सखी! राह तुम अइसि बतायउ

May 27, 2021 0

सखी, राह तुम अइसि बतायउ ।चलतै गयेन, न मुड़ि कै देखेन,सही बात तुम नाय बतायउ ।आगे मिलो सून चउराहो,कउनिउ राह न हमइ सुझायउ ।सखी, राह तुम कइसि बतायउ ? पुनि प्रति राह भई दुइ डगरी।आठौ […]

एक ‘अपाहिज़’ दर्द

May 25, 2021 0

एक समीचीन (यथार्थ) अभिव्यक्ति ★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उस खूँटी को देख!जो शिथिल-सहमी-सकुची-संत्रस्त;क्रन्दन करती भार ढोती;फफकती-सिसकती;अपनी हथेलियों की लकीरों को बाँचती;आशंका-सिन्धु में डूब और उतरा रही है।विषाक्त होती उसकी काया-छाया सेउसका मौन करता प्रश्नकेवल […]

इंसानियत को खा गयी है, भूख आपकी

May 23, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय घड़ियाली आँसू, न अब बहाइए हुजूर!मन में हमारे क्या है, अब सुनाइए हुजूर!बातें मन की सुनाते हुए, सुला दिये हमें,चेहरा-पे चेहरा, अब न लगाइए हुजूर!तिकड़मी चाल आपकी, सब जान चुके […]

नीति देश की मनचली, छिनरे हैं सब ओर

May 11, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–गंगा में शव बह रहे, केवल दिखता रोष।शासक मद में चूर है, नहीं किसी को होश।।दो–क्रूर बहुत परिवेश है, साधन-सुविधा हीन।जनता ऐसी दिख रही, मानो कोई दीन।।तीन–हम अपने ही देश […]

भगवान कैसा होता है …….

May 9, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी : चलो ठीक हैतुम कहते हो तो मान लेता हूंकि मां में भगवान होता है,लेकिन मुझे यह तो बताओकि भगवान कैसा होता है ,मां ने तो कभी आंसू तक नहीं आने दियाफिर यह […]

आवर्त्तन और दरार

May 3, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–आग आग से कह रही, दु:ख में भी है सुख।सुख तो औरों के लिए, बाँध लो गठरी दु:ख।।दो–तिनका-तिनका जोड़कर, महल बनाया एक।आधी घड़ी न सुख मिला, रहने लगे अनेक।।तीन–कष्ट मिटाओ […]

उन्हें औक़ात पर अब लाइए साहिब!

May 1, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनकी बातों में मत आइए साहिब!उनकी घातों में मत आइए साहिब !हर गोट के मिज़ाज से वाक़िफ़ हैं वे,भूलकर धोखा मत खाइए साहिब!ख़ैरात भी माँगे तो मत दीजिए उन्हें,उन्हें औक़ात […]

यह है ‘जैविक युद्ध’, हाय! लड़ रहा मनुष्य अभागा

May 1, 2021 0

अभी समय है, अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है ।क्रूर-काल कोविड-19, चुप-छुप पास खड़ा है ।सम्भलो स्वयं, सम्भालो अपनों को भी प्यारे,‘जीता वही सिकन्दर’ जिसने विजयी युद्ध लड़ा है।। उसे पूछता कौन, हार कर पीठ […]

आज़ाद क़लम

April 30, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–चपटी धरती है कहीं, कहीं दिखे है गोल।आँख उठाकर देखिए, सब हैं पोलमपोल।दो–तुलसी औ’ कबीर सूर, सदा हमारे संग।क़लम आज हैं बिक रहे, दिखते नंग-धड़ंग।तीन–शिथिल पड़ी संवेदना, कपट हुई मन-बात।पहचानो! […]

अव्यक्त सत्ता जोड़ लो समष्टि से

April 30, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हो रहा है जो, जहाँ सो हो रहा।व्यर्थ ढपली, बज रही कर्त्तव्य की,भार भारी लग रहा, सब दिख रहे।गात शिथिल स्पष्ट सब लक्षित हुए,कौन जाने कौन-सा पल क्या रहे!बयार हलकी […]

खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो

April 24, 2021 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ खेलने की उम्र में फैले हैं हाथ देखो ।कुदरत भी क्या अजब हैइसके कमाल देखो ? तुतलाती भाषा में बच्चे,कितने प्यारे लगते हैं ।शैतानी कर-कर इठलाते,सबसे न्यारे लगते हैं ।जब ये […]

धू-धू जलती है चिता, लावारिस है रूप

April 15, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मातम पसरा हर दिशा, मुखिया दिखता मौन।कितना निर्दय दिख रहा, इसे बताये कौन?दो–लाशों का अम्बार है, चीख़-दहाड़ें रोज़।बेशर्मी है नाच रही, कौन करेगा खोज?तीन–बाप मरा-बेटा मरा, घर-घर छाया शोक।माँ का […]

Awakening and sleep

April 12, 2021 0

★ Acharya Pt Prithvi Nath Pandey On the dense road of AllahabadOld-fashioned sleeping adult,Co-ordinates livelihoods;Amazingly collected and segregatedDemonstrate a civilization of conduct;Interviewing the subconscious,As if far from worldlyA dreamed beauty in a closed ventricleShreya-Preya, with […]

