चन्द अश्आर

August 9, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कहूँ वा न कहूँ, फिर चुप भी रहा नहीं जाता,तदबीर!१ तू ही बता इस चुप्पी का राज़ क्या है?दो–सूरत बेमानी है, तस्वीर बनाये नहीं बनती,सीरत२ अनजानी है, तासीर३ जो नहीं […]

धरो रूप समदर्शी का, रामराज है पास

August 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राम-आचरण है कहाँ, किसमें कितना राम।पाप-पंक में पाँव हैं, कहते जय श्री राम।।राम जानते भक्त को, छद्म जानते राम।छली-प्रपंची भक्त हैं, राम जानते नाम।।अंकुश से जो दूर है, राम न […]

अनाहूत अतिथि

August 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वक़्त-बेवक़्त की स्याह परछाइयाँचुपके से दाख़िल होती हैंमेरे अँधेरे घर में।अट्टालिकाओं के भार सेलहूलुहान नीवँकब दम तोड़ देगी,इसे वक़्त भी नहीं जानता;क्योंकि वह जी रहा होता है,अपना वर्तमान।बेवक़्त तो एक […]

फ़क़त पर्द: के लिए पर्द: तो क्या पर्द:?

August 6, 2020 0

चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–चिलमन गिराओ-उठाओ कोई फ़र्क़ नहीं,निगाहों से गुफ़्तुगू कर तीरे नज़र लौटे हैं।दो–हमीँ ने दिया पर्द: तो हमीँ से पर्द:, क्यों पर्द:?फ़क़त पर्द: के लिए पर्द: तो फिर क्या […]

डाल-डाल हैं फिर रहे, पकड़ न पाते पात

August 5, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय राम विराजित हो गये, बन्द हुआ अध्याय।उन्मादी व्यवहार से, किसने क्या है पाय?राम-आचरण ग्रहण कर, सबको लाओ पास।रामराज संकल्प है, श्रद्धा और विश्वास।।करते पूजन भूमि का, मनमन्दिर से दूर।हिन्दू-मुसलिम भेद […]

मन लालच से दूर रख, याद करो श्री राम

August 4, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रामभूमि के नाम पर, जुटने लगा समाज।छोड़ गये हैं राम जो, कौन करेगा काज?राजनीति में राम हैं, नहीं सत्य का मेल।विफल मनोरथ दिख रहे, दिखता केवल खेल।।राम कहाँ हैं रह […]

अब न मीरा भजन गाती है

August 3, 2020 0

अब रची जाती है घर-घर महाभारत;राजसभाओं से विदुर रहते नदारत।क्यों कोई द्रुपदात्मजा हरि-पथ निहारे;अब न रहती है वो पतियों के सहारे।अब न केवल फनफनाती है;कोर्ट में नंगा नचाती है। अब न मीरा भजन गाती है। […]

कविता- चलो अब ऑफलाइन हुआ जाए

August 2, 2020 0

क्यों ना थोड़ा सा अबऑफलाइन हुआ जाए,जिनसे सालों पहले बात हुईउन्हें फिर फोन किया जाए ।  कुछ वो अपनी सुना दें और कुछ हम अपनी, क्यों ना फिर से वो दौर शुरू किया जाए ।।आसपास लोगों से मिलकर नयी […]

समयानुकूल उद्गार : राजू नहीं अकेला जग में

July 29, 2020 0

☆★ एक गीत★☆ जगन्नाथ शुक्ल…✍️ (प्रयागराज) बी०ए० कर के, भैंस चराते, अक़्सर अपना सिर धुनता है;राजू नहीं अकेला जग में, क़िस्मत से जो लड़ पड़ता है। दो बीघे की बड़ी किसानी,दो बैलों के चले सहारे।मारकीन […]

मौन हृदय की पीड़ाओं का जटिल व्याकरण बहुत सरल है

July 26, 2020 0

मौन हृदय की पीड़ाओं का जटिल व्याकरण बहुत सरल है;भूखे मन को पढ़नेवाली केवल एक अकेली अम्मा । हाथ में मेंहँदी पाँव महावर,डोली अरमानों की आई।हर रिश्ते का धर्म निभाती,चाची, बहू कभी भौजाई।। विग्रह का […]

