गहरी नदी और नाव पुरानी

May 9, 2022 0

अवधेश कुमार शुक्ला गहरी नदिया, नाव पुरानी । नाव चलाउब, हम का जानी । सखी, साथु जौ हमरो देतिउ, दुनिया मोरि न होति बिरानी ।। धारमधार अsधार न सूझी । चली एकला, राह न बूझी […]

वफ़ा ने फज़ा से पूछा सनम की आँखों का नूर कैसा है

May 8, 2022 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- वफ़ा ने फज़ा से पूछा सनम की आँखों का नूर कैसा है। फज़ाने जवाब दिया कसम से जन्नत के हूर जैसा है।। महबूबा की आँखों में अश्कों का समन्दर छुपा है बैठा। […]

“माँ” मेरी दुनिया

May 8, 2022 0

प्रांशुल त्रिपाठी : मां से बढ़कर इस दुनिया में मेरा कोई नहीं ,जब भी मैं रोया तो चुप कराई वहीं ।अपने दिल में छुपा कर हमें रखती थी वो ,लोगों की नजरों से बचाने के […]

पराये शहर मे

May 7, 2022 0

उस रोज दीवाली होती है —-प्रांशुल त्रिपाठी, विधि छात्रअवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा l एक दीप मन में भी जलायें क्यों जलाते हो मुझे “माँ” मेरी दुनिया

एक समीचीन अभिव्यक्ति :—–

May 6, 2022 0

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बीभत्स चरित्रधारी!तुम्हारा चेहराआज दल-परिवर्त्तन करता-सा दिख रहा है।तुम्हारी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा के कुकृत्यपैवन्द लगीं चादरें सुना रही हैं।लोलुपता और लिप्सातुम्हारे चरित्र की पटकथा कोआमिषाशी बना रही हैंतुम निष्ठुर और नृशंस बन […]

मुझे इन्सान ही बना रहने दो तुम

May 6, 2022 0

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद उत्कृष्टता की थाह न है,मुझे इन्सान ही बना रहने दो तुम। घने जंगल के दरख़्त की तरह,मुझे अहर्निश खड़ा रहने दो तुम। जहाँ मन मे न हो गुमान कोई,हर मुश्किल में अड़ा रहने दो तुम। अहम की है […]

कुछ भी नहीं

May 6, 2022 0

न कोई शिकवान कोई शिकायत।न कोई दर्दन कोई हमदर्द।न कोई अपनान कोई पराया।न कोई सुखन कोई दुख।न कोई चोरन कोई शोर।न कोई राहीन कोई हमराही।न कोई जीतन कोई हार।न कोई रक्षकन कोई भक्षक। राजीव डोगरा(भाषा […]

वह वाक़िफ़ है, बस्ती मे नामर्द ही रहते हैं

May 6, 2022 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय नुमाइश करता और कराता है चालाकी से,पर्दा गिराता और उठवाता है चालाकी से।लोग उसके मुरीद अब भी हैं बनते देखो!कटोरा हाथ में थमवाता है चालाकी से।दर-दर की ठोकरें खाओ तो […]

लघुकथा : भरोसा (‘कांच का प्याला’ विषय पर आधारित)

May 5, 2022 0

नीना अन्दोत्रा पठानिया (युवा साहित्यसेविका)- सभी रात का खाना खाकर अपने – अपने कमरे में चले गये और नई नवेली रमा किचन का बाकी काम समेट रही थी । कुछ महीने ही हुए थे अभी […]

बाहर का कप

May 5, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा— मोहिनी, सुबह 7 बजे से लेकर 11 बजे तक अपनी मेम साहब के यहाँ काम करती । सारे काम मोहिनी के जिम्मे ……. मेमसाहब 8 बजे उठती, उसके एक घण्टे पहले मोहिनी के […]

लघुकथा : अवाक्

May 5, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा, गोंडा, उत्तर-प्रदेश— सुबह रिया ने आवाज दी रिशु बेटा उठो मम्मा आज जल्दी क्यों, पता है रिशु आज हम लोग गांव जा रहे है ; दादी से मिलने । मम्मा गांव में मजा […]

खलीफाओं का बिरहा

May 4, 2022 0

प्रभात सिंह (युवा लेखक/मान्यता प्राप्त पत्रकार)- पन्ना लाल ख़लीफ़ा एक हाँथ में गमछा और दूसरे हाँथ में माइक पकड़े पहले लंबी तान लगाते हैं। फिर मंच के नीचे बैठे रमेश ख़लीफ़ा, मुन्नी लाल ख़लीफ़ा से […]