मौसम वाणी बोलता, होंगे अबकी पस्त

April 10, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–आस्तीन के साँप सब, मत जाओ अब पास।कदाचार है दिख रहा, कर दो अबकी साफ़।।दो–कितने चतुर-सुजान हैं, हवाबाज़ी में दक्ष।सच की गरदन दाबकर, पाप का रखते पक्ष।।तीन–पाप घड़ा का भर […]

जो बैठे हैं तेरे साथ, वे बेईमान लिये फिरते हैं

April 9, 2021 0

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेजान हुस्न की, अदा लिये वे फिरते हैं,चश्मे पुरनम की, अदा लिये वे फिरते हैं।कज़ा लौट घर उनके, दस्तक दे आती है,साथ ज़िन्दगी का, सामान लिये वे फिरते हैं।तल्ख़ अन्दाज़ में, […]

समय की मुसकुराहट

March 17, 2021 0

★ बिम्ब-विधान और प्रतीक-योजना का अनुशीलन करें। आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आजमहुआटपकना भूल-सा गया है।फुनगी पर बैठी गौरैयाचहकना भूल-सी गयी है।तितलीपंखों को सिमटायेसशंक नेत्रों सेकुछ ढूँढ़-सी रही है।कोटर से झाँकता उल्लूबूढ़े अजगर की पीठ परक़दमताल-सा […]

अभिव्यक्ति के दंश

March 11, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–ऐ हुस्न की मलिक:! आँखें यों मला न करो,वही तस्वीर है, जो छोड़कर तुम आयी थी।दो–अब लौटकर न आयेगी फिर से बहार,मेरे आँसू में देख! चाँद-तारे डूब रहे।तीन–कैसे मान लिया […]

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का काव्य-वैभव

March 10, 2021 0

एक–‘राम’-भाव से शून्य हैं, ‘श्री’ से भी हैं हीन।भाड़े के ‘जय’ दिख रहे, मानो कोई दीन।।दो–देश तोड़ना रह गया, जिनके जिम्मा काम।हृदय हलाहल है भरा, बोलें जय श्री राम।।तीन–नारी! तू नारायणी, कवि कहता चहुँ ओर।अबला-सबला […]

सृष्टि पर जीवन का उद्देश्य व आधार है नारी

March 7, 2021 0

शिवांकित तिवारी ‘शिवा’ (युवा कवि एवं लेखक) “नारी” नम्र, नियम, न्याय, निष्ठा से परिपूर्ण एक अद्भुत निकेतन है।“नारी” संस्कृति, सभ्यता, संवेदना, संकल्प, स्वाभिमान, सम्मान, सद्गुण एवं स्नेह की सर्वश्रेष्ठ संरक्षिका है।“नारी” यानी सदैव क्रियाशील रहना, […]

कुछ यादें ऐसी भी

March 7, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी, रीवा शायद उस वक्त हम ना समझ या नादान होते हैं ,जब हम स्कूल में चार दोस्तों के साथ होते हैं ।हमेशा यही बातें करते हैं कि यार कब हमाराइस जगह से पीछा […]

तुमसे प्यार नहीं कर पाऊंगा

March 6, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी, रीवा, म०प्र० तुम डिजिटल युग की लड़कीमैं गांव के संस्कारों का बादशाह हूँतुम बुलेट से कॉलेज आने वालीमैं तो अपनी साइकिल का ही आदि हूँतुम जाम शकीला पीने वालीमैं तो अपने मट्ठा में […]

वक़्त-बेवक़्त

February 24, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमने जब सोचा,चैन से कट जायेगाज़िन्दगी का हर पल।समय ने दस्तक दी;एक गह्वर में डाल दी गयी,बटोरी हुई साँस;फ़ज़ा में उड़ा दी गयीं,मेरी बची-खुची रातें।मैं ठगा-सा देखता रह गयावक़्त की […]

मुट्ठीभर आकाश

February 19, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मुखड़ा मौखिक दिख रहा, दिखता करुणा-रूप।शोकाकुल परिवेश है, बनती मृत्यु अनूप।।दो–मौन निमन्त्रण मौन है, सूनी माँग न देख।सधवा विधवा बन गयी, कैसा विधि का लेख।।तीन :बचपन सिसकी ले रहा, क्रन्दन […]

उनका मिज़ाज

February 19, 2021 0

आकांक्षा मिश्रा, गोंडा गाँवों की गलियों सेनिकलकरशहरों में व्यवस्थित करने की होड़ लिएनिश्चित समय में पहलाउपक्रम रहामन अभी भी सरसों के खेतों में रमा रहामाँ आज उदास सी कमरे मेंअलाव तापती हुईयह कहती रही पिता […]

सरस्वती वन्दना

February 16, 2021 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ ओ वीणापाणि माँ ! ओ पुस्तक धारिणि माँ ! ओ ज्ञान दायिनी माँ ! ओ हंसवाहिनी माँ ! कर तम का संहार ज्ञान की ज्योति देती माँ । ओ वीणापाणि माँ […]