कविता – तुम और मैं

July 24, 2020 0

जयति जैन ‘नूतन’ – हां तुम्हारी बातें करती है मुझे परेशानऔर मैं बेहद परेशान हो जाती हूं,कुछ देर खुद से झगड़ लूंतो बेहद शांत हो जाती हूँ ।मुझे पता है तुम्हें पसंद नहींमेरे संग बातों […]

‘ज़िन्दगी के गीत’ : सभी को प्रेरित करते हैं

July 24, 2020 0

आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक) सभी को प्रेरित करते हैंजीवन के गीत,मुसकाते होंठ,मुसकाती आँखे,खिले हुए चेहरे,खिलते फूल,चहचहातीं चिड़ियाँ,उमड़ते-घुमड़ते बादल,बरसती बूँदें,फलते हुए वृक्ष,बहती हुई नदियाँ,अडिग चट्टानें,आकाश चूमते पर्वत,सूरज की लाली,लहलहाती हुई फ़सलें,ढलती हुई शाम,विश्राम प्रदान करती रात्रि,शीतलता […]

जनाब! अर्ज़ करता हूँ; बज़्मे कोठा का आग़ाज़ करता हूँ

July 23, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बज़्मे-महफ़िल की शान है कोठा,दौलत औ’ हुस्न का ईमान है कोठा।यों ही कोई रक़्क़ाशा बनती भी नहीं,लाचारी-मज्बूरी का नाम है कोठा।तवायफ़ का जिस्म रंगीनिये-शवाब,रंगीनिये-हयात की पहचान है कोठा।रंगीनिये-तबस्सुम का असर […]

‘धर्म’-‘मज़हब’-‘रीलिजन’ के विद्रूप चेहरे

July 23, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश,पल रहा है तुम्हारी कोख में;उसे न तो ‘राम’ की माला पहनानाऔर न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़;उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान,जिसका न कोई ‘धर्म’, […]

दहेज़ की मण्डी

July 23, 2020 0

अनिल चौधरी (बैंक अधिकारी) दहेज़ की मंडी में सजी दूल्हों की दुकान देखिए,नोटों की हवस में लिपटे ये बिकाऊ सामान देखिए ।खुद ही लगाते हैं यहां ये अपने वजूद की कीमत,यहाँ सरेआम-खुलेआम बिकते ये इंसान […]

हे प्रकृति! अब करो संहार

July 22, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय समय आया, कर विचार।देश की जनता है लाचार।शब्दबाण से बेधो इतना,राजनीति बदले आचार।खद्दर शर्म से पानी-पानी,चहुँ ओर दुर्गुण का सार।मर्दित मान सभी का देखो!धरती पर दिखते हैं भार।नेताओं से त्रस्त […]

हम सबब सोच रहे हैं

July 21, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक भीगी हुई शाम की दहलीज़ पे बैठे,हम उनकी मक्कारी का सबब सोच रहे हैं।सियासी जाल में उलझ कर रह गयी ‘हिन्दी’,हम ज़ह्रीली नीयत का सबब सोच रहे हैं।कहते जिन्हें […]

आँखों में नए सपने गढ़ लेना

July 18, 2020 0

आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक) जीवन संघर्ष में बढ़ते रहनाअपने लक्ष्य की ओरबिना रुके, बिना थके, बिना निराश हुए,अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति की थाती लेकर।अपना आत्मविश्वास कभी घटने मत देना।एक ज़िन्दगी में कई कठिनाइयाँ हैंकई सफलताएँ […]

गीत : घाव हृदय के भरने को, फिर कोई युक्ति सुझाओ ना

July 18, 2020 0

जगन्नाथ शुक्ल ✍️ (प्रयागराज) आँसू वाले झरने से तन भीग रहा, मन सूख रहा;घाव हृदय के भरने को फिर कोई युक्ति सुझाओ ना। मन के आँगन में सावन,पतझड़ जैसा बर्ताव करे।रह- रह के चलती पछुआ,करती […]

अपनी बातों से भला क्यों भरमाते हो?

