आज (२८ अगस्त) फ़िराक़ गोरखपुरी की जन्मतिथि पर विशेष
◆ आज (२८ अगस्त) फ़िराक़ गोरखपुरी की जन्मतिथि है। “ख़बर दो हुस्न को, मैं आ रहा हूँ”– फ़िराक़ गोरखपुरी — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़िराक़ एक फक्कड़ व्यक्तित्व का नाम है। पाँव से सिर तक […]
◆ आज (२८ अगस्त) फ़िराक़ गोरखपुरी की जन्मतिथि है। “ख़बर दो हुस्न को, मैं आ रहा हूँ”– फ़िराक़ गोरखपुरी — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़िराक़ एक फक्कड़ व्यक्तित्व का नाम है। पाँव से सिर तक […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भोजपूरी के हड़ाह लिक्खाड़), परियागराज भोजपूरी ‘चिनियाबादाम’ न हवे ए बाबू कि अँगुठवा दबाई के फोरि देहला आ मुँहवाँ में ढुकाइ लेहल। जेकरा फराकी ठोकला के बदिया……धोवे के सहूर ना […]
नेपथ्य से जब चेतना ने, वेदना का विष पिलाया।संदली ज़ज्बात लेकर, चाँद ने हमको पुकारा।। अमूर्त थी जो पीर अब तक,मूर्त हो खिंचती लकीरें।वार देने पर तुली वो,निज भ्रमों के सब ज़खीरे। सुरमई आँखों से […]
नेह की यज्ञवेदी सजाकर प्रिये!सब हविष् के लिए खोजने तन चले।मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए,कुछ निमिष के लिए मोहने मन चले।। आस-विश्वास के आसनों के तले,ज्ञान-विज्ञान सारे दबे रह गये।मन को स्थिर किये बैठे विनियोग […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ख़ुद को टटोलकर, टटोलता अब उन्हें,अपनी सदा सुनकर, देता हूँ सदा उन्हें।किस बात पर मुझसे, वे पराये हो गये?पैठकर गहराई में, तोलता हूँ अब उन्हें।एहसास यों ठण्ढा रहा, कुछ सका […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उठ रही है हर लहर आँखों के सामने ,गिर रही है हर लहर आँखों के सामने।बेहयाई कर रही हक़ीक़त-अफ़्ज़ाइश,गिर रही है हर हया आँखों के सामने।ज़माने की दुश्वारी से भला […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हवा यहाँ उदास कुछ, धुन्ध आस-पास कुछ। गुब्बार-ही-गुब्बार है; चलो! कहीं दूर चलें। रूप-रंग नहीं निखरे, गेसू सब ओर बिखरे। संयम अब चंचल है; चलो! कहीं दूर चलें। घर-द्वार साँय-साँय, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मुझे ऐसा कोई भी व्यक्ति पसन्द नहीं है, जो कहता कुछ हो और करता कुछ हो। ऐसों से मैं दूरी बना लेता हूँ। अधिकतर ‘लिक्खाड़’ और ‘वाचाल’ लोग ‘महिला- स्वातन्त्र्य’ […]
जगन्नाथ शुक्लम ✍️ (प्रयागराज) : पैरों तले ज़मीन नहीं है, आसमान में कैसे खिलता?बिना मुखर व्यक्तित्व बनाये, यहाँ हमारी कौन सुनेगा? मानदण्ड की सीढ़ी टूटी,टूटी मानवता की रीढें।आड़े-तिरछे चलने वालों;को ही मिलते ऊँचे पीढे।। दिल […]
चाल, चरित्र औ चेहरा, कैसे-कैसे लोग ।कथनी-करनी में लगा, जैसे विकृत रोग ।।जैसे विकृत रोग, समझ न आती माया ।भोले- भाले दीखते, तले स्वार्थ की छाया ।।खुद पर संकट जब पड़े, चहें मदद कर जोड़ […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–आज़ादी किस काम की, है ज़बाँ पर ताला।अंग-अंग विष से भरा, मन कितना है काला।।दो–नरक बनाये देश को, लाकर गन्दी नीति।आह बटोरे जा रहे, अजब-ग़ज़ब की रीति।तीन–ख़ुद को अब आज़ाद […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–दिखता देश ग़ुलाम है, हम पर है परहेज़।निजता सबकी है कहाँ, ख़बर सनसनीख़ेज़।।दो–संकट दिखता बाढ़ का, नहीं किसी को होश।“त्राहिमाम्” हर ओर है, जन-जन में आक्रोश।।तीन–प्रश्न ठिठक कर है खड़ा, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–रोज़गार सब खा गये, नौजवान हलकान।नीति बदलती रोज़ है, अटकी सबकी जान।।दो–हिन्दू भगवा नाम पर, ठगते हैं हर रोज़।जनता मोहित हो रही, तरह-तरह की खोज।।तीन–काग़ज़ पर है दिख रहा, देश […]