‘बाग़ी बलिया’ से प्रक्षेपित शब्दतीर : सियासत नंगी-जाहिल ज़ाहिर हो चुकी

February 16, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रिश्तों की अहम्मीयत अब जान जाइए,बुराई में अच्छाई अब पहचान जाइए।निगाहें ग़र तलाशी लेने पे उतर आयें,ज़बाँ को तसल्ली दे मुसकान लाइए।नज़रें इनायत हों तो एक बात मैं कहूँ,अपनी कथनी-करनी […]

बाग़ी बलिया से प्रक्षेपित शब्दतीर : जवाब देते हैं सवाल की तरह

February 16, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब वे लगने लगे हैं, जंजाल की तरह,चेहरा दिखता, किसी कंगाल की तरह।बातों-ही-बातों में, कुछ राज़ छुपा गये,जवाब देते हैं, किसी सवाल की तरह।आँखों पर है हर्फ़१ की, पर्द:दारी अब,उनकी […]

शहीद का भाई को पत्र

February 14, 2021 0

मेरे भाई बहुत दूर चला गया हूँ मै मेरी माँ से तू मेरा एक काम करना , उठना सुबह और रोज मेरी माँ भारती और तिरंगे को सलाम करना, कितना खुश नसीब था मैं माँ […]

नहीं भूलता बचपना

February 13, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी, रीवा नहीं भूल पाता मैं बचपनाछोटी-छोटी बातों पर रोनारोते रोते ही हसने लगनाअपनी बातों पर अडिग रहनाऔर फिर कुछ समय तक खाना नहीं खानानहीं भूल पाता मैं बचपना । हर किसी के साथ […]

तन्हाई

February 11, 2021 0

राहुल पाण्डेय ‘अविचल’ किसको फिक्र है इस जिन्दगी की ,हमने तो तूफानों से टकराना सीखा है ।किसको फिक्र है टपकते आंसुओं की,हमने तो दरिया से मुस्कुराना सीखा है ।रूठ जाए जिसको मुझसे रूठना हो ,हमने […]

युद्ध ही युद्ध है

February 10, 2021 0

आज कौन बुद्ध है,आत्मा से शुद्ध है।हर कोई प्रबुद्ध है,युद्ध ही युद्ध है। हर तरफ प्रवंचना,भंग साधु-साधना।भ्रांतियों के चित्र हैं,कुदृष्टि की भावना।विचित्र मित्र बन्धुता,स्वाभिमान क्रुद्ध है। युद्ध ही युद्ध है…. साधुता निरीह है,दासता सहीह है।शहर […]

ख़ामोशी

February 10, 2021 0

राहुल पाण्डेय ‘अविचल’ : खामोशी भी एक उलझन सी होती है ,जो चुप रहती है मगर सोने नही देती है ।लोग कहते हैं खामोशी गम दूर करती है ,मुझे तो नही लगता कि यह कुछ […]

क्या मैं पागल हूँ?

February 9, 2021 0

राहुल पाण्डेय ‘अविचल’ क्या मैं पागल हूँ?सोचता हूँ जब कभी इस विषय पर लिखने को तो आँखों में आँशू होते हैं,सीने में जलन,चेहरे पर खामोशियाँ और सिकन,माथे पर चिन्ता की लकीरें,फिर भी सोचता हूँ लिख […]

वो सपना था

February 6, 2021 0

शितांशु त्रिपाठी पहली पहली बार था उससे पहले घर में मैं मेरे यार था , फिर आया ऐसी दुनिया में जहाँ मेरे लिए अंधकार था, मंजिल कहीं और थी रास्ता कोई और था इसलिए मैं […]

टूटे दिल को जोड़ कर आया हूँ

February 6, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी, सतना खिलौनों की तरह दिल को तोड़ने वालोंदेखो मैं फिर से टूटे दिल को जोड़ कर आया हूँ ।पता नहीं क्यों अब हमारी दिल लगाने कीकिसी से हिम्मत नहीं होतीशायद मैं सारी हदों […]

व्यंग्य : नेताओं का बोलबाला

February 5, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी, सतना, हिनौती, मध्य प्रदेश संसद भवन में आजनेताओं का बोलबाला चल रहा है ।अब हमारे देश में सिंधिया जैसेनेताओं का जन्म हो रहा है । कोई खुद को बेच रहा हैतो कोई किसी […]

सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा

February 4, 2021 0

जगन्नाथ शुक्ल ‘जगन’, प्रयागराज : ऊँची-ऊँची मीनारों में, पसरा है भीषण सन्नाटा।सेंसेक्स की उठापटक में, रिश्तों का अस्तित्व है नाटा।। गाँव अभी तक करता आशा,बदली संकल्पों की भाषा।शंकाओं के मेघ घनेरे,घटा रहे जीवन-प्रत्याशा। होरी अब […]

चाँद ने हमको पुकारा

January 30, 2021 0

जगन्नाथ शुक्ल ‘जगन’ नेपथ्य से जब चेतना ने, वेदना का विष पिलाया।संदली ज़ज्बात ले कर , चाँद ने हमको पुकारा।। अमूर्त थी जो पीर अब तक,मूर्त हो खिंचती लकीरें।वार देने पर तुली वो,निज भ्रमों के […]

