कर आज भी चहक जाता हूँ सेवपुरी के दो टुकड़ों में तेरी मुस्कान अब भी दिखती है काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। रेड लेबल चाय का बड़ा डिब्बा तेरे बड़े से मग की याद दिलाता है मेरी कॉफ़ी का १० रूपये वाला पाउच अब भी तेरे चाय के डब्बे से शर्माता है मैरून रंग की वाशिंग मशीन से जब फर्श पर पानी फैलता है और डबल बेड की सरकती ट्रॉली तेरी याद दिलाती है काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती। तेरा छोटा सा डस्ट-बिन खाली पड़ा है पुरानी कॉलेज की बॉय-कट बालों वाली फोटोज और फाईलें वैसी ही पड़ी हैं तेरी तकिया से वही ख़ुशबू आती है तेरे टेडी तेरी याद दिलाते हैं काश! तुम मेरे प्यार को समझ पाती।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चित्र-विचित्र चेहरे हर तरफ़ से देखिए, यक़ीं न हो जनाब तो फेसबुक देखिए। कविता के नाम पर क्या-क्या परोसे हैं, अर्थ-भाव सड़ रहे हैं फेसबुक देखिए। उनकी शब्दावली पर नज़रें इनायत हों, […]
प्रधान संपादक :- अनूप श्रीवास्तव अतिथि संपादक:- विनोद कुमार विक्की पृष्ठ:- 56 सम्पादकीय कार्यालय:- 9,गुलिस्तां कॉलोनी लखनऊ उत्तर प्रदेश समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित” युवा व्यंग्यकार विनोद कुमार विक्की की मेहनत रंग लाई। विक्की ने अट्टहास […]
कवि:- मनोज कुमार सामरिया”मनु” मूल्य:- 225/- प्रथम संस्करण :- 2017 प्रकाशक:- भाषा सहोदरी दिल्ली समीक्षक;- राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित” कवि मनोज कुमार सामरिया का प्रथम काव्य संग्रह भाषा सहोदरी से प्रकाशित हुआ। मुखावरण आकर्षक लगा। प्रस्तुत […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पत्नी : सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़। कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।। हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह। खटपट भी होता रहे, अलग न […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ हमारे प्रिय नेताजी छीन-झपट कर बैठे न सुधरे जनता से छल-कपट कर बैठे । सड़कें ख़राब थी बिजली भी नहीं आती हम बिजली के बटन चट-पट कर बैठे । दिमाग़ आज हमारा बहुत ख़राब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यूँ फँसा पड़ा था उलझनों में कहीं इक अर्सा बीत गया अब जब देखी है तस्वीर तेरी दिल में प्यार उमड़ पड़ा मोहब्बत की गहराई मेरी मालूम है उसे या ख़ुदा क्यों खुद ही में वो उलझ के रह गया ।
ज़िंदगी अब इक तंज़ बन के रह गई बिन तेरे दुनिया रंज बन के रह गई । नाख़ुदा कौनसी स्याही से मानेगा अश्कों का रंग भी अब सुर्ख़ हो गया । बिखर गया हूँ कुछ इस तरह से कि इक टुकड़ा फलक पे दुसरा ज़मीं-दोज़ हो गया । रह रह के देखता हूँ मुड़ के पीछे बवंडर लूट के मुझे ख़ामोश हो गया । डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ दर्द तड़पाता है कभी चुप हो जाता है तन्हाई में अश्कों की बारात सजाता है । ग़म रुलाता है कभी कसक बन के रह जाता है भूले मंज़र याद करके दिल को सताता है । यादें सुलगती हैं कभी थम सी जाती हैं हर लम्हे को ज़ेहन में सजा के सिसकाती हैं । तन्हाई जलाती है कभी ख़ामोश हो जाती है मेरी ओर इशारा करके मुझे चिढ़ाती है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुबह आती आवाज़ें शाम आती आवाज़ें दिन और रात आती आवाज़ें वक़्त तक आती आवाज़ें वक़्त को रोकती आवाज़ें आवाज़ों का ट्रैफिक जाम है, क्योंकि हर दिशा से एक साथ आती हैं कई आवाज़ें।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय गधे बेचारे सोच रहे हैं, हम तो ‘गधे-के-गधे’ रहे और जो हमसे रात-दिन प्रेरणा लेता रहा, वह तो ‘शातिर’ निकला। ऐसे में, ‘गधा- मण्डलीे ‘जन्तर-मन्तर’ में आगामी १५ अक्तूबर को सोमवार के […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति। मन्दिर में मूरत दिखे, उड़न-छू भयी शक्ति।। दो : पट्टी बाँधे आँख में, देश जगाता चोर। भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब […]