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ नयी सुबह की आहट पाकर,अलसाया भारत जाग रहा है ।जो जन गण मन को फांस सके,वो जाल बहेलिया डाल रहा है ।सब्ज़बाग अच्छे होते हैं खुद के ही,इन्द्रजाल में फंसकर क्यों […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनींदी आँखों से वे ख़्वाब चुराये जाते हैं ,लरजते होठों से इक बात दबाये जाते हैं।राज़दार चेहरा लिये आये हैं बहुत दूर से,जनाब आँखों में इक बात छुपाये जाते हैं।सच […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जीवन अब मझधार में, नदी-पार है गाँव।नहीं सहारा दिख रहा, नहीं है कोई ठाँव।।दो–आश्वासन हर रोज़ का, मृत्यु दिखाती आँख।साहस उड़ पाता नहीं, क़तर दिया है पाँख।।तीन–चिपकी तन सन्तान है, […]
आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक) : कृष्ण-कृष्ण ,करते-करते कितने भवसागर पार हुए।धर्म की रक्षा करने कोप्रभु के सारे ‘अवतार’ हुए।जब-जब धरती पर बढ़ादुष्टों का पापाचार,तब-तब मानव बनके आये प्रभु करने संहार।अमर प्रेम का गीत है,राधेकृष्ण का […]
अपने दिल की कहते जाओ,मेरे दिल की कौन सुनेगा।कहीं अकेले खो ना जाऊँ, सुनना मेरी मज़बूरी है। नीचे घासें रौंदी जातीं,ऊपर मलमल की कालीनें।भ्रष्टाचार मलाई काटे,जूते पोंछ रहीं तालीमें। अंदर-अंदर धधक रहा हूँ,कौन हमारी तपिश […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कहूँ वा न कहूँ, फिर चुप भी रहा नहीं जाता,तदबीर!१ तू ही बता इस चुप्पी का राज़ क्या है?दो–सूरत बेमानी है, तस्वीर बनाये नहीं बनती,सीरत२ अनजानी है, तासीर३ जो नहीं […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राम-आचरण है कहाँ, किसमें कितना राम।पाप-पंक में पाँव हैं, कहते जय श्री राम।।राम जानते भक्त को, छद्म जानते राम।छली-प्रपंची भक्त हैं, राम जानते नाम।।अंकुश से जो दूर है, राम न […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वक़्त-बेवक़्त की स्याह परछाइयाँचुपके से दाख़िल होती हैंमेरे अँधेरे घर में।अट्टालिकाओं के भार सेलहूलुहान नीवँकब दम तोड़ देगी,इसे वक़्त भी नहीं जानता;क्योंकि वह जी रहा होता है,अपना वर्तमान।बेवक़्त तो एक […]
चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–चिलमन गिराओ-उठाओ कोई फ़र्क़ नहीं,निगाहों से गुफ़्तुगू कर तीरे नज़र लौटे हैं।दो–हमीँ ने दिया पर्द: तो हमीँ से पर्द:, क्यों पर्द:?फ़क़त पर्द: के लिए पर्द: तो फिर क्या […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राम विराजित हो गये, बन्द हुआ अध्याय।उन्मादी व्यवहार से, किसने क्या है पाय?राम-आचरण ग्रहण कर, सबको लाओ पास।रामराज संकल्प है, श्रद्धा और विश्वास।।करते पूजन भूमि का, मनमन्दिर से दूर।हिन्दू-मुसलिम भेद […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रामभूमि के नाम पर, जुटने लगा समाज।छोड़ गये हैं राम जो, कौन करेगा काज?राजनीति में राम हैं, नहीं सत्य का मेल।विफल मनोरथ दिख रहे, दिखता केवल खेल।।राम कहाँ हैं रह […]