July 16, 2020 0

—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जुल्म करके भी तुम मुकर जाते हो,ऐसी फ़ित्रत कहाँ से तुम लाते हो?दर्द का एहसास बेशक होता है मुझे,जब मुश्किलात में ख़ुद को पाते हो।मेरा रहगुज़र अब कहीं दिखता नहीं,बूढ़े ज़ख़्म […]

एक अभिव्यक्ति

July 13, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–जीव-जगत् भ्रमजाल में, ब्रह्म निकटता खोय।मानव दानव बन गया, फिर काहें को रोय।।दो–रूप-रूपसी-दंग है, दिखता ज्ञात अज्ञात।सार-सार से रहित है, मानव दिखे न ज्ञात।।तीन–विष-वल्लरी सृष्टि में, होता दूषित वात।जीवनरूप विरूप […]

आईन: एक-रूप अनेक

July 13, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–भले ही चुप है आईन: तेरा,कब बोल पड़ेगा, नहीं मालूम।दो–आईन: को एहतियात से रखना,टूटा तो सारे राज़ बिखर जायेंगे।तीन–तुम हँसते हो, सताते हो और निभाते भी,सवाल है, टूटते ही बिखर […]

प्यारी-न्यारी लगती सन्ध्या

July 12, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय श्याम-सलोनी आती सन्ध्या,सबके मन को भाती सन्ध्या।पश्चिम में जब लाली छाती,मन्द-मन्द मुसकाती सन्ध्या।पुरवा-पछुआँ ताल लगाते,तिनक धिनन-धिन् गाती सन्ध्या।चन्दामामा! देर में आना,हमको बहुत है भाती सन्ध्या।चीं-चीं चूँ-चूँ चिड़ियाँ करतीं,थिरक-थिरक इतराती सन्ध्या।रात […]

अभिव्यक्ति के पंख

July 12, 2020 0

—आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–खनक रही हैं चूड़ियाँ, करें सजन से बात।ऊपर-ऊपर प्रेम है, नीचे-नीचे घात।।दो–रुनक-झुनक पायल कहे, जीवन-प्रेमप्रसंग।पयजनिया हैं पाँव में, सुरभित होता अंग।।तीन–दमक रही है दामिनी, मेघ हुआ मदहोश।हरियाली मन हर रही, सौतन […]

मेरी आँखों का काजल चुराओ तो जानें

July 11, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मेरे ज़ख़्मों की तासीर बताओ तो जाने,मेरे ख़्वाबों की ताबीर बताओ तो जाने?तुम्हारे फ़न का कायल है ज़माना सारा,मेरी आँखों का काजल चुराओ तो जाने ?मेरी उल्फ़त बिनब्याही ही फ़ना […]

आईन: ने ग़द्दारों से दोस्ती कर ली

July 11, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जो भी मुक़द्दर की बात करता है,वह शख़्स ताउम्र लड़खड़ाता है।जुल्मो सितम से जो डर जाता है,ज़िन्दगी की ज़ंग में हार जाता है।आईन: ने ग़द्दारों से दोस्ती कर ली,जब भी […]

ज़िन्दगी सिमटती परछाईं-सी

July 11, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निगाहें चुरा लो, मैं कहता हूँ,नज़रें चुरा लो, मैं कहता हूँ।चेहरे का नूर, उम्र पाने लगा,अरमाँ सजा लो, मैं कहता हूँ।ज़िन्दगी सिमटती परछाईं-सी,चाहत बढ़ा लो, मैं कहता हूँ।अज़्मत जाये, फिक्र […]

जुग-जमाना बुढ़ाइ के, अब करियाह हो गइल बा

July 10, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय तू बूझ भा जनि बूझ, अब छोड़ि द ओकरा के,हम बूझनी सरसन्त से, तू बुझल जेकरा के।गली-गली कुकुरात रह, अब ठेकी ना कुछू,लोग थपरी बजइहें, बोली बोल जोकरा के।लुकाइ के […]