कवयित्री:- सुचिता अग्रवाल ‘सुचि संदीप’ पृष्ठ:- 88 प्रकाशक:-ग्रामोदय प्रकाशन, दिल्ली मूल्य:- 200₹ समीक्षक:-राजेश कुमार शर्मा ‘पुरोहित’ कवि एवं साहित्यकार कवयित्री सुचिता अग्रवाल का काव्य संकलन “मन की बात” में कुल 55 कविताएं है। अधिकांश कविताएं […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुना है ज़माने के साथ लोग बदलते हैं शहर में कुछ पीर आजकल भी रहते हैं । आँख भरके देखते हैं क़द्र न की जिसने मचलते हैं क्यों इतना पूँछ के देखते हैं । चाँद से बढ़ कर रोशन सादगी जिनकी हर दिन वो शान से बाहर निकलते हैं । हुजूम से परे उन पर निगाहें ठहर गई तितलियाँ मँडरातीं हैं शायद महकते हैं । उतरे चेहरे सँवार के भी ख़ामोश बहुत जहाँ भर की ख़ुशी आस पास रखते हैं । तिरे पीछे तिरि परछाँइयों से की बातें चश्म हैराँ मिरि अक़्स कमाल करते हैं । मुंसिफ-ए-बहाराँ तिरि एक नज़र को ‘राहत’ तेरे कूचे से दिन रात गुजरते हैं ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते ह़ैं सूरज से डरते हैं इसीलिये दिन में छिप जाते हैं। चाँद से शरमाते है पर आकाश में निकल आते ह़ैं तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं। लोग कहते हैं अंतरिक्ष अनंत ह़ै लेकिन मैंने देखा नहीं मैं तो केवल इतना जानता हूँ सूरज बादल में छिप जाता है चाँद बादल में छिप जाता है सो तारे जब डरते शरमाते होंगे बादल में छिप जाते होंगे। तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ माना कि हालात बेकाबू हो गए कई बार जब भी वक़्त नासाज हुआ हर बार भरोसा रखा मैंने या ख़ुदा तेरे भरोसे को क्या हुआ कभी लगता है सँभल गया कभी यों ही बिगड़ गया वक़्त ऐसा जैसे रेत का बुत मुठ्ठी से फिसल गया रोकना तो चाहा हमेशा पर लम्हा इतना अजीब है क्यों न समझ सका वो तड़प दिल की साथ रहकर भी छोड़कर तुम जहां से गए थे मैं आज भी वहीँ खड़ा हूँ यूँ तुम तो सम्हल गए होगे मैं आज भी बिखरा पड़ा हूँ इस दिल में रहोगे ता-उम्र फिर क्यूँ डरते हो पाक है मोहब्बत मेरी यूँ नजरे चुरा के ना निकलो इंतिज़ार है तेरे इक इशारे का आगे खूबसूरत जहाँ पड़ा है तेरे बिना वर्ना दर्द का दरिया ‘राहत’ आँखों से बहता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ कुछ लोग मंदिर को मदिरालय से मस्जिद को मय-ख़ाने से जोड़ गए । आस्था से खेला संवेदनाओं को चक्कर में छोड़ गए । और नासमझ मनुष्य मंदिर से मदिरालय के मस्जिद से मय-ख़ाने के रिश्ते पर यकीं कर बैठा ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ रखता हूँ हर कदम ख़ुशी का ख़याल अपनी डरता हूँ फिर ग़म लौट के न आ जाए । अब भुला दी हैं रंज से वाबस्ता यादें यूँ आके ज़िंदगी में ज़हर न घोल जाएँ […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ़) राजस्थान मुसीबत के समंदर में जो किनारा दे वो है मेरी माँ, जीने के मायने जो सिखाये वो हैं मेरी माँ। औलाद उदास हो तो मुस्कान चेहरे पर लादे वो हैं […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यकीं का यूँ बारबां टूटना आबो-हवा ख़राब है मरसिम निभाता रहूँगा यही मिरा जवाब है । मुनाफ़िक़ों की भीड़ में कुछ नया न मिलेगा ग़ैरतमन्दों में नाम गिना जाए यही ख़्वाब है । दफ़्तरों की खाक छानी बाज़ारों में लुटा पिटा रिवायतों में फँसा ज़िंदगी का यही हिसाब है । हार कर जुदा, जीत कर भी कोई तड़पता रहा नुमाइशी हाथों से फूट गया झूँठ का हबाब है । धड़कता है दिल सोच के हँस लेता हूँ कई बार तब्दील हो गया शहर मुर्दों में जीना अज़ाब है । ये लहू, ये जख़्म, ये आह, फिर चीखो-मातम तू हुआ न मिरा पल भर इंसानियत सराब है । फ़िकरों की सहूलियत में आदमियत तबाह हुई पता हुआ ‘राहत’ जहाँ का यही लुब्बे-लुबाब है ।
कवयित्री:- उर्मिला श्रीवास्तव पृष्ठ:-94 मूल्य:-100/- समीक्षक:- राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित” शिक्षक एवम साहित्यकार लखनऊ की कवयित्री उर्मिला श्रीवास्तव की यह आंठवी कृति “दीपक तले उजाला” पढ़ी। इस कृति की सभी कविताएँ मानव को कुछ न कुछ […]
राजेश पुरोहित भवानीमंडी, जिला झालावाड़, राजस्थान ढलेगी रात अंधियारी, सुबह फिर सूरज निकलेगा। जो ख्वाबों में दिखा तुमको, वह हकीकत में दिखेगा।। घर घर की कहानी वही पीढ़ी का अंतर देखा। नई पीढ़ी चाहे आज़ादी,पुरानी […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ़ ) राजस्थान भाई और बहन हो जाओ तैयार, लो आ गया राखी का त्योहार । ठंडी बारिश की बूँदे, सावन की सौंधी महक। भाई के आने की उम्मीद बहना को लगी […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ) धन की लालसा मन में जगाते हो, बेटी को पराया धन बोल गर्भ में गिराते हो। कहते है ,के बेटा वंश बढायेगा, यदि बहू न आई आंगन तो किलकारी कौन गूंजायेगा। […]
“पार्थ जीना होगा “हौसलाअफजाई की प्रेरणा देने वाला उपन्यास है । प्रकाशक – शिवना प्रकाशन,आवरण डिजाइन: सनी गोस्वामी ,कंपोजिंग -ले आउट :शहरयार अहमजद खान ,आवरण चित्र :संजय पटेल,मुद्रक:शाइन आफसेट ने पार्थ […]
इस अनूठे उपन्यास को विश्व के 66 रचनाकारों द्धारा लिखा गया है ! प्रो.सरन घई ने अपने वक्तव्य में कहा की रिश्ते मेरे लिए कोतुहाल का विषय रहे हैं ,परिवारों में रिश्तेदारों को एक दुसरे के […]
ग़ज़लकार नवीन माथुर ‘पंचोली ‘का ग़ज़ल संग्रह ‘छाँव से फासला ‘ में 90 गजलें पढ़ने और गुनगुनाने लायक है | सभी ग़ज़लें एक से बढ़कर एक लगती है |नवीन माथुर ‘पंचोली ‘ की गजल शैली […]
साहित्य क्षेत्र में अपनी साहित्य विधा के जरिये हर रंग का जादू बिखेरने वाले वरिष्ट कवि कवि /संपादक यूँ तो जन -जन में लोकप्रिय है उतनी ही उनकी साहित्यिक कर्म में रूचि अम्बर को छू […]
‘निर्मल मन के मोती’ कविता संग्रह कवि गौरी शंकर उपाध्याय ‘उदय ’95 कविताओं का गुलदस्ता है | जिसमे कविता मिश्रित गीत एक अदभुत तालमेल का संयोजन है जो मन को छू जाता है | वंदना […]
श्री गणेश मनावर जिला धार (मप्र ) के वरिष्ठ कवि श्री शिवदत्त जी “प्राण ” ने लगभग 60 वर्ष पूर्व गणेश जी की स्वरचित आरती लिखी थी जो पूरे मनावर एवं आसपास के क्षेत्रों में संगीत […]
कुँअर उदयसिंह ‘अनुज ‘ का दोहा -संग्रह “यह मुकाम कुछ और “मात्राओं का साहित्यिक गणित है जिसमे भाव यानि बात कहने का आशय बड़ी ही चतुराई से दोहाकार कह जाता है | जिस प्रकार से […]