अब रची जाती है घर-घर महाभारत;राजसभाओं से विदुर रहते नदारत।क्यों कोई द्रुपदात्मजा हरि-पथ निहारे;अब न रहती है वो पतियों के सहारे।अब न केवल फनफनाती है;कोर्ट में नंगा नचाती है। अब न मीरा भजन गाती है। […]
क्यों ना थोड़ा सा अबऑफलाइन हुआ जाए,जिनसे सालों पहले बात हुईउन्हें फिर फोन किया जाए । कुछ वो अपनी सुना दें और कुछ हम अपनी, क्यों ना फिर से वो दौर शुरू किया जाए ।।आसपास लोगों से मिलकर नयी […]
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन की जन्मतिथि १ अगस्त पर आयोजित बौद्धिक परिसंवाद हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की ओर से १ अगस्त को सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र की अध्यक्षता में ‘राजर्षि टण्डन जी की सत्ता […]
● ख़ुदग़रज हँसी बनाम ख़ुद्दार तबस्सुम सच, हँसी कितनी हसीन होती है और गुस्ताख़ भी कि आप चाहकर भी उससे अलग नहीं हो सकते। शातिर हँसी तो इंसान की फ़ित्रत का बाख़ूबी बयान करती है। […]
● प्रेमचन्द की जन्मतिथि ३१ जुलाई पर विशेष ‘सर्जनपीठ’, प्रयाग की ओर से आज प्रेमचन्द की जन्मतिथि के अवसर पर ‘प्रेमचन्द– एक सार्वकालिक कथाकार’ विषयक एक सारस्वत आयोजन अलोपीबाग़, प्रयागराज में किया गया। आयोजन की […]
● आज (३१ जुलाई) प्रेमचन्द की जन्मतिथि है। — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कथा-विषय पर जब संवाद-परिसंवाद होता है तब समीक्षक पारदर्शिता के साथ ‘प्रेमचन्द’ से आगे बढ़ नहीं पाता है। यह अलग बात है […]
महेन्द्र महर्षि (सेवा निवृत्त; वरिष्ठ प्रसारण अधिकारी) गुरूग्राम : बुद्ध प्रकाश का सपना अभी और आगे भी चलता , मगर ऐसा नहीं होता कि सपनों का संसार वास्तव में साकार होता ही हो। सुबह की […]
☆★ एक गीत★☆ जगन्नाथ शुक्ल…✍️ (प्रयागराज) बी०ए० कर के, भैंस चराते, अक़्सर अपना सिर धुनता है;राजू नहीं अकेला जग में, क़िस्मत से जो लड़ पड़ता है। दो बीघे की बड़ी किसानी,दो बैलों के चले सहारे।मारकीन […]
मौन हृदय की पीड़ाओं का जटिल व्याकरण बहुत सरल है;भूखे मन को पढ़नेवाली केवल एक अकेली अम्मा । हाथ में मेंहँदी पाँव महावर,डोली अरमानों की आई।हर रिश्ते का धर्म निभाती,चाची, बहू कभी भौजाई।। विग्रह का […]
जयति जैन ‘नूतन’ – हां तुम्हारी बातें करती है मुझे परेशानऔर मैं बेहद परेशान हो जाती हूं,कुछ देर खुद से झगड़ लूंतो बेहद शांत हो जाती हूँ ।मुझे पता है तुम्हें पसंद नहींमेरे संग बातों […]
आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक) सभी को प्रेरित करते हैंजीवन के गीत,मुसकाते होंठ,मुसकाती आँखे,खिले हुए चेहरे,खिलते फूल,चहचहातीं चिड़ियाँ,उमड़ते-घुमड़ते बादल,बरसती बूँदें,फलते हुए वृक्ष,बहती हुई नदियाँ,अडिग चट्टानें,आकाश चूमते पर्वत,सूरज की लाली,लहलहाती हुई फ़सलें,ढलती हुई शाम,विश्राम प्रदान करती रात्रि,शीतलता […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बज़्मे-महफ़िल की शान है कोठा,दौलत औ’ हुस्न का ईमान है कोठा।यों ही कोई रक़्क़ाशा बनती भी नहीं,लाचारी-मज्बूरी का नाम है कोठा।तवायफ़ का जिस्म रंगीनिये-शवाब,रंगीनिये-हयात की पहचान है कोठा।रंगीनिये-तबस्सुम का असर […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश,पल रहा है तुम्हारी कोख में;उसे न तो ‘राम’ की माला पहनानाऔर न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़;उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान,जिसका न कोई ‘धर्म’, […]