बन्द बक्से से कुछ खत जो पुराने निकले

May 4, 2022 0

अनीता सिंह- बीते लम्हों का हिसाब मिलाने निकले गाँठ खोली तो यादों के खजाने निकले। जिन रकीबों को हम दर्द सुनाने निकले मेरी उम्मीद के कातिल वो पुराने निकले। जिनसे मिलने को हम कर के […]

तस्वीर ही जागीर

May 4, 2022 0

इस तस्वीर के पीछे एक और तस्वीर छुपी है, वो तस्वीर नही मेरी जागीर छुपी है। अरसे गुज़र गए जागीर की नुमाइंदगी में, हर रोज़ लगता तस्वीर और निखर गई है। राज®✍🏻

ये नेह-नेह के धागे

May 4, 2022 0

राज चौहान (नव कवि)- ये नेह-नेह के धागे, यारा तुमसे न टूटेंगे। हम साथ रहें, ना रहें, न रूठे हैं न रूठेंगे।। हर वक्त रहा है साथ तेरा, हर वक्त पे तुझको पाया है। कैसे […]

ग़ज़ल : खुद का जो हो न सका कैसे हमारा होगा

May 4, 2022 0

अनीता सिंह- जब भी शीशे में उसने ख़ुद को निहारा होगा मेरी आँखों के बिना कैसे संवारा होगा। आज लगता है ये पानी क्यों चाँदी चाँदी रात ने चाँद को दरिया में उतारा होगा। किसकी […]

‘आँगन का पंछी गौरइया’ का लोकार्पण

May 4, 2022 0

अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर श्री काली मंदिर आश्रम बैजलपुर, कोल्हनपुर, जिला गोंडा के पवित्र प्रांगण मे प्रद्युम्ननाथ तिवारी ‘करुणेश’ के काव्यसंग्रह ‘आँगन का पंछी गौरइया’ का लोकार्पण अध्यात्म और साहित्य के विभूति- द्वय […]

कविता : नशा

May 3, 2022 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’  (यह रचना राघवेन्द्र की पुस्तक “विकृतियाँ समाज की” से ली गयी है)- सड़क के किनारे पड़ी थी एक लाश । उसके पास कुछ लोग बैठे थे बदहवाश । उनमे चार छोटे […]

ग़ज़ल : मैने देखा खून आज राह मे गिरा हुआ

May 3, 2022 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’–  मैने देखा ख़ून आज राह में गिरा हुआ, पूछा ख़ून किसका है कोई तो बताइए? क्या हुआ जो आप सब क्रोध में उबल रहे? व्यर्थ ही सामर्थ्य आप ऐसे ना जलाइये। […]

रतजगों की थकन

May 3, 2022 0

सत्याधार (युवा गीतकार)- बात बेबात पर दरकिनारी हुई । बेवजह बात उनसे हमारी हुई ॥ चन्द नगमें गढ़े, चन्द गजलें कही । इस तरह से खतम उम्र सारी हुई ॥ यूँ तो दफ्तर पहुँचता हूँ […]

लघुकथा : पार्क की घुमक्कड़ी

May 3, 2022 0

 अभिरंजन शर्मा (बिहार)- वो दोनों बेफिक्र हो कर पार्क में घूमते थे। हाल-ए-दिल बयां करते थे। वे हर दिन मिलते थे। बिना किसी डर-भय के। बगल में पुलिस थाना भी था। समाज की हर बंदिशों […]

गीत – आँसू और उदासी ने जब जीवन पथ पर साथ निभाया

May 2, 2022 0

सत्याधार- आँसू और उदासी ने जब जीवन पथ पर साथ निभाया, तो फिर इन्हें छोड़ खुशियों संग मैं विवाह कैसे कर लेता? आँसू बन जाते हैं स्याही , और रौशनाई होता दिल ! लेकर कलम […]

पुरुषत्व की मैला

May 2, 2022 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’– अन्तःविचारों मे उलझा न जाने कब? मै एक अजीब सी बस्ती मे आ गया। बस्ती बड़ी ही ख़ुशनुमा और रंगीन थी। किन्तु वहाँ की हवा मे अनजान सी उदासी थी। ख़ुशबू […]

पहली पोस्टिंग

May 1, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा गोंडा- तुम्हारी हर आकांक्षा पूरी अब हो सकेगी निःसन्देह , ये सच हैं , स्वीकार करना अभी मौन की स्थिति बड़ी दयनीय हैं जहाँ कोई उत्कंठा हैरत करती कितनी मन्नत पूरी करनी हैं […]