एक स्वछन्द अभिव्यक्ति

January 28, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बनता-मिटता चित्र यहाँ, जीवन बन अभिशाप।मीठे फल सब चख रहे, बनकर के निष्पाप।।दो–भाँति-भाँति-जन हैं यहाँ, चतुर-चोर-चालाक।वाणी कोयल कूकती, मन से दिखते काक।।तीन–मन से दिखते दीन हैं, तन से स्वस्थ-मलंग।देश को […]

माटी क्रन्दन कर रही, करता घोष किसान

January 26, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–लुटिया देखो डूब रही, जन-जन है हलकान।लाल क़िले-प्राचीर से, करता घोष किसान।।दो–महँगाई अब खा रही, दु:खी खेत-खलियान।निद्रा छोड़ो, जागो सब, करता घोष किसान।।तीन–मूँद आँख हैं सो रहे, नहीं ज़रा भी […]

बोलो जय श्री राम

January 25, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–देश कितना पिछड़ गया, दिखते नमकहराम।गिद्ध दिख रहे हर तरफ़, बोलो जय श्री राम।।दो–नारी हर दिन लुट रही, दिखते सब बेकाम।रावण घर-घर दिख रहे, बोलो जय श्री राम।।तीन–महँगाई की मार […]

बेटी की माँ से की गयी प्रार्थना

January 24, 2021 0

राघवेन्द्र कुमार ”राघव”- मत मारो मुझे मेरी माँ मैं टुकड़ा तुम्हारा ही माँ मत मारो मुझे मेरी माँ | खता क्या हमारी हमें भी बताओ जीवन हमारा माँ यूँ न मिटाओ , मैं साया  हूँ  […]

कलियुग का भगवान

January 19, 2021 0

मैं कलियुग का भगवानकोरोना बोल रहा हूंमैं जल्द ही आ रहा हूंकलियुग में अपनी माया रचनेअपनी मनमोहक सी लिएइस छलिया रूपी संसार को छलनेमैं आ रहा हूं मैं आ रहा हूं…….मैं कलियुग का भगवानकोरोना बोल […]

मूलमंत्र आजादी

January 18, 2021 0

आत्मबल अंतर में रख जिसने स्वतंत्रता दिलाई थी।गौरों को सबक सिखाकर जिसने वीरता दिखाई थी।। आज़ादी जिसका मूलमंत्र कसम देश की खाई थी।नेताजी संग नोजवानों ने ली तब अंगड़ाई थी।। दूर फिरंगियों को करने की […]

आज की सरकार पर लिखूं, कि हो रहे बलात्कार पर लिखूं

January 17, 2021 0

प्रान्शुल त्रिपाठी : लिखूं तो क्या लिखूंमातृभूमि के मान पर लिखूंकि स्वदेश के सम्मान पर लिखूंभारत के संविधान पर लिखूंकी विधि के विधान पर लिखूंलिखूं तो क्या लिखूं …… शहीदों की कुर्बानी पर लिखूंकि बापू […]

Salty samosas, white-sweet-balls

January 14, 2021 0

Hello, Hay, dear friends,Welcome you-smile blends,Innocent life, is full of delight,Shining, calming, smoothly wends. Richness is, a sickness now,Prosperity must be somehow,Why panting in heat of hope,Have satisfaction of a hallow. Look at what is, […]

तब मैं रो पड़ता हूँ……

January 3, 2021 0

आधा पेट खिलाकर जब मां खुद भूखे पेट सोती है, बीच चौराहे पर जब कोई बहन बेइज्जत होती है lदहेज के दानों के हाथों जब बेटी फांसी पर होती है, जब निर्भया को न्याय नहीं […]

ज़ेह्न में उसके फ़क़त ज़ह्र भरा रहता है

January 3, 2021 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–किसे रोकूँ और किसे कहूँ, चले जाओ तुम सब,निगाहों की तलाशी में पाक-साफ़ कोई दिखता नहीं।दो–आज हवा में बला की शोख़ी नाच रही,कल तक खिंचे रहे, आज चले आ रहे।तीन–ज़ेह्न […]

Hi dear friends, Happy New Year

January 1, 2021 0

Hi dear friends, Happy New Year,Celebrate it, is so dear ,Sunday-fun day, work day-done day,Round of clock, goes through year. The rising sun of new-year’s-day,Let us welcome, happy and gay,All the things look energizing,Let us […]

क्या तुम फिर से नववर्ष मनाओगे?

December 31, 2020 0

क्या तुम फिर से नववर्ष मनाओगेवो जो झूठे वादे किए थे क्या उनको फिर से दोहराओगेजिन्हें तुम आज तक माल कहते थेक्या उनको फिर से बहन बताओगेजिन्हें छोड़ आए थे वृद्धा आश्रम मेंउन्हें आज फिर […]

अतीत-अतीत होते मेरे सहयात्री

December 31, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अपने बलिष्ठ कन्धों परतीन सौ पैंसठ दिनों के भारपल-पल लाद करमुखमण्डल पर निष्कामता का भाव लियेअनवरत-अनथक यात्रा करते-करतेअतीतोन्मुख हो रहे मेरे सहयात्री!तुम क्लान्त हो चुके हो;शिथिल गात हो चुके हो।तुम्हारा […]