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का ‘उनकी कविता-कामिनी’ के नाम एक पत्र

July 10, 2020 0

मेरे हृदयप्रान्त की साम्राज्ञी कामिनी कविते! तुम्हारे सर्वांग पर जब मैंने पहली बार दृष्टि-अनुलेपन किया था तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था, मानो प्रकृति-सुरभि तुम्हारे अंग-प्रत्यंग और स्निग्ध प्राणों पर ओस भीगे हुए पुष्प की […]

रचना

July 8, 2020 0

आकांक्षा मिश्रा, गोंडा उत्तरप्रदेश तुम्हारी रचना सबसेसुंदर है ,उसमें प्रकृति का भास हैमधुर संगीत , सुनहरी धूप सतरंगी छटाएं सबको आशा कीकिरण से जगाती है। प्रकृति से हमे रूप-रंगसौंदर्य शौर्य मिलायही आत्मविश्वास चलना सिखाती है […]

जिसकी तुलना किसी से न की जा सके वो है “प्रेम”

July 8, 2020 0

सुलेखा सुमन (भागलपुर, बिहार) : प्रेम व्यक्ति की भावनाओं कागहरा सागर है ।जिसमे डूबकर मनुष्यसच्चाई की मार्ग पर चलता है।जिसकी व्याख्या करना असम्भव हैवो है प्रेम।प्रेम वो सत्य है, जो सब कुछ असत्य होने का […]

गुरु पूर्णिमा पर कविता

July 5, 2020 0

अज्ञान के तिमिर से निकालकर आलोक देते हैं गुरु।आत्मा का परमात्मा से मिलन करवाते हैं गुरु।। अविनाशी अविकारी नित्य होते हैं गुरु।साकार रूप में पथ प्रदर्शन करते हैं गुरु।। शस्त्र व शास्त्र का ज्ञान करा […]

काश ऐसा होता प्यारे..!

July 5, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पूरब होता पच्छिम होता, सूरज-चाँद नहीं होते,धरती और आकाश भी होता, जीव-जगत् नहीं होते |हम भी होते तुम भी होते, सरोकार नहीं होते,कितना अच्छा होता हम, जब होकर भी नहीं […]

आवर्तन-दरार

July 2, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–महकी अमराईचहका यौवनआग लगी पानी में!दो–आँखों-की खटासकोई आस-न-पासरिश्ते मुसकुरा उठे।तीन–काग़ज़ की नावबारिश की छाँवसूरज सघन चिकित्सा कक्ष में।चार–वर्तनी अकेलीसौन्दर्य-बोध लजीलाअभिव्यक्ति दरकने लगी।पाँच–प्रतीक सजीलाबिम्ब रंगीलाअभिव्यक्ति बहक पड़ी।(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ […]

तन्हाई का सफर

June 30, 2020 0

तन्हाई में जीने का अंदाज अलग होता है।रूठने और मनाने का अंदाज़ अलग होता है।। दो जिस्म अलग अलग हो बेशक जमाने मे।रूह से रूह का मिलन मगर अलग होता है।। आसान नहीं बीते वक़्त […]

एतिबार मत करना, झूठी हैं कुर्सियाँ

June 30, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ,कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ।जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर,क़ानून को भी आईन:, दिखातीं कुर्सियाँ।उधारी में जलता दिख रहा, ग़रीब का चूल्हा,अमीर का […]

मैं दीप हूँ

June 29, 2020 0

डॉ. राजेश पुरोहित मैं दीप हूँ जलता रहूँगाराहें रोशन करता रहूँगारात के गहन तमस कोमैं पल पल हरता रहूँगा लोग बैठे जो रोशनी मेंउन्हें उजाले देता रहूँगाप्यार बाँटता आया हूँप्यार ही बाँटता रहूँगा मेरे तले […]

एक अभिव्यक्ति

June 29, 2020 0

—आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय प्रणय-पंछी विकल उड़ने के लिए,ताकता हर क्षण गगन की ओर है |किन्तु ममता की करुण विरह-व्यथा,ज्ञान-पथ को आज देती मोड़ है |धैर्य की सीमा सबल को तोड़ कर,दर्द की लतिका हरी […]

ज़िन्दगी थी ‘गीत’, ‘इतिहास’ बनकर खो गयी

June 29, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रात घिरती रही, दीप जलता रहा।साज-श्रृंगार+ करती रही ज़िन्दग़ी,रूप भरती-सँवरती रही ज़िन्दग़ी।बेख़बर वक़्त की स्याह परछाइयाँ,उम्र चढ़ती-उतरती रही ज़िन्दग़ी।साध के फूल कुँभला गये द्वार पर,प्यास की तृप्ति का गाँव छलता […]

विडम्बनावश

June 29, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय यक़ीन नहीं आतामैं ख़ुद को देख रहा हूँ।अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के गलियारे मेंमैं ढूँढ़ रहा हूँअपने न होकर भी हो जाने के साक्ष्य कोपर हर बारख़ुद को ख़ुद सेठगा […]

वह शख़्स क्या, जिसकी कोई कहानी न हो

June 29, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वह हवा क्या, जिसकी कोई रवानी न हो,वह वफ़ा क्या, जिसकी कोई दीवानी न हो।ये अन्दाज़े बयाँ जज़्बात की अँगड़ाइयाँ हैं,वह लफ़्ज़ क्या, जिसमें आग और पानी न हो।हिज़्र की […]

नज़र का असर तीर-कमान-सा दिखने लगा

June 27, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उसकी आँखों में बियाबान सा दिखने लगा,पहलू में आते ही श्मशान-सा दिखने लगा।मुट्ठी में बँधी नज़दीकी रेत-सी सरकती रही,जाने क्यों बुझा-बुझा अरमान-सा दिखने लगा।सलीक़ेमन्द लोग ताउम्र मिलते रहे एहतिराम से,नज़र […]

लात मारकर उसे देश से भगाओ!

June 23, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय देश की जनता जागो,विकल्प अब तलाशो।तल कर खा जायेगा देश को,गहरी नींद से सब जागो।पीड़ित हो कभी हमने कहा था,अँगरेज़ो! देश से अब भागो।अब जीना कर दिया दूभर उसने,लात मारकर […]

देश के ग़द्दार और संवेदनहीन नेताओं के ख़िलाफ़ सहन करने की अब कोई गुंजाइश न हो

June 23, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हममें लाख मतभेद रहे, फिर भी,मनभेद की अब कोई गुंजाइश न हो।आवाज़ अब संग-संग उठे अपनी,फ़र्क़ की अब कोई गुंजाइश न हो।माना कि पेचोख़म हैं बहुत यहाँ,भ्रम की अब कोई […]

वे तो सौदागर हैं, ख़रीद-फ़रोख़्त ही ख़ुदा है उनका

June 23, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उनकी बातों में न आना, वे बनाना जानते हैं बेशक,उनके हाथों में न आना, वे फँसाना जानते हैं बेशक।वे तो सौदागर हैं, ख़रीद-फ़रोख़्त ही ख़ुदा है उनका,उनके घातों में न […]

एक अभिव्यक्ति :———–

June 23, 2020 0

— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय फ़नकार हो तो अपना फ़न दिखाओ न,महज़ बातों में मुझको अब उलझाओ न।देखो! मंज़िल आर्ज़ू अब है कर रही मेरीमुझे बढ़ने दो, अब मुझको फुसलाओ न।कुछ बातें हैं ज़ेह्न में, सँभाल […]

एक अभिव्यक्ति

June 22, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निभृत-निलय में वितान तानता मन,निश्शब्द-मूक याचना–सम्पृक्त उर्वशी-मेनका का तन।अनाघ्रात पुष्प-सा–सर्वांग सौन्दर्यस्वामिनी-द्वय की कान्ति,समग्र संसार-संसूचित–कमनीय कामिनी के क्लान्त कपोलों की भ्रान्ति।रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का आकर्षण,जीवन्त अदृश्य पथ–अप्राप्य संस्पर्श का विस्मित […]

अन्तर्यात्रा

June 21, 2020 0

—-आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–शुष्क पड़ी संवेदना, आहत निज सम्बन्ध।अजब खेल है मोह का, कैसा यह अनुबन्ध?दो–मेरा-तेरा किस लिए, माया से अब डोल।गठरी दाबे काँख में, द्वार हृदय का खोल।।तीन–छक कर अब है जी लिया, […]

आवर्तन और दरार

June 20, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कल तक था जो जगद्गुरु, भ्रष्ट बन गया देश।दिखते सब बहुरुपिये, तरह-तरह के वेश।।दो–कुम्भकर्णी सब नींद में, नहीं किसी को होश।बाँट रहे सब देश को, लोकतन्त्र बेहोश।।तीन–क़लम बिकाऊ दिख रहे, […]

क्या ज़ंग लग गयी, तुम्हारी जवानी में?

June 20, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जी चाहता, आग लगा दूँ अब पानी में,जी चाहता, ज़ह्र भर दूँ अब बानी में।‘इन्क़िलाब’ बोलने से कतराते क्यों?क्या ज़ंग लग गयी, तुम्हारी जवानी में ?हवा को पकड़ रुख़ बदल […]

आवाज़ दो, हम एक हैं

June 17, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–तेरी चोंचलेबाज़ी-ज़ुम्लेबाज़ी सबने देख ली है,उलटी गिनती शुरू हो गयी, जनता अब जागने को है।दो–मुझसे कुछ पूछने से तुम्हें ‘तुम्हारा हासिल’ क्या?पगडंडियों को छोड़ता नहीं, ‘चौराहों’ पे जवाब देता नहीं।तीन–इन्क़िलाब […]

बाक़लम मैंने सच की निगहबानी की है

June 17, 2020 0

चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बाक़लम मैंने ‘सच’ की निगाहबानी की है,क़लमबेचकर तमाशा दिखानेवाले कहीं और हैं।दो–हवा मंज़ूर करती है, मेरी दीवानगी,उसे मालूम है, मेरी कैफ़ीयत का जुनूँ।तीन–ख़त और ख़ुतूत की बातें अब […]

इशारों-इशारों में किसी रिश्ते का नाम न दो

June 17, 2020 0

चन्द अश्आर — आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–यक़ीं हो गया, वह क़ाबिले-तारीफ़ नहीं,खड़ा ज़मीं पे और उड़ता आसमाँ में है।दो–मैं जिधर जाना चाहूँ, जाने दो, रोको न मुझे,इशारों-इशारों में किसी रिश्ते का नाम न दो।तीन […]

एलान कर दो, रौशनी मैं उगाता हूँ

June 17, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–नुमाइश किसकी लगी है, यह तो पता न चला,आँखें खुलीं तो जुम्हूरियत१ का हाथ बँधा पाया।दो–ज़ुल्मत२ हर सू, चिराग़ अब बन्धक है,एलान कर दो, रौशनी मैं उगाता हूँ।तीन :ज़ोरआज़्मा ज़ोरेबाज़ू […]

पेश करता हूँ, चन्द मौजूँ (उचित) शेर

June 16, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–बेचारा चाँद कसमसाहट में है,यहाँ ज़लील और जलील भी रहा करते।दो–चाँद की निगाहें किस-किस पे इनायत हों,“एक अनार सौ बीमार”-सा मंज़र दिखा करता यहाँ।तीन–चाँद का टुकड़ा-सा तेरा शफ़्फ़ाफ़१ बदन,कुछ दाग़ […]

चन्द मौजूँ अश्आर

June 16, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कैसे मान लूँ, सूरत कामिल१ चाँद-जैसा,उधार ही सही, सीरत२ होता चाँद-जैसा।दो–मेरे अशाइर३ चाँद को चाहते हैं बहुत,दाग़ के डर से चाँद को अलग करते हैं।तीन–चाँद देखने की आर्ज़ू पूरी न […]

अपने अदब में आबे कशिश और लाइए

June 14, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–आओ! हम ग़ौर करें, सदियाँ गुज़र रहीं,ग़ुलाम तहज़ीब को, क्यों ढो रहे हैं हम?दो–तुमने कहा, मैंने सुना, हो जायें चुप अब हम,दीवारों के कान, इधर तक सरक आये हैं।तीन–माना आप […]

उठा है जो तूफ़ान क़ह्र बरपायेगा बेशक

June 12, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आँखों-ही-आँखों में बात हो जाने दो,बातों-ही-बातों में रात हो जाने दो।बनने-सँवरने लगे ख़यालात के झरोखे,रातों-ही-रातों में मुलाक़ात हो जाने दो।ज़मानाए दराज़१ जुस्तजू अधूरी रही,चाहत दीदार का, शह-मात हो जाने दो।आँखों […]

टूटती है रसोई

June 8, 2020 0

ज़ैतून ज़िया – जब होती है कोई तलाकतो दो लोग नहीं टूटतेटूटती है रसोई भीनमक,चीनी, मिर्च, हल्दीभर लिया जाता है पन्नी मेंडब्बे खाली हो जाते हैइलायची, लौंग और जीरे केधीमी आंच पर जो प्रेम पका […]

रह गये हैं तो प्रश्नों के छिलके

June 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मन-मस्तिष्क प्रश्नों कापिटारा बनता जा रहा है।अन्तहीन गह्वर मेंरह गये हैं तो प्रश्नों के छिलके।मूल को मुझसे दूर करसमझौतावादी दुनिया की प्रयोगशाला मेंपंचवर्षीय बिस्तर पर लेटाकरअनगढ़ पत्थरों की भाँतिअपरिपक्व हाथों […]

वो सपना था

June 2, 2020 0

पहली पहली बार था उससे पहले घर में मैं मेरे यार था , फिर आया ऐसी दुनिया में जहाँ मेरे लिए अंधकार था ।मंजिल कहीं और थी रास्ता कोई और था इसलिए मैं शांत था ,उजाले की दुनिया में भी दिख रहा मुझे चारों तरफ […]

ज़माने की यही है रीति

June 1, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भला यह कोई बात हुई, बातों-बातों में रात हुई। हमक़दम बन चलते रहे, मंज़िल के क़रीब घात हुई। मैं खड़ा रह गया दोराहे पे, वे आये और मुलाक़ात हुई। शातिर […]

मैं समाज का दर्पण हूँ

May 30, 2020 0

शरदेन्दु मिश्र ‘राहुल’ बघौली मैं समाज का दर्पण हूं,अभिव्यक्तियो का वर्णन हू ।सुख दुख का मैं मिश्रण हू,हा मैं मौलिकता का चंदन हू।। हमने देखे है कुछ विकासपर अधिकता में विनाश।कलम चली तो ये बोलेकुछ […]

मज़दूराइन

May 29, 2020 0

ज़ैतून ज़िया तो अगली बारजब चुनना तुम उसे,तो देखना येकी चल पायेगी क्या?वो मीलों दूर पैदलवापस घर लौटने को,उठा पायेगी क्या?बोझ गृहस्थी कासिर पर,काट पायेगी क्या?भूख कई दिन तक पेट की !! जांच लेना तलवों […]

उजाड़

May 25, 2020 0

ज़ैतून ज़िया : तुम्हारे पास किस्से हैंवसंत केप्रेम केकहानियाँ हैँगुलदस्तों कीतितलियों की !! मेरे पास नहीं हैमै उजाड़ हूँयहाँ कोई नहीं आताकभी कभी आते है जंगली जानवरभूख कोशिकार कोसाधते है निशानामेरे मासूम चूहों, नेवलों और […]

हाँ प्रेममय हो जाऊं मैं

May 24, 2020 0

ज़ैतून ज़िया : मेरा नाम शीर्षक मेंलेकिन तुम्हारे नाम के बिना गुमनामइस शीर्षक को जानते है सबतुम्हारे