ग़ज़नी-गोरी मिल गये, लूट रहे अब देश
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–ध्यान बँटाने के लिए, तरह-तरह की खोज।मन्दिर-मस्जिद लड़ रहे, हर पल हर दिन रोज़।।दो–सत्ता चेरी बन गयी, कुरसी चिपकी देह।रड़ुवा-रड़ुवी संग हैं, माग भरी है रेह।।तीन–ग़ज़नी-गोरी मिल गये, लूट रहे […]