अनिल चौधरी (बैंक अधिकारी) दहेज़ की मंडी में सजी दूल्हों की दुकान देखिए,नोटों की हवस में लिपटे ये बिकाऊ सामान देखिए ।खुद ही लगाते हैं यहां ये अपने वजूद की कीमत,यहाँ सरेआम-खुलेआम बिकते ये इंसान […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय समय आया, कर विचार।देश की जनता है लाचार।शब्दबाण से बेधो इतना,राजनीति बदले आचार।खद्दर शर्म से पानी-पानी,चहुँ ओर दुर्गुण का सार।मर्दित मान सभी का देखो!धरती पर दिखते हैं भार।नेताओं से त्रस्त […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक भीगी हुई शाम की दहलीज़ पे बैठे,हम उनकी मक्कारी का सबब सोच रहे हैं।सियासी जाल में उलझ कर रह गयी ‘हिन्दी’,हम ज़ह्रीली नीयत का सबब सोच रहे हैं।कहते जिन्हें […]
आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक) जीवन संघर्ष में बढ़ते रहनाअपने लक्ष्य की ओरबिना रुके, बिना थके, बिना निराश हुए,अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति की थाती लेकर।अपना आत्मविश्वास कभी घटने मत देना।एक ज़िन्दगी में कई कठिनाइयाँ हैंकई सफलताएँ […]
जगन्नाथ शुक्ल ✍️ (प्रयागराज) आँसू वाले झरने से तन भीग रहा, मन सूख रहा;घाव हृदय के भरने को फिर कोई युक्ति सुझाओ ना। मन के आँगन में सावन,पतझड़ जैसा बर्ताव करे।रह- रह के चलती पछुआ,करती […]
—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जुल्म करके भी तुम मुकर जाते हो,ऐसी फ़ित्रत कहाँ से तुम लाते हो?दर्द का एहसास बेशक होता है मुझे,जब मुश्किलात में ख़ुद को पाते हो।मेरा रहगुज़र अब कहीं दिखता नहीं,बूढ़े ज़ख़्म […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जीव-जगत् भ्रमजाल में, ब्रह्म निकटता खोय।मानव दानव बन गया, फिर काहें को रोय।।दो–रूप-रूपसी-दंग है, दिखता ज्ञात अज्ञात।सार-सार से रहित है, मानव दिखे न ज्ञात।।तीन–विष-वल्लरी सृष्टि में, होता दूषित वात।जीवनरूप विरूप […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–भले ही चुप है आईन: तेरा,कब बोल पड़ेगा, नहीं मालूम।दो–आईन: को एहतियात से रखना,टूटा तो सारे राज़ बिखर जायेंगे।तीन–तुम हँसते हो, सताते हो और निभाते भी,सवाल है, टूटते ही बिखर […]
अभिव्यक्ति-शंख ————————- मेरे बाहुपाश के शब्दकोश सेस्नेह-सदाशयता-शालीनताअन्तर्हित हो चुकी हैं।मेरे पदचाप को सुनोऔर पग-रज को देखो–कोलाहल से परेआर्त स्वर का अनुभव करो–रक्त-रंजित मेरी आकांक्षा सेसाक्षात् करो।वर्जना की श्रृंखला+ में आबद्धमेरा अभिलाष,मेरी उत्कण्ठाआतुर हैं; उद्यत हैं; […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय श्याम-सलोनी आती सन्ध्या,सबके मन को भाती सन्ध्या।पश्चिम में जब लाली छाती,मन्द-मन्द मुसकाती सन्ध्या।पुरवा-पछुआँ ताल लगाते,तिनक धिनन-धिन् गाती सन्ध्या।चन्दामामा! देर में आना,हमको बहुत है भाती सन्ध्या।चीं-चीं चूँ-चूँ चिड़ियाँ करतीं,थिरक-थिरक इतराती सन्ध्या।रात […]