मेरे पापा मेरी जान

April 30, 2022 0

मेरे पापा मेरी जान है,मेरे पापा मेरी शान है ,उन पर मेरा सब कुछ कुर्बान है।मेरे पापा मेरी दुनिया है,मेरे पापा मेरी धड़कन है,उनसे ही मेरी पहचान है।मेरे पापा मेरी हर खुशी है,मेरे पापा मेरे […]

संवाद के बहाने से

April 30, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा – अल्का कोई दस्तक नहीं दी हैरानी की बात यह राज क्यों रखी ? खुली पलकों में अल्का देखों इस मनुष्य को कभी विफल नहीं हुए निराश क्यों ? कल्पना के अधीन होकर […]

कविता : आजकल का प्यार

April 30, 2022 0

राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’- माँ के लिए नहीं कभी दो सौ रूपये की साड़ी, लेकिन वैलेंटाइनडे पर पाँच सौ रूपये का गुलाब । भौतिक तृष्णाओं का ये सजीला गुलदस्ता है, आजकल के प्रेम का है अपना ही […]

बहुत भड़का चराग़-ए-इश्क़ बुझाए जाने से पहले

April 29, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ लखनऊ – बहुत भड़का चराग़-ए-इश्क़ बुझाए जाने से पहले | ग़ज़ब के हर्फ़ लिख डाले मिटाए जाने से पहले || सम्हाले दिल को रखना तुम कहीं ये टूट न जाए | […]

वो दिन भी थे ज़माना जब हमारी बात करता था

April 29, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- सुहाने पल न जाने क्यूँ ख़्यालों में नहीं आते | अन्धेरों में हैं खोए सब उजालों में नहीं आते || नहीं बुझती प्यास मेरी बहुत ज़्यादा मैं प्यासा हूँ | […]

मेरे शहर मे

April 29, 2022 0

आओ! कभी मेरे शहर मेंतुम को गैरों को अपना बनाकरदिल लगाना सिखाए। आओ!कभी मेरे शहर मेंतुमको हर एक शख्स़ सेमोहब्बत करना सिखाए। आओ!कभी मेरे शहर मेंतुम को नफरतों के बीच मेंपलता इश्क दिखाएं। आओ!कभी मेरे […]

खिल उठा देख कुमुद का यौवन

April 29, 2022 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- चाँदनी रात, महकता चंदन । खिल उठा देख कुमुद का यौवन। * हवा मे रात की रानी महकी दूर महका कोई सघन उपवन । * गर तेरे रूप की फुहार पड़े […]

तेरा नाम ले के डूबे, दीवानगी पे रोये

April 28, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- पल-पल जो बढ़ रही है उस तिश्नगी पे रोए | ग़म-ए-ज़िन्दगी से ज़्यादा ग़म-ए-आशिक़ी पे रोए || मेरा राब्ता नहीं अब कुछ तुझसे रह गया है | रग-रग में फिर […]

इन गुलाबों से ख़ुद को सजा लीजिए

April 28, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- जान मेरी छोड़ मुझको अगर जाएगी | ज़िन्दगी टूट कर के बिखर जाएगी || इन गुलाबों से ख़ुद को सजा लीजिए | कुछ तो इनकी भी लाली निखर जाएगी || […]

दिल ने तुमको बुलाया है चले आओ मुझे लेने

April 28, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ – बहुत तुमने सताया है चले आओ मुझे लेने | बहुत तुमने रुलाया है चले आओ मुझे लेने ||    नहीं जी पाएंगे तुम बिन बहुत तुम याद आते हो […]

तुम्हें अब जान कह कहकर बुलाने कौन आएगा

April 28, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ- ज़रा सोचो अधूरे ख़्वाब सजाने कौन आएगा | अगर रूठी तो अब तुमको मनाने कौन आएगा || सोचा मिलता चलूँ तुमसे कहीं मैं जा रहा था और | बहाने कर […]

मेरी ग़ज़लों में तेरा ज़िक्र बस यूँ ही नहीं होता

April 27, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) बहारें चल कर आएंगी तेरा दामन सजाने को | मैं फिर से लौट आऊँगा तेरी दुनिया बसाने को || तुझे मिलने की ख़ातिर ग़र क़यामत का सफ़र ही है | […]

ख़ुद ही ख़ुद का क़ैदी हूँ मै, ख़ुद ही ख़ुद का ज़िन्दान हूँ मै

April 27, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) मुझको नहीं मालूम है कैसे तेरे अन्दर ज़िन्दा हूँ मैं तेरे दिल की क़ैद में रोता टूटा एक परिन्दा हूँ मैं। सारे जहाँ की ख़ुशियों को मैं ठोकर मार के […]