जगन्नाथ शुक्ल..✍ (इलाहाबाद) नज़्म-ए-वफ़ा अहल-ए-बज़्म में,मैं सदा गाता रहा। दिल टूटा खिलौने की तरह,पर मैं तो मुसकाता रहा।।—२ अठखेलियाँ करते हैं आँसू, जब तब मेरे पलकों के भीतर, हूँ विवश मैं इस क़दर कि- घूँटता […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ जब दूर बैठा कवि कोई, सर्जन के बीज बोता है, भाव में खुद को पा कर, मन में हर्ष का तीज़ होता है। जब दूर…………………………………………………. उठी जैसे लहर कोई, नया अनुबन्ध करने को, […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ), राजस्थान ऐ विघ्नहर्ता ऐ मंगलकर्ता तू ही दुखहर्ता तू ही सुखकर्ता, एकदंत गजबदन को मेरा बारंबार प्रणाम । चारों ओर मची है धूम गणेश उत्सव की, जीवन में छाई नई आशा […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ), राजस्थान मन ये तेरा परेशान क्यूँ है, इस जग से बेफिक्र क्यूँ है, नित नये ख्वाब सजा कर मन में दबा बैठा क्यूँ है। पथ पर नित आगे बढ चल न […]
(महादेवी जी के साथ डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की की गयी एक भेंटवार्त्ता) महादेवी जी के साथ वर्ष १९८२ में डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने एक मुक्त भेंटवार्त्ता की थी; तब वह विद्यार्थी और पत्रकार की दोहरी भूमिका […]
समीक्षक -संजय वर्मा ‘दॄष्टि ‘ शब्दों से श्रृंगारित भावों की धारा “यशधारा ‘का व्यंग्य विशेषांक के संपादक डा. दीपेंद्र शर्मा ने अंक अप्रैल -जून 2018 ने व्यंग्य विधा के दो स्तंम्भ श्री शरदजी जोशी और श्री […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अत्यन्त दुःख-अतीव क्षोभ-महा आश्चर्य तथा अतिशय लज्जा का विषय है कि देश के विद्वान्-अध्येता-शोधकर्त्ता-कर्त्री-साहित्यकार-समीक्षक-अध्यापक तथा सारे पढ़ाकू काव्य में नयी प्रवृत्तियों को लानेवाले सम्मान्य भारतेन्दु हरिश्चन्द का नाम तक नहीं जानते; सभी […]
कवि – राजेश पुरोहित रोज – रोज तेल के भाव चढ़ रहे। सियासत में तूफान भी मच रहे।। विपक्ष के नेता हाहाकार कर रहे। जनता के प्रदर्शन रोज ही हो रहे।। आने वाले अब अगले […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” ज़िंदगी के रंग मंच पर आदमी है सिर्फ़ एक कठपुतली । कठपुतली अपनी अदाकारी में कितने भी रंग भर ले आख़िर; वह पहचान ही ली जाती है, कि वह मात्र एक कठपुतली है । ऐसे ही आदमी चेहरे पर कितने ही झूठे-सच्चे रंग भरे अंत में, रंगीन चेहरे के पीछे असली चेहरा पहचान ही लिया जाता है |
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जिस सहर पे यकीं था वो ख़ुशगवार न हुयी देखो ये कैसी अदा है नसीब की समझा था जिसे बेकार, वो बेकार न हुयी मांगी थी जब तड़प रूह बेक़रार न हुयी कहूँ अब क्या किसी से देखकर माल-ओ-ज़र भी मिरि चाहतें तलबगार न हुयीं सोचा था जिन्हे अपना वो साँसें मददगार न हुयीं है अजीब अशआर क़ुदरत की भूल से छोड़ा था जिसे हमने वो निगाहें शिकबागार न हुयीं २५/०१/०३ टैगोर हॉस्टल, सागर यूनिवर्सिटी
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत‘ जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई दफ़्तरी से हुए वाबस्ता तो आवारगी चली गई । शौक़ अब रहे न कोई ज़िंदगी की भागदौड़ में दुनियाँ के दस्तूर में मिरि कुशादगी चली गई […]
समीक्षक : संजय वर्मा “दृष्टि ” 125 ,शहीद भगत सिंह मार्ग, मनावर जिला -धार (म प्र ) 454446 माँ -बेटी काव्य संग्रह में ज्योति जैन ने एक नया काव्य प्रयोग किया है-आकार / मांडना कला /सुन्दर रेखांकन […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुन्दर डीपी लगा रखी है मोहतरमा अब तो चाय पिला दें सुबह उठते से ही देखो की है तारीफ़ अब तो चाय पिला दें । सोच रखा है छुट्टी का दिन […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) कन्हैया बस यही विनती मेरी स्वीकार कर लेना, मेरी डगमग-सी नैया को ये दरिया पार कर देना। सबकी बिगड़ी बनाते हो , सभी को राहें दिखाते हो। कहीं गोपी सङ्ग लीला, कहीं […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) गिरते मन को उठाना सिखाया है जिसने, घोर तम में दीये को जलाया है जिसने। उस गुरु की हृदय से इबादत करूँ मैं, भटके क़दमों को राहों में लाया है जिसने।। **** […]