दृष्टिबोध का वाचन

December 31, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पसीने से हो तर-ब-तर,हवा चलती रही बेक़द्र।सूरज मद्धिम होता रहा,दीये-बाती-सा जलकर।गुस्ताख़ चेहरा बूढ़ा हो रहा,साल का ख़त्म होता सफ़र।आगाज़ अंजाम से यों बोला,”तूने बरपाये हैं बहुत क़ह्र।सीने पे मूँग तूने […]

निगाहें नज़र से कह रहीं, डर है बहुत यहाँ

December 30, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मन्दिर-मस्जिद के शंख-अज़ान बजते रहे,इज़्ज़त नीलाम होती रही, इक शख़्स न उठा।दो–इस धर्म के इतिहास में, धर्मराज भी यहाँ,द्रौपदी की चीख़ भी, सुनकर न सुन सके।तीन–कैसी विडम्बना है, इस धर्म-देश […]

एक अभिव्यक्ति

December 28, 2020 0

—- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ज़िन्दगी में अर्थ की परिव्याप्तिसुरसुरी-सी लगने लगी है।देह की खुरचनसायास-अनायासकेंचुल की भाँतिउतरती आ रही है।कालखण्डस्थितप्रज्ञ की भूमिका मेंअनासक्त योगी-सदृश“एकोहम् सर्वेषाम्” को अभिमन्त्रित करलोकजीवन को जाग्रत कर रहा है।प्रार्थना–स्वीकृति-अस्वीकृति की धुरी […]

जनवरी आ रही है

December 27, 2020 0

फिर एक बार दिसंबर जा रहा है माहेजनवरी आ रही है, बहुत खुश दिख रहे हो क्या सुकून की घड़ी आ रही है, ये तो बताओ दिन तारीख साल के सिवा कुछ और भी बदलेगा, […]

तुम बताओ तुम्हारे पास झूठे वादे और तानाशाही रवैए से ज्यादा क्या है ?

December 24, 2020 0

इं० शितांशु त्रिपाठी ●क्यों नहीं लिखता मैं?● क्यों नहीं लिखता मैं अब, अरे मेरे लिखने का फायदा क्या है ? पढ़ कर तुम भूल जाओगे मेरे लफ्ज़, इनकी इज्ज़त इससे ज्यादा क्या है ? बलात्कार, […]

आवर्तन और दरार

December 20, 2020 0

–आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–राजनीति में दिख रही, नहीं किसी की ख़ैर।तीर बात-बेबात के, करा रहे हैं बैर।।दो–तन-से-तन को दूर रख, मन-से-मन को जोड़।मानवता पहचान ले, मत कर तू अब होड़।।तीन–कपट रूप परहेज कर, माया […]

यह दुनिया फ़ानी है, क्यों डूबे अफ़्साने में

December 12, 2020 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रहो एहतिराम से, क्या रखा है, फ़साने में,यह दुनिया फ़ानी है, क्यों डूबे अफ़्साने में।इस जहाँ में सब तो पाक़ीज़ा नहीं दिखते,कुछ पापी भी हैं मेरे-जैसे, इस ज़माने में।उदास निगाहों […]

सुन बापू .. तेरे देश में

December 3, 2020 0

सुन बापू .. तेरे देश में, आम आदमी आम नहीं हैं, ईश्वर, अल्लाह, राम नहीं हैं, सत्य, अहिंसा कहीं नहीं है, नियत हमारी सही नहीं है, बेटी  हमारी  सेफ  नहीं  है, नेता   कहते  रेप  नहीं  […]

ऐसा मूरख देखिये, बेंचै सूखी घास

November 30, 2020 0

ऐसा मूरख देखिये, बेंचै सूखी घास ।कौन खरीदेगा भला, जिसमें तत्व न आस ।।घूमता गली- गली ।पूछता गली- गली ।। दोनो पलड़ों में धरे, मूरख बेंचै घास ।दून-दून दे डालता,होता नहीं उदास ।।बाँट से क्या […]

तलाश : एक नयी धरती की

November 26, 2020 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे मन के पाँवविश्वास की धरती काएक टुकड़ा खोजने के लिए निकल पड़े :–रिश्तों का; धर्म काअहम् का; त्वम् काअपने का; पराये का;किन्तु हर बार :–एक ऐसा भूचाल आया;धरती का […]

अब रऊआँ सभे सुनीं; नीमन लागी नू, तबे रँऊवा सभे थपरी बजाइब

November 7, 2020 0

एगो भोजपुरी ह ० आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जे-जे रहे दोस्त, सभ दुसमन होइ गइले,हमारा रहतिया में, सभ काँटा बोइ गइले।खूबे हँसी आवेला, ‘बाबू’ के चल्हकिया पर;जे सुरुज के गोलवा, चनरमा समुझि गइले।डूबत खूब देख […]

हे कृषक-पुत्र! हे लौह-पुरुष! हे भारत के तारणहारे!

October 31, 2020 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ जीवट जिनका लाखों जन कोसम्बल देता था ।जिनका हुंकार रौद्र होकरतूफ़ां बन जाता था । ऐसे वीर शिरोमणि को सिरशत-शत बार नवाता हूँ ।सरदार देश के हे युगसृष्टामैं तुमको पुनः बुलाता […]

जीय भोजपुरी-जीय आ फटहन के सीय!