तुम्हारे साथ बीते पल मुझे बस याद रह जाएं

April 27, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ) –        तुम्हारे दिल में मेरे कुछ छिपे जज़्बात रह जाएं | मुझे तुम छोड़ न पाओ ऐसे हालात रह जाएं || मैं सब कुछ भूल भी जाऊँ मुझे […]

कविता : हृदय की वेदना

April 26, 2022 0

आदित्य त्रिपाठी, सहायक अध्यापक बे०शि०प०  भला कब कौन समझा है! भला कब कौन समझेगा! हृदय की वेदना तेरे सिवा अब कौन समझेगा? मैं तुझको आजमा लेता मगर क्या आजमाऊँगा, तुम्हारे प्यार से दीपित दिये दिल […]

कुत्ते को गाय बनाना, बात कठिन

April 26, 2022 0

डा. दिवाकर दत्त त्रिपाठी (चिकित्सक/युवा साहित्यकार)- बंदर को आइना दिखाना , बात कठिन । मूरख को सच भी समझाना, बात कठिन। . साबुन से नहला दो ,ये कर सकते हो ! पर कुत्ते को गाय […]

ग़ज़ल– मोहब्बत में असर होता तो ये हालात न होते

April 26, 2022 0

मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ (लखनऊ)  सज़ाएं काट लूँगा मैं तुम्हारा नाम न लूँगा | कभी भी अब ज़माने में प्यार से काम न लूँगा || मुहब्बत में असर होता तो ये हालात न होते | […]

गीत : विष आलिंगन में खुश रहना, यह मैंने चंदन से सीखा

April 25, 2022 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- सोने जैसा खरा नही हूँ । पर इतना भी बुरा नही हूँ । मुद्दों को मत मीत बनाओ , मत राई को मेरु बनाओ। मेरे घाव बहुत दुखते हैं, मत खंजर […]

रंगे सियारों से सारी उम्मीदें बेमानी हैं

April 25, 2022 0

राघवेन्द्र कुमार “राघव” राजनीति के रंगे सियारों सेसारी उम्मीदें बेमानी हैं। सत्ता लोलुपता के कारणमर गया आँख का पानी है। भीतर विद्रोही मार रहेबाहर आतंकी काट रहे। लेकिन हम हैं बेशर्म बड़ेराजनीति ही हाँक रहे। […]

जिजीविषा से भरपूर रही, रमेश सिंह मटियानी से ‘शैलेश मटियानी’ तक की यात्रा

April 24, 2022 0

आज (२४ अप्रैल) शैलेश मटियानी की पुण्यतिथि है। अल्मोड़ा जनपद के बाड़ेछिना गाँव मे १४ अक्तूबर, १९३१ ई० को जन्म लेनेवाले शैलेश मटियानी बहुत ही अभावपूर्ण जीवन जीते रहे। यही कारण है कि उनकी शिक्षा-दीक्षा […]

आर्त्तनाद विधवाओं का

April 24, 2022 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी ऐ मेरी देश की बहरी सरकार ! भला कब तक तू निंदा का राग यूँ अलापेगी? क्लीव हो चुके हैं देश के चालक सभी, दिल्ली की सोई हुई सत्ता कब जागेगी? […]

वह तुम थे या नियति का परिहास

April 24, 2022 0

कृष्ण प्रिया- क्या लौट आई थी प्रतिध्वनि मेरी! स्वर न हो सका शंखनाद! उस दिन ख्वाबों के घाट तुम ही तो चले आए थे न श्याम मेरी आंखों में अविश्वास घनेरे थे कैसे करती विश्वास […]

मन नहीं बुढ़ाता

April 24, 2022 0

सुधेश- चलते चलते हाथ पाँव थकते चलने की चाह नहीँ मरती देखते देखते आँखेँ धुँधलातीँ देखने की चाह नहीँ मरती दुनिया की चखचख सुनते कान बधिर सुनने की चाह नहीँ मरती घर बाहर का सब […]

एक अतुकांत कविता- मेस वाला लड़का

April 24, 2022 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी-  वो मेस वाला लड़का , जो खाना लेकर आता है। मेरे मन में वो ढेरो सवाल छोड़ जाता है । अभी उमर उसकी क्या होगी? दस ,बारह या तेरह , यही […]

चुप्पी अब तो व्यर्थ है, लेती है आकार

April 23, 2022 0

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मन का प्यासा दूर है, तन का प्यासा पास।मृगमरीचिका ही दिखे, थोथी होती आस।।दो–रूप रूपसी रुत नहीं, रंग नूर अवसान।पलक झपकती आँख है, मची है घमासान।।तीन–गणित बदलता धूप का, जलती […]