—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–खनक रही हैं चूड़ियाँ, करें सजन से बात।ऊपर-ऊपर प्रेम है, नीचे-नीचे घात।।दो–रुनक-झुनक पायल कहे, जीवन-प्रेमप्रसंग।पयजनिया हैं पाँव में, सुरभित होता अंग।।तीन–दमक रही है दामिनी, मेघ हुआ मदहोश।हरियाली मन हर रही, सौतन […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे ज़ख़्मों की तासीर बताओ तो जाने,मेरे ख़्वाबों की ताबीर बताओ तो जाने?तुम्हारे फ़न का कायल है ज़माना सारा,मेरी आँखों का काजल चुराओ तो जाने ?मेरी उल्फ़त बिनब्याही ही फ़ना […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जो भी मुक़द्दर की बात करता है,वह शख़्स ताउम्र लड़खड़ाता है।जुल्मो सितम से जो डर जाता है,ज़िन्दगी की ज़ंग में हार जाता है।आईन: ने ग़द्दारों से दोस्ती कर ली,जब भी […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निगाहें चुरा लो, मैं कहता हूँ,नज़रें चुरा लो, मैं कहता हूँ।चेहरे का नूर, उम्र पाने लगा,अरमाँ सजा लो, मैं कहता हूँ।ज़िन्दगी सिमटती परछाईं-सी,चाहत बढ़ा लो, मैं कहता हूँ।अज़्मत जाये, फिक्र […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय तू बूझ भा जनि बूझ, अब छोड़ि द ओकरा के,हम बूझनी सरसन्त से, तू बुझल जेकरा के।गली-गली कुकुरात रह, अब ठेकी ना कुछू,लोग थपरी बजइहें, बोली बोल जोकरा के।लुकाइ के […]
मेरे हृदयप्रान्त की साम्राज्ञी कामिनी कविते! तुम्हारे सर्वांग पर जब मैंने पहली बार दृष्टि-अनुलेपन किया था तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था, मानो प्रकृति-सुरभि तुम्हारे अंग-प्रत्यंग और स्निग्ध प्राणों पर ओस भीगे हुए पुष्प की […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमार देसवा के बेचि-बाचि, खा गइल ए नेता जी!असल आपन रूपवा, देखाइ गइल ए नेता जी!बाड़ा भरोसिया कई के, तहरा के जितइनी हम,आपन दाँव-पेंचवा, देखाइ गइल तू ए नेता जी!बेसरम […]
सुलेखा सुमन (भागलपुर, बिहार) : प्रेम व्यक्ति की भावनाओं कागहरा सागर है ।जिसमे डूबकर मनुष्यसच्चाई की मार्ग पर चलता है।जिसकी व्याख्या करना असम्भव हैवो है प्रेम।प्रेम वो सत्य है, जो सब कुछ असत्य होने का […]
अज्ञान के तिमिर से निकालकर आलोक देते हैं गुरु।आत्मा का परमात्मा से मिलन करवाते हैं गुरु।। अविनाशी अविकारी नित्य होते हैं गुरु।साकार रूप में पथ प्रदर्शन करते हैं गुरु।। शस्त्र व शास्त्र का ज्ञान करा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पूरब होता पच्छिम होता, सूरज-चाँद नहीं होते,धरती और आकाश भी होता, जीव-जगत् नहीं होते |हम भी होते तुम भी होते, सरोकार नहीं होते,कितना अच्छा होता हम, जब होकर भी नहीं […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बउराइ गइल मनवाँ,अझुराइ गइल मनवाँ।कबो घाम कबो छाहीं,खउराइ गइल मनवाँ।झमझमाझम बूनी,सझुराइ गइल मनवाँ।सोझा तहरा होखते,भहराइ गइल मनवाँ।चिंहुकला से ओकरा,अगराइ गइल मनवाँ। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ जुलाई […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–महकी अमराईचहका यौवनआग लगी पानी में!दो–आँखों-की खटासकोई आस-न-पासरिश्ते मुसकुरा उठे।तीन–काग़ज़ की नावबारिश की छाँवसूरज सघन चिकित्सा कक्ष में।चार–वर्तनी अकेलीसौन्दर्य-बोध लजीलाअभिव्यक्ति दरकने लगी।पाँच–प्रतीक सजीलाबिम्ब रंगीलाअभिव्यक्ति बहक पड़ी।(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आज कैलेण्डर में टँकी तिथिएक जुलाई,आँखों-में-आँखें डालतीन सौ पैंसठ दिनों की दैनन्दिनी उघारे,सिद्धहस्त ज्योतिषी-सदृश अतीत-वाचन कर रही है।आषाढ़-मास के उमड़ते-घुमड़ते बादल देख,कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-चूड़ामणिकवि-सम्राट कालिदास का‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है।पावस-ऋतु […]