October 21, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय नीमन भा बाउरखइका के गोड़़ लाग।बिजुरी के ठेकान ना;पानी के मारामारी।हगे के मैदान ना।सरकार अपना बंसरी में फँसइले बियासोचालय (शौचालय) के चारा देके गरई मछरिया।आ लड़पोछना के पतोहियाबँसवारी में जाइ […]

इहे ह भोजपुरी बाबू!

October 21, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ई मोछियामुड़ाइ लेहल!केकरा कहला पर?नीमन गँहकी बाड़।तनी कनखियाई के देखल सीखना तएक दिनमुड़ाइ जइब तुहूँ। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अक्तूबर, २०२० ईसवी)

सपरी त देखब, ना त राम-राम

October 21, 2020 0

इहे काहाला असलिका भोजपुरी — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ओइजा से केइजा?हेइजा कि होइजा?जगहि-जगहि के फरकअघाइ गइल जिनिगियादऊरत, भागत, हाँफत, खेदात।ना मनल–एगो टिटिम्हाओढ़ लेहल;सपरी त देखबना त राम-राम। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; […]

माता करो जग का उद्धार

October 19, 2020 0

जब-जब गलत हुआ धरती परआयी माता तुम बारम्बार । फिर से कष्ट एक आन पड़ा है आ जाओ फिर से इक बार ।माता करो जग का उद्धार । देखो मानव फिर त्रस्त हुआ है,बहुत हो रहा अत्याचार ।देखो […]

हम दरो दीवार में अपना नाम ढूँढ़ रहे हैं

October 15, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मैकश मैकदा में परीशाँ, जाम ढूँढ़ रहे हैं,हम ज़ख़्म की ख़ातिर, आराम ढूँढ़ रहे हैं।चेहरा-पे-चेहरे लगा, रंग बदलते हैं जनाब,हम अधर्मियों के घर, अब ‘राम’ ढूँढ़ रहे हैं।किस हद तक […]

इस रचना की काव्यांग, व्याकरण आदिक के आलोक में खुलकर आलोचना करें

October 13, 2020 0

★ इस रचना की काव्यांग, व्याकरण आदिक के आलोक में खुलकर आलोचना करें, स्वागत है। शक्ति व्यंजना-लक्षणा, अभिधा करे कमाल — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–भाषा ले रसगागरी, चली पिया के देश।लिपि अगवानी में रही, […]

सीना ताने सत्य पर, खड़े रहो तुम एक

October 12, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–हाथ जोड़कर हैं खड़े, कोई काम-न-धाम।नेता उनका नाम है, सबै बिगाड़ैं काम।।दो–चुनिए ऐसे लोग ही, जो जनता के पास।बाक़ी ठोकर मारिए, नहीं दिखे जो ख़ास।।तीन–कलियुगसमय-प्रभाव है, पाप पुण्य का रूप।छल-प्रपंच […]

शुक्रिया करो भगत सिंह!

October 11, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भगत सिंह!नोटों पर तुम्हारी फ़ोटोचस्पा नहीं हुई।मत भूलो!यह तुम पर मेहरबानी की गयी हैवरना मुन्नीबाई के कोठे परजिस्म के बदलेतुम्हारा भी सौदा किया जाता;मैख़ाने मेंमैकश के हाथों उछाले जातेऔर देश […]

चलो चलें ‘पृथ्वी’! इस बस्ती से अब दूर

October 8, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ग़म-ख़ुशी का फ़र्क़ महसूस होता है,अपना यहाँ न कोई महसूस होता है।सौग़ात में पाता रहा नायाब इक दर्द,रिश्तों में दरार अब महसूस होता है।जवानी ने भी छीन लीं किलकारियाँ,बुढ़ापे का […]

योगी! तेरे राज्य में जनता है मज़बूर

October 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अन्धकार है छा गया, शासक है बेहोश।पनही लगाओ मुँह पर, आये शायद होश।।जनता भी कुछ कम नहीं, चाटे शहद लगाय।‘हिन्दू’ ‘मन्दिर’ जाप कर, स्वर्ग सहज ही पाय।।पानी-बिजली दूर अब, सब […]

योगी! तेरे शासन में

October 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय न बिजली है न पानी,योगी का नहीं सानी।जनघाती नीति कहती–शासन है दुरभिमानी।आँखें खोलो, जागो भी,नहीं यहाँ है दाना-पानी।शासन नहीं, दुश्शासन है,आँख हो गयी है कानी।तन लोभी, मन भी लोभी,याद कराये […]

याद पुरानी घातें आयीं

October 4, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चिन्दी-चिन्दी रातें पायीं,फाँकों में मुलाक़ातें पायीं।मुरझायीं पंखुरियाँ देखीं,कही-अनकही बातें पायीं।बेमुराद आँसू छलके जब,याद पुरानी घातें आयीं।दुलराते बूढ़े ज़ख़्मों को,यादों की रातें गहरायीं।शातिर की चालों में हमने,ठगा-ठगा रह मातें खायीं। (सर्वाधिकार […]