क़िताबें

April 23, 2022 0

किताबें ऐसी सम्पत्ति हैं जिसमें सहजता और सरलता भी है। किसी की हो जाती हैं तन्मयता के साथ सबकी किताबें एक जैसी अलमारियों पर करीने से सजाई हुई बस्ते में कवर चढ़ाई हुई सर्जन पथ […]

अधूरा प्रेम

April 23, 2022 0

पिण्टू कुमार पाल- मैं गाता हूँ और वो सुनती है, प्यार के ताने बाने बुनती है । काश होता ये काश होता ये, सोच कर खुश वो होती है । हो गए हैं अब दोनों […]

क्रोध के स्वर : सिंहों पर हमने कुछ गीदड़ रौब जमाते देखे हैं

April 23, 2022 0

योगेश समदर्शी (हास्य एवं ओज कवि)- जुगनू कुछ सूरज को हमने अब धमकाते देखे हैं सिंहों पर हमने कुछ गीदङ रौब जमाते देखे हैं बहकावे में आकर जिसने हाथ में पत्थर थाम लिए और शत्रु […]

अनुभव

April 23, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा प्रेम का अनुभव रसरूपक विचित्र भावो का द्योतक है तुम प्रेम में कहा तक सफल हुए यह विस्तारण भावो का तुम कठिन हुए हर मोड़ पर जीवन के कब सरल रहे , कहा […]

ऊँची उड़ान

April 23, 2022 0

पिण्टू कुमार पाल- आसमां भी आपका, जमी भी आपकी, हौसला भी आपका, उड़ान भी आपकी, उड़ो तो आसमान की ऊँचाई नाप दो, गिरो तो समंदर की गहराई नाप दो. भरो तुम बहुत ऊँची उड़ान, पर […]

न रख इतना नाज़ुक दिल

April 22, 2022 0

—डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इश्क़ किया तो फिर न रख इतना नाज़ुक दिल माशूक़ से मिलना नहीं आसां ये राहे मुस्तक़िल । तैयार मुसीबत को न कर सकूंगा दिल मुंतकिल क़ुर्बान इस ग़म को तिरि ख़्वाहिश मिरि मंज़िल ।   मुक़द्दर यूँ सही महबूब तिरि उल्फ़त में बिस्मिल तसव्वुर में तिरा छूना हक़ीक़त में हुआ दाख़िल । कोई हद नहीं बेसब्र दिल जो कभी था मुतहम्मिल गले जो लगे अब हिजाब कैसा हो रहा मैं ग़ाफ़िल ।   तिरे आने से हैं अरमान जवाँ हसरतें हुई कामिल हो रहा बेहाल सँभालो मुझे मिरे हमदम फ़ाज़िल । नाशाद न देखूं तुझे कभी तिरे होने से है महफ़िल कैसे जा सकोगे दूर रखता हूँ यादों को मुत्तसिल ॥

कविता : मैं तुमसे पूछता हूँ

April 22, 2022 0

पंकज चतुर्वेदी – जैसे-जैसे पकड़ तुम्हारी सख़्त होती है कश्मीर छूटता जाता है जिनकी हथियार में आस्था है वे समझ नहीं पाते कि प्यार का विकल्प नहीं है तुम उनसे अलग नहीं हो तुम नहीं […]

मेरे पास शब्द हैं

April 22, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा (युवा साहित्यकार)- उसने कहा मेरे पास शब्द हैं तुम्हें जानने के लिए इतने शब्द हालात सम्भालने के काम आ सके क्या कहूँ ? अभी-अभी हृदय की पीड़ा बढ़ रही तुम अभी मौन हो […]

जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ, मेरी बेटी लगती है

April 22, 2022 0

उषा लाल – जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ मेरी बेटी लगती है ! घड़ी घड़ी जिज्ञासित हो कर बहुत प्रश्न वह करती है भर कौतूहल आँखों में हर नई वस्तु को तकती है ! बात […]

खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है

April 22, 2022 0

योगेश समदर्शी (कवि/प्रकाशक)- मैं जिसे लिख ही न पाया, पीर मुझको खा रही है और खामोशी मेरी इक आग बनती जा रही है। १. मुझमे कोई हँस रहा है, हाथ में विषधर लपेटे और मैं […]

मत वर्तमान से खेल करो

April 22, 2022 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- ऐ! रुको! रुको! मेरे अतीत,मत वर्तमान से खेल करो ! गाया तुमको मैने अतीत!जैसे कि कोई शोक गीत।तुम वर्तमान से दूर रहो,मत करो मेरे उर को सभीत।तुम मिट्टी थे, ये सोना […]