डॉ. रूपेश जैन मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था ख़ाहिश-ए-ख़लीक़ इज़हार करना चाहा था । धुएँ सी उड़ा दी आरज़ू पल में यार ने मिरि तिरा इस्तिक़बाल शानदार करना चाहा था । भले लोगो की बातें समझ न आईं वक़्त पे मैंने तो हर लम्हा जानदार करना चाहा था । तिरे काम आ सकूँ इरादा था बस इतना सा तअल्लुक़ आपसे आबदार करना चाहा था । इंतिज़ार क्यूँ करें फ़स्ल-ए-बहाराँ सोचकर चमन ये ‘राहत’ खुशबूदार करना चाहा था ।
कवि:- कैलाश मण्डलोई”कदम्ब” संपादक:- डॉ. आचार्य भानुप्रताप वेदालंकार प्रकाशक:- साहित्य संगम संस्थान प्रकाशन,आर्य समाज 219 संचार नगर एक्स. इंदौर(मध्यप्रदेश) पृष्ठ:-40 मूल्य:- 150/- *समीक्षक*:-राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित” कवि, साहित्यकार 98, पुरोहित कुटी, श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी जिला-झालावाड़, […]
कवि राजेश पुरोहित महावीर के सिद्धांतों को जिसने जग में फैलाया। दिगम्बर रह कर जीवन में सच्चा संत कहलाया।। तन पर न कोई वस्त्र रखा रखी धर्म की लाज सदा। मुनि तरुण सागर ने अमृतवाणी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सदियों से भटकती इक तलाश लिखता हूँ , हवा,पानी,आँधी और बतास लिखता हूँ। सूख रही ताल-तलय्या दूभर है अब पानी, इस काइनात१ की अब लिखता हूँ हमक़दम दग़ा दे गया कुछ […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” इंसानियत से प्यार जब दीन-ओ-जान हो जायेगा मुज़्तरिब हाल में हाथ थामना ईमान हो जायेगा रस्म है, ज़िंदगी करवटें बदलती रही इब्तिदा से शिद्दत से जिया जो मालिक मेहरबान हो जायेगा ख़ुद से मुलाक़ात […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” दिन हो, रात हो अब युवा हिन्द के करते आराम नहीं समाज बदल रहा है युवा, व्याकुलता का अब काम नहीं भारत माता की वेदी पर निज प्राणों का उपहार लाये हैं शक्ति भुजा में, ज्ञान गौरव जगाने भारत के युवा आये हैं नित नए प्रयासों से समाज को आगे ले जा रहे है देखो युवा क्या क्या नये उद्यम ला रहे है बिन्नी के साथ ‘फ्लिपकार्ट’ आया देश में नया रोजगार लाया कुणाल और रोहित की ‘स्नैपडील’ कंस्यूमर को हो रहा गुड फील देश की बेटियाँ कहाँ पीछे रहीं राधिका की ‘शॉप-क्लूज़’ आ गयी हुनर नहीं बर्बाद होता अब तहखानों में जीवन रागनियाँ मचल रही नव-गानों में समझ चुके हैं बिना प्रयास पुरुषार्थ क्षय है आगे बढ़ चले अब, भारत माता की जय है तप्त मरु को हरित कर देने की आस लगाये हैं युवा सुख-सुविधाओं की नए परम्परा लाये है भाविश का ‘ओला’ समय से घर पहुँचता शशांक का ‘प्रैक्टो’ डॉक्टर से मिलवाता दीपिंदर का ‘जोमाटो’ खाना खिलवाता समर का ‘जुगनू’ ऑटोरिक्शा दिलवाता विजय का ‘पेटीऍम’ ट्रांजेक्शन की जान सौरभ, अलबिंदर का ‘ग्रोफर्स’ खरीदारों की शान शिरीष आपटे की जल प्रणाली देश के काम आ रही बीएस मुकुंद की ‘रीन्यूइट’ सस्ते कंप्यूटर बना रही बिनालक्ष्मी नेप्रम ‘वुमेन गन सर्वाइवर नेटवर्क’ चला रहीं सची सिंह रेलवे स्टेशन पर लावारिसों […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” भावनाओं का निर्मल सलिल हृदय से गुज़रते ही दर्द की आग में उबल पड़ता है और निष्क्रिय मस्तिष्क फिर वापस पीछे धकेलते हुए शरीर निष्प्राण सम कर देता है हर डगर यूँ तो कठिन […]