विषय विसंगति से भरा, मन लेता है भेद
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मायावी संसार में, भाँति-भाँति के लोग।पाप-घड़ा है भर रहा, यहीं करोगे भोग।।दो–जीवन रस की गागरी, कर लो छककर पान।भाव-समादर है यहीं, मिलता भी अपमान।।तीन–यहाँ-वहाँ के भेद से, मन में होता […]