कौन सुनेगा अपनी बोलो, अब किससे करिये फरियाद

April 22, 2022 0

सत्याधर (कुरसठ, हरदोई)- कब तक दिल का रोना रोयें,अब मत करिये उसको य़ाद ।जितनी गुजरी रो-रो गुजरी,शेष जो है ना कर बरबाद । खाकी, खादी, मुंसिफ, मुजरिमसब मिल बैठे हैं फिर तोकौन सुनेगा अपनी बोलोअब […]

गाँव बस खेत वालों का कभी भी नहीं रहा

April 22, 2022 0

योगेश समदर्शी (हास्य एवं ओज कवि)- गाँव बस खेत वालों का कभी भी नहीं रहा गाँव के लिए धोबी, कहार भी जरूरी थे । नाई और धीमर व बढ़ई जुलाहा सभी गावँ की व्यवस्था में […]

कमज़ोर बुनियाद

April 21, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा- जिंदगी कितनी उबड़-खाबड़ रास्तों को तय करती हुई चलती रहती है । शुरुआत भी कठिन और अंत भी, मिलते हुए राहगीर भी छल द्वन्द्व से भरे हुए है हुकूमत का अच्छा नकाब चेहरे […]

ज़िन्दगी को मैने नज़दीक से निहारा है

April 21, 2022 0

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी- जिंदगी को मैंने नजदीक से निहारा है । जेठ की दुपहरी में देखा बदन जलता हुआ। पसीने की बूंदो से तर बतर , वो काला नर, बैलों के साथ मे ही […]

कूड़ी के गुलाब

April 20, 2022 0

अमित धर्मसिंह- गमले के गुलाब की तरह नहीं,हम कुकुरमुत्ते की तरह उगे । माली के फव्वारे नेनहीं सींचीं हमारी जड़ें,हमारी जड़ों नेपत्थर का सीना चीरकरखोजा पानीकुटज की तरह । कुम्हार के हाथों ने नहीं गढ़ा […]

फागुन की बयार

April 20, 2022 0

  उषा लाल– फागुन की बयार मनभावनपूनम का है चाँद ,जले होलिका अबकी ऐसीहर ले सबकी क्लांत !हो गुलाल रस प्रेम रंग कापिचकारी में प्रीत!गले मिलें सब इक दूजे केगिरा द्वेष की भीत!दहन करें अपने […]

कविता : कहाँ हैं आप ?

April 20, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा- बात कुछअटपटी सा लगी होगीलेकिन बात शुरू हुई,कहा हैं आप ?शायद मन झल्ला गया होगानिःसन्देह दोनो ही !आखिर ढाई शब्द के प्रश्न का उत्तर मिलाक्यों ?मौन एक क्षण होकरमायूसी ने दस्तक दे दीबस […]

जिंदगी आग है संघर्ष की तपते रहिये

April 20, 2022 0

डॉ.अन्नपूर्णा सिसोदिया ‘अमन’- जिंदगी आग है, संघर्ष की तपते रहिये हर लपट से कुंदन बन निखरते रहिये । अरुणिमा की रेख बन करती उजली राहें जिंदगी भोर है, हर घडी चलते रहिये । सुगंध सी […]

कड़वा घूंट

April 19, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा- किसी पुरुष के सानिध्य में रहकर, स्त्री वाद की बात करे तो पूरी तरह से छिछलापन हैं कुरूपता लिए बेगढ़न्त बातें उतरती नहीं कड़वे घूंट की तरह पूजती हैं पत्थरों में अमरसुहाग के […]

सारे सपने गिर जाते हैं , पत्तों जैसे पीले होकर

April 19, 2022 0

डॉ० दिवाकर दत्त त्रिपाठ (चिकित्सक/युवा गीतकार)- कभी कभी इस उर की पीड़ा, पतझड़ जैसी हो जाती है ।रंग बिरंगी दुनिया , यह जब सेमल फूल सरीखी लगती ।कोयल की वह कूक कर्णप्रिय, कानो को तब […]

हँसी कभी धूमिल नहीं होती

April 18, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा (बस्ती)- सब गलियाँ सुनसान हैंखनकती आवाजें भी ख़ामोश हैं बचपन कमरों में कैद हुआ स्वयं के जीवन का बोध करता हुआअपनी माँ के प्रेम से दूर हैं गलियों में अंधेरा घना जीवन को भेदता […]

प्रेम में डूबी दर्द से भरी एक दास्ताँ

April 18, 2022 0

डॉ. आकांक्षा मिश्रा, बस्ती (उ. प्र.) प्रेम में डूबकर जख्म खाई लड़कियाँ आखिर हार जाती हैं ..। जीवन का हर दाँव , संवरने से पहले ही बिखर जाती हैं ..। जीवन से भी ; मंजिल […]

निराश क्यों ?