न्याय-देवता कह रहे, लाओ! घर में सौत

October 2, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति।मन्दिर में मूरत दिखे, उड़न-छू हुई शक्ति।।दो–पट्टी बाँधे आँख में, देश जगाता चोर।भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब शोर।।तीन–अजब-ग़ज़ब के लोग हैं, शर्म-हया […]

रोज़गार की चाह में, उजले होते बाल

September 28, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जपो नमो-नमो माला, लिये कटोरा हाथ।कंगाली में देश है, दिखे न कोई साथ।।दो–देश की शिक्षा चोर है, चहुँ दिशि दिखें दलाल।रोज़गार की चाह में, उजले होते बाल।।तीन–देश विपक्षी ‘कोमा’ में, […]

मन हार गया तब तुम हारे, मन जीत गया तो जीते तुम

September 26, 2020 0

अनिल चौधरी ( बैंक अधिकारी ) इस क्रूर काल के हर रण में,हर अवरोहण आरोहण में ।तुम खुद ही खुद का संबल हो,जीवन संघर्षों के क्षण में ।। शूलों से छलनी पावों को ,पीड़ा से […]

आओ! हौसले की एक बस्ती बना लें हम

September 24, 2020 0

—- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–चाँदनी ने चोरी की और रौशनी ने लूटा,बेचारे चाँद और सूरज की गिरिफ़्तारी क्यों?दो–बेरहम-बेमुरव्वत की दुनिया बहुत निराली है,अपनी ख़ुद्दारी की गठरी को सलामत रख।तीन–बेकसी-बेबसी-बेक़द्री की ज़िन्दगी क्यों?आओ! हौसले की […]

ख़ूब पिलाया देश को चरणामृत उपदेश

September 19, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ऐ फ़क़ीर! अब लौट आ, संकट में है देश।छल-प्रपंच करता रहा, बदला तूने वेश।ठगा सभी को प्रेम से, कोयल-वाणी बोल।पर तू कौआ है दिखा, खुलती तेरी पोल।।भक्त बहुत हैं भीड़ […]

गुड नाईट…टू यू

September 15, 2020 0

उसकी नाईट क्या गुड होगी,जिसको नींद नहीं आती ।विश्लेषण करते- करते,व्यग्र यामिनी कर जाती ।। प्रात- उषा आलस भर देती,पथ पर भी चलना होता ।‘मूरख हिरदय’ तभी जागता,जब सब दुनिया सो जाती ।। नील गगन […]

पत्थर से जूझता अमलतास लिखता हूँ

August 31, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सदियों से भटकती, इक तलाश लिखता हूँ,हवा, पानी, आँधी और बतास लिखता हूँ।सूख रही ताल-तलय्या, अब दूभर है पानी,इस काइनात१ की, अब ख़लास२ लिखता हूँहमक़दम दग़ा दे गया, कुछ दूर […]

ज़ाहिर अब हर सम्त है, ज़ालिम है सरकार

August 29, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मन में बैठा चोर है, नहीं कहीं है ठौर।जनता-गठरी काटते, चोरों का है दौर।।दो–नाग विषैला दिख रहा, जड़ी बनी निरुपाय।लौट सँपेरे अब रहे, दिखता नहीं उपाय।।तीन–पानी-पानी हो रहे, यहाँ-वहाँ हैं […]

चाँद ने हमको पुकारा

August 25, 2020 0

नेपथ्य से जब चेतना ने, वेदना का विष पिलाया।संदली ज़ज्बात लेकर, चाँद ने हमको पुकारा।। अमूर्त थी जो पीर अब तक,मूर्त हो खिंचती लकीरें।वार देने पर तुली वो,निज भ्रमों के सब ज़खीरे। सुरमई आँखों से […]

मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए

August 25, 2020 0

नेह की यज्ञवेदी सजाकर प्रिये!सब हविष् के लिए खोजने तन चले।मन्त्र आह्वान के गुनगुनाते हुए,कुछ निमिष के लिए मोहने मन चले।। आस-विश्वास के आसनों के तले,ज्ञान-विज्ञान सारे दबे रह गये।मन को स्थिर किये बैठे विनियोग […]

रंज़ो ग़म दूर फेंक ‘पृथ्वी!’ दूर तू निकल

August 24, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ख़ुद को टटोलकर, टटोलता अब उन्हें,अपनी सदा सुनकर, देता हूँ सदा उन्हें।किस बात पर मुझसे, वे पराये हो गये?पैठकर गहराई में, तोलता हूँ अब उन्हें।एहसास यों ठण्ढा रहा, कुछ सका […]

एक एहसास

August 24, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उसकी माँग की सिन्दूर हरजाई लगती है,उसके होठों की लाली बहलाई लगती है।थकीं-हारीं, लुटीं-पिटीं नज़रें हैं ख़ामोश,पतझर में खोयी जैसी अमराई लगती है।आँखों की नींद पसरी, ख़यालात सो गये,खोयी-रोयी बिरहिन […]

हरजाई बन रहे रिश्ते आँखों के सामने

August 23, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उठ रही है हर लहर आँखों के सामने ,गिर रही है हर लहर आँखों के सामने।बेहयाई कर रही हक़ीक़त-अफ़्ज़ाइश,गिर रही है हर हया आँखों के सामने।ज़माने की दुश्वारी से भला […]

चलो! हम वहाँ चलें

August 22, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हवा यहाँ उदास कुछ, धुन्ध आस-पास कुछ। गुब्बार-ही-गुब्बार है; चलो! कहीं दूर चलें। रूप-रंग नहीं निखरे, गेसू सब ओर बिखरे। संयम अब चंचल है; चलो! कहीं दूर चलें। घर-द्वार साँय-साँय, […]

सुधियों की साँकल बजने से, मन के पट खुलने लगते हैं

August 20, 2020 0

जगन्नाथ शुक्ल ‘जगन’, प्रयागराज : आँखों के विरहाग्नि स्वेद से, भ्रम सारे छँटने लगते हैं;सुधियों की साँकल बजने से, मन के पट खुलने लगते हैं। प्रेयसि आने भर से मौसम,पतझड़ से वसन्त हो जाता।कागा के […]

बिना मुखर व्यक्तित्व बनाये यहाँ हमारी कौन सुनेगा

August 18, 2020 0

जगन्नाथ शुक्लम ✍️ (प्रयागराज) : पैरों तले ज़मीन नहीं है, आसमान में कैसे खिलता?बिना मुखर व्यक्तित्व बनाये, यहाँ हमारी कौन सुनेगा? मानदण्ड की सीढ़ी टूटी,टूटी मानवता की रीढें।आड़े-तिरछे चलने वालों;को ही मिलते ऊँचे पीढे।। दिल […]

चाल, चरित्र औ चेहरा, कैसे-कैसे लोग

August 17, 2020 0

चाल, चरित्र औ चेहरा, कैसे-कैसे लोग ।कथनी-करनी में लगा, जैसे विकृत रोग ।।जैसे विकृत रोग, समझ न आती माया ।भोले- भाले दीखते, तले स्वार्थ की छाया ।।खुद पर संकट जब पड़े, चहें मदद कर जोड़ […]

विप्लव का अब समय है, कफ़न माथ पर बाँध

August 15, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–आज़ादी किस काम की, है ज़बाँ पर ताला।अंग-अंग विष से भरा, मन कितना है काला।।दो–नरक बनाये देश को, लाकर गन्दी नीति।आह बटोरे जा रहे, अजब-ग़ज़ब की रीति।तीन–ख़ुद को अब आज़ाद […]

ख़ुद को अब आज़ाद कर, निकल सड़क की ओर

August 15, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–दिखता देश ग़ुलाम है, हम पर है परहेज़।निजता सबकी है कहाँ, ख़बर सनसनीख़ेज़।।दो–संकट दिखता बाढ़ का, नहीं किसी को होश।“त्राहिमाम्” हर ओर है, जन-जन में आक्रोश।।तीन–प्रश्न ठिठक कर है खड़ा, […]

पीएम केअर फण्ड के कहाँ गये सब नोट?

August 15, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–रोज़गार सब खा गये, नौजवान हलकान।नीति बदलती रोज़ है, अटकी सबकी जान।।दो–हिन्दू भगवा नाम पर, ठगते हैं हर रोज़।जनता मोहित हो रही, तरह-तरह की खोज।।तीन–काग़ज़ पर है दिख रहा, देश […]

आज की स्वतन्त्रता

August 15, 2020 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ नयी सुबह की आहट पाकर,अलसाया भारत जाग रहा है ।जो जन गण मन को फांस सके,वो जाल बहेलिया डाल रहा है ।सब्ज़बाग अच्छे होते हैं खुद के ही,इन्द्रजाल में फंसकर क्यों […]

कहिए! क्या ख़याल है?

August 12, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनींदी आँखों से वे ख़्वाब चुराये जाते हैं ,लरजते होठों से इक बात दबाये जाते हैं।राज़दार चेहरा लिये आये हैं बहुत दूर से,जनाब आँखों में इक बात छुपाये जाते हैं।सच […]

आवृष्टि से आक्रान्त लोक-आर्त स्वर

August 12, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जीवन अब मझधार में, नदी-पार है गाँव।नहीं सहारा दिख रहा, नहीं है कोई ठाँव।।दो–आश्वासन हर रोज़ का, मृत्यु दिखाती आँख।साहस उड़ पाता नहीं, क़तर दिया है पाँख।।तीन–चिपकी तन सन्तान है, […]

अमर प्रेम का गीत

August 12, 2020 0

आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक) : कृष्ण-कृष्ण ,करते-करते कितने भवसागर पार हुए।धर्म की रक्षा करने कोप्रभु के सारे ‘अवतार’ हुए।जब-जब धरती पर बढ़ादुष्टों का पापाचार,तब-तब मानव बनके आये प्रभु करने संहार।अमर प्रेम का गीत है,राधेकृष्ण का […]

लिखना मेरी मज़बूरी है

August 10, 2020 0

अपने दिल की कहते जाओ,मेरे दिल की कौन सुनेगा।कहीं अकेले खो ना जाऊँ, सुनना मेरी मज़बूरी है। नीचे घासें रौंदी जातीं,ऊपर मलमल की कालीनें।भ्रष्टाचार मलाई काटे,जूते पोंछ रहीं तालीमें। अंदर-अंदर धधक रहा हूँ,कौन हमारी तपिश […]

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