तन्हाई में जीने का अंदाज अलग होता है।रूठने और मनाने का अंदाज़ अलग होता है।। दो जिस्म अलग अलग हो बेशक जमाने मे।रूह से रूह का मिलन मगर अलग होता है।। आसान नहीं बीते वक़्त […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ,कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ।जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर,क़ानून को भी आईन:, दिखातीं कुर्सियाँ।उधारी में जलता दिख रहा, ग़रीब का चूल्हा,अमीर का […]
डॉ. राजेश पुरोहित मैं दीप हूँ जलता रहूँगाराहें रोशन करता रहूँगारात के गहन तमस कोमैं पल पल हरता रहूँगा लोग बैठे जो रोशनी मेंउन्हें उजाले देता रहूँगाप्यार बाँटता आया हूँप्यार ही बाँटता रहूँगा मेरे तले […]
—आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रणय-पंछी विकल उड़ने के लिए,ताकता हर क्षण गगन की ओर है |किन्तु ममता की करुण विरह-व्यथा,ज्ञान-पथ को आज देती मोड़ है |धैर्य की सीमा सबल को तोड़ कर,दर्द की लतिका हरी […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रात घिरती रही, दीप जलता रहा।साज-श्रृंगार+ करती रही ज़िन्दग़ी,रूप भरती-सँवरती रही ज़िन्दग़ी।बेख़बर वक़्त की स्याह परछाइयाँ,उम्र चढ़ती-उतरती रही ज़िन्दग़ी।साध के फूल कुँभला गये द्वार पर,प्यास की तृप्ति का गाँव छलता […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय यक़ीन नहीं आतामैं ख़ुद को देख रहा हूँ।अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के गलियारे मेंमैं ढूँढ़ रहा हूँअपने न होकर भी हो जाने के साक्ष्य कोपर हर बारख़ुद को ख़ुद सेठगा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वह हवा क्या, जिसकी कोई रवानी न हो,वह वफ़ा क्या, जिसकी कोई दीवानी न हो।ये अन्दाज़े बयाँ जज़्बात की अँगड़ाइयाँ हैं,वह लफ़्ज़ क्या, जिसमें आग और पानी न हो।हिज़्र की […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उसकी आँखों में बियाबान सा दिखने लगा,पहलू में आते ही श्मशान-सा दिखने लगा।मुट्ठी में बँधी नज़दीकी रेत-सी सरकती रही,जाने क्यों बुझा-बुझा अरमान-सा दिखने लगा।सलीक़ेमन्द लोग ताउम्र मिलते रहे एहतिराम से,नज़र […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ओकर बियहवा बिदेसे में कराई दीहल जाऊ का? आपन ओनिए रहि के फरियावत रही। काहें से कि जब देख तब, ओकरा गोड़वा में शनिचरे चढ़ल रहेले। हमरा इहो लागता कि […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय देश की जनता जागो,विकल्प अब तलाशो।तल कर खा जायेगा देश को,गहरी नींद से सब जागो।पीड़ित हो कभी हमने कहा था,अँगरेज़ो! देश से अब भागो।अब जीना कर दिया दूभर उसने,लात मारकर […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हममें लाख मतभेद रहे, फिर भी,मनभेद की अब कोई गुंजाइश न हो।आवाज़ अब संग-संग उठे अपनी,फ़र्क़ की अब कोई गुंजाइश न हो।माना कि पेचोख़म हैं बहुत यहाँ,भ्रम की अब कोई […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनकी बातों में न आना, वे बनाना जानते हैं बेशक,उनके हाथों में न आना, वे फँसाना जानते हैं बेशक।वे तो सौदागर हैं, ख़रीद-फ़रोख़्त ही ख़ुदा है उनका,उनके घातों में न […]
— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़नकार हो तो अपना फ़न दिखाओ न,महज़ बातों में मुझको अब उलझाओ न।देखो! मंज़िल आर्ज़ू अब है कर रही मेरीमुझे बढ़ने दो, अब मुझको फुसलाओ न।कुछ बातें हैं ज़ेह्न में, सँभाल […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चाचा झगड़ू– अरे बेटवा रगड़ू! तुम्हार फटफटिया क का होइ गा? भतीजा रगड़ू– चाचा! इ बताव, तुम्हार उमर कित्ता होय? झगड़ू– अरे बेटवा साठ कै पार। रगड़ू– त एका कहा […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निभृत-निलय में वितान तानता मन,निश्शब्द-मूक याचना–सम्पृक्त उर्वशी-मेनका का तन।अनाघ्रात पुष्प-सा–सर्वांग सौन्दर्यस्वामिनी-द्वय की कान्ति,समग्र संसार-संसूचित–कमनीय कामिनी के क्लान्त कपोलों की भ्रान्ति।रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का आकर्षण,जीवन्त अदृश्य पथ–अप्राप्य संस्पर्श का विस्मित […]
—-आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–शुष्क पड़ी संवेदना, आहत निज सम्बन्ध।अजब खेल है मोह का, कैसा यह अनुबन्ध?दो–मेरा-तेरा किस लिए, माया से अब डोल।गठरी दाबे काँख में, द्वार हृदय का खोल।।तीन–छक कर अब है जी लिया, […]
—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चाचा झगड़ू– अरे बेटवा रगड़ू! भतीजा रगड़ू– चाचा! कई दफा बोला है, बेटा मत कहा करो। अरे! कछु लाज-सरम किहा करो। हम तुम्हार भतीजा हैं, भतीजा। भतीजा अउर बेटा मा बहुतै […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कल तक था जो जगद्गुरु, भ्रष्ट बन गया देश।दिखते सब बहुरुपिये, तरह-तरह के वेश।।दो–कुम्भकर्णी सब नींद में, नहीं किसी को होश।बाँट रहे सब देश को, लोकतन्त्र बेहोश।।तीन–क़लम बिकाऊ दिख रहे, […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जी चाहता, आग लगा दूँ अब पानी में,जी चाहता, ज़ह्र भर दूँ अब बानी में।‘इन्क़िलाब’ बोलने से कतराते क्यों?क्या ज़ंग लग गयी, तुम्हारी जवानी में ?हवा को पकड़ रुख़ बदल […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–तेरी चोंचलेबाज़ी-ज़ुम्लेबाज़ी सबने देख ली है,उलटी गिनती शुरू हो गयी, जनता अब जागने को है।दो–मुझसे कुछ पूछने से तुम्हें ‘तुम्हारा हासिल’ क्या?पगडंडियों को छोड़ता नहीं, ‘चौराहों’ पे जवाब देता नहीं।तीन–इन्क़िलाब […]
चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बाक़लम मैंने ‘सच’ की निगाहबानी की है,क़लमबेचकर तमाशा दिखानेवाले कहीं और हैं।दो–हवा मंज़ूर करती है, मेरी दीवानगी,उसे मालूम है, मेरी कैफ़ीयत का जुनूँ।तीन–ख़त और ख़ुतूत की बातें अब […]
चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–यक़ीं हो गया, वह क़ाबिले-तारीफ़ नहीं,खड़ा ज़मीं पे और उड़ता आसमाँ में है।दो–मैं जिधर जाना चाहूँ, जाने दो, रोको न मुझे,इशारों-इशारों में किसी रिश्ते का नाम न दो।तीन […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–नुमाइश किसकी लगी है, यह तो पता न चला,आँखें खुलीं तो जुम्हूरियत१ का हाथ बँधा पाया।दो–ज़ुल्मत२ हर सू, चिराग़ अब बन्धक है,एलान कर दो, रौशनी मैं उगाता हूँ।तीन :ज़ोरआज़्मा ज़ोरेबाज़ू […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बेचारा चाँद कसमसाहट में है,यहाँ ज़लील और जलील भी रहा करते।दो–चाँद की निगाहें किस-किस पे इनायत हों,“एक अनार सौ बीमार”-सा मंज़र दिखा करता यहाँ।तीन–चाँद का टुकड़ा-सा तेरा शफ़्फ़ाफ़१ बदन,कुछ दाग़ […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कैसे मान लूँ, सूरत कामिल१ चाँद-जैसा,उधार ही सही, सीरत२ होता चाँद-जैसा।दो–मेरे अशाइर३ चाँद को चाहते हैं बहुत,दाग़ के डर से चाँद को अलग करते हैं।तीन–चाँद देखने की आर्ज़ू पूरी न […]
एक ‘विद्रोही’ की डायरी ”डंके की चोट पर” अन्त:करण से निकले शब्द महासागर के तटप्रान्त के निभृत निलय (एकान्त स्थान) पर जब स्वयं को खड़ा पाता हूँ तब जीवन का सच्चा पक्ष मेरे समक्ष आ […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–आओ! हम ग़ौर करें, सदियाँ गुज़र रहीं,ग़ुलाम तहज़ीब को, क्यों ढो रहे हैं हम?दो–तुमने कहा, मैंने सुना, हो जायें चुप अब हम,दीवारों के कान, इधर तक सरक आये हैं।तीन–माना आप […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पथिक !परिचित पड़ाओं की प्रतीक्षाकब तक सहते रहोगे?अपरिचित राहें होतींतो पाँवों के छालेयों शिकायत नहीं करते।मरहम की तलाश में भटकनाकब भूल पाओगे?भिखारिन पगडण्डियों परकिसी पहचानी क़दमों की आहटजब-जब तुम्हारे कानों […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आँखों-ही-आँखों में बात हो जाने दो,बातों-ही-बातों में रात हो जाने दो।बनने-सँवरने लगे ख़यालात के झरोखे,रातों-ही-रातों में मुलाक़ात हो जाने दो।ज़मानाए दराज़१ जुस्तजू अधूरी रही,चाहत दीदार का, शह-मात हो जाने दो।आँखों […]
ज़ैतून ज़िया – जब होती है कोई तलाकतो दो लोग नहीं टूटतेटूटती है रसोई भीनमक,चीनी, मिर्च, हल्दीभर लिया जाता है पन्नी मेंडब्बे खाली हो जाते हैइलायची, लौंग और जीरे केधीमी आंच पर जो प्रेम पका […]
प्रिय भाई कोरोना! जुग-जुग जियो। इटली, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका आदिक देशों में तुम्हारा भाव बढ़ रहा था तब मुझे श्रीराम की तरह से कहना पड़ा था– अपि स्वर्णमय कोरोना पाश्चात्य देश: न […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मन-मस्तिष्क प्रश्नों कापिटारा बनता जा रहा है।अन्तहीन गह्वर मेंरह गये हैं तो प्रश्नों के छिलके।मूल को मुझसे दूर करसमझौतावादी दुनिया की प्रयोगशाला मेंपंचवर्षीय बिस्तर पर लेटाकरअनगढ़ पत्थरों की भाँतिअपरिपक्व हाथों […]
पहली पहली बार था उससे पहले घर में मैं मेरे यार था , फिर आया ऐसी दुनिया में जहाँ मेरे लिए अंधकार था ।मंजिल कहीं और थी रास्ता कोई और था इसलिए मैं शांत था ,उजाले की दुनिया में भी दिख रहा मुझे चारों तरफ […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भला यह कोई बात हुई, बातों-बातों में रात हुई। हमक़दम बन चलते रहे, मंज़िल के क़रीब घात हुई। मैं खड़ा रह गया दोराहे पे, वे आये और मुलाक़ात हुई। शातिर […]
शरदेन्दु मिश्र ‘राहुल’ बघौली मैं समाज का दर्पण हूं,अभिव्यक्तियो का वर्णन हू ।सुख दुख का मैं मिश्रण हू,हा मैं मौलिकता का चंदन हू।। हमने देखे है कुछ विकासपर अधिकता में विनाश।कलम चली तो ये बोलेकुछ […]
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ – डरता नहीं, न ही झुकता हूँ ।जो मन आए करता हूँ ।कहने को तो क़लमकार हूँपर सच कहने से डरता हूँ ।हमने गिरवी क़लम डाल दीसरकारी, दरबारी कोठों पर ।गाँधी […]