April 18, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा, बस्ती उत्तर -प्रदेश-  हे मनुष्य ! तुम कभी विफल नहीं हुए फिर अकारण निराश क्यों ? कल्पना के अधीन होकर स्थिरता का कैसा विस्तार कर रहा है मनुष्य । प्रकृति का स्पर्श ही […]

ग़ज़नी-गोरी मिल गये, लूट रहे अब देश

April 18, 2022 0

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–ध्यान बँटाने के लिए, तरह-तरह की खोज।मन्दिर-मस्जिद लड़ रहे, हर पल हर दिन रोज़।।दो–सत्ता चेरी बन गयी, कुरसी चिपकी देह।रड़ुवा-रड़ुवी संग हैं, माग भरी है रेह।।तीन–ग़ज़नी-गोरी मिल गये, लूट रहे […]

लगे आग चारों दिशा, चादर ले तू तान

April 18, 2022 0

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–धर्म कहे दुनिया जिसे, भटका-भटका ज्ञान।कर्ममार्ग अज्ञात है, अटका-अटका ध्यान।।दो–महँगाई मुरदा हुई, मस्जिद हुई जवान।मन्दिर धन्धा बन गया, काट रहे सब कान।।तीन–बाबा बुल्डोजर बने, चला रहे हैं बाण।कहाँ न्याय-अन्याय है, […]

आँखें जिधर घुमाइए, दिखते हैं सब सूर

April 17, 2022 0

◆ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–सत् संवाद-शून्य है, लुप्त धरा का धाम।कलियुग को हम क्या कहें, जहाँ फँसे हैं राम।।दो–राम-नाम की लूट मे, भक्त फँसे हनुमान्।नेत्र घृणा की बन्द कर, सन्मति दे भगवान्।।तीन–भाँज रहे तलवार […]

तेरी इन झील सी आंखों में, जो ये नूर दिखता है

April 16, 2022 0

Pawan Kashyap- तेरी इन झील सी आंखों में, जो ये नूर दिखता है । तेरे चेहरे की मदहोशी में, ये मन चूर दिखता है । कहीं जुल्फों का गिर जाना, कहीं अधरों का खुल जाना […]

मनुष्य देवता 

April 16, 2022 0

सुधेश – ३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १०,  दिल्ली ११००७५  भारत की जनसंख्या थी जब तैतीस करोड़ तब उतने ही थे देवता आज सवा सौ करोड़ में कितने देवता है ? शायद कुछ […]

आँधी मेँ औँधा पेड़

April 16, 2022 0

सुधेश- पास के बगीचे मेँ एक बूढा पेड आँधी मेँ औँधे मुँह पडा था न माली पास आया न लकडी चोर धूप मेँ सूखा पानी मेँ गला यतीम सा पडा रहा कमबख्त मरने को। महीनोँ […]

पत्थर हो जाऊँ 

April 16, 2022 0

डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)- यदि पत्थर हो जाऊँ और कोई उस पर फूल चढ़ा दे तो पत्थर भी पुजने लगता है वहाँ खड़ा होता है मन्दिर भक्तों की लगती भीड़ […]

अभी रुको

April 16, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा (अध्येता/लेखिका)- उसने कहा बार -बार मृत्यु नहीं होगी जीवन को जोड़ने के लिए पीड़ा देती है मैं चाहता हूँ हर वक्त साथ रहूँ प्रकृति रहने नही देती रूपक में अभी रुको तुम्हे निकट […]

मंज़िल 

April 16, 2022 0

डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय )

कविता : चींटी 

April 16, 2022 0

डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) ३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १० – सरकती सरकती चढ़ गई हिमालय कुछ दिनों बाद कोरी चमड़ी में खाज उठी सोचा एवरेस्ट की सैर करूँ […]

गदहे भाई

April 16, 2022 0

Babulal Dahiya- गदहे भाई बड़े खधाई दिन भर जागर प्यारा। मुँह अंधियारे निकर गया ता बहुरा लउटत ब्यारा।। लदी रहय पीठे मा गोनिया ढोबा पथरा ईटा। जहां न ठेलन कय पइठारी अतरिउ खोतरी हीठा।। मालिक […]

अव्यक्त

April 16, 2022 0

अमित द्विवेदी- एक पाषाण सा है मेरा अंतस जब कलम की नोक से तराशता हूँ तो साकार हो जाते है कई अनसुलझे रिश्ते कुछ अनकहे।

बाहर लाखों का मौसम 

April 16, 2022 0

डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)- भीतर ज्वर में तन तपता बाहर कोकिल कूक रही मीठी वाणी भीनी भीनी बयार सरकती कत्थक नर्तकी सी । भाई ज्वर जल्दी उतरो बाहर लाखों का […]

जागर्ति और सुषुप्ति

April 16, 2022 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रयागराज के सघन पदातिक पथ परविश्रान्त-क्लान्त शयन करती प्रौढ़ा,आजीविका-साधन से समन्वय-सामंजस्य स्थापित करती;अद्भुत एकान्वित और पार्थक्य केआचरण की सभ्यता प्रदर्शित करती;अवचेतन से साक्षात् करती,मानो सांसारिकता से सुदूरकिसी निभृत निलय में […]

आशीर्वाद की अभिलाषा

April 15, 2022 0

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (लेखक/कवि, पत्रकार {हिन्दुस्तान} एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ )- गुरु पितु मातु प्रणाम तुम्हें, तुम बिन कौन हमारा है | बतियाने वाले बहुत दोस्त, संकट में कौन सहारा है || हे स्वर्ग के वासी […]

एक गीत होरी का गोदान

April 15, 2022 0

 दिवाकर दत्त त्रिपाठी- होरी का गोदान कभी क्या हो पायेगा ? पाँच पाँच करके हैं बीते साल कई ।चोर उचक्के हुयें हैं मालामाल कई ।खादी पहन के कइयों देश को लूट रहेखादी बुनने वालें हैं […]

सोच रहा हूँ एक गीत लिखूं

April 15, 2022 0

पिण्टू कुमार पाल- सोच रहा हूंँ एक गीत लिखूं, मेरे मन का मीत लिखूं, या तेरे मन की प्रीति लिखूं, प्रकृति का सौन्दर्य लिखूं, या विधवा के मन की व्यथा लिखूं, कहाँ हैं आप ? […]

चिठ्ठियाँ तुम्हारे नाम की

April 15, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा- तुम्हें….!!कभी-कभी चिठ्ठियाँ लिखाकरुँगी । चिठ्ठियाँ तुम्हारे नाम की पता मेरे घर का ही होगापढ़कर खुश तुम होना कुशल मेरे परिजन का ही होगा ।सिहर जायेगा हृदय…….ये जानकर , तुम्हारे द्वार परदिया आज भी जलता […]

कहाँ हैं आप ?

April 15, 2022 0

आकांक्षा मिश्रा- बात कुछ अटपटा सा लगा होगालेकिन बात शुरू हुई,कहा हैं आप ? शायद मन झल्ला गया होगानिःसन्देह दोनों ही !आखिर ढाई शब्द के प्रश्न का उत्तर मिलाक्यों ? आशीर्वाद की अभिलाषा मौन एक […]

इश्क़ की बातें अक्सर महँगी पड़ती हैं

April 15, 2022 0

इश्क़ की रातेंऔर इश्क़ की बातेंअक्सर महँगी पड़ती है। ज्यादा समझदारी औरलगी हुई इश्क़ बीमारीअक्सर महँगी पड़ती है। गैरों के साथ यारी औरअपनों के साथ गद्दारीअक्सर महंगी पड़ती है। जरूरत से ज्यादा समझदारीऔर गैरों से […]

कविता : मृगमरीचिका

April 14, 2022 0

राश दादा राश (दार्शनिक/साहित्यकार)- जमीं से उठता वो ;जो आसमाँ नजर आता है ये सही नहीं वो आशियाँ बनाता है बलुआई रेत के संशय सुखद लुभाए ,, ,, मृगमरीचिका जो टूटे धैर्य का बन्धन करूँ […]

गजल : प्रेम की जानकी का हरण हो गया

April 14, 2022 0

दिवाकर दत्त त्रिपाठी- शुष्क मरुभूमि अंतःकरण हो गया । दर्द का देख फिर अवतरण हो गया । भावना का जटायू हताहत हुआ, प्रेम की जानकी का हरण हो गया । कुछ नये पंथ थे ,पर […]

गीत- कलम-कबूतर

April 14, 2022 0

राश दादा राश, बंगालुरू ये कलम है मेरी शोख ए अदा कबूतर बनकर उड जाती । हर छत पर जा दाना लाती कभी रात अंधेरे खो जाती ।  कभी गुटुर गुटुर करती चलती कभी बडे […]

कविता – स्त्री

April 14, 2022 0

डॉ. आकांक्षा मिश्रा-   एक स्त्री आधी से ज्यादा दूरी अकेले तय करती हैं , तुम्हारे सारे अधिकारों को कर्तव्य मानकर सफर जारी करती हुई तुम्हें मुक्त कर देती हैं मुड़कर मत देखो , अधूरी रहेगी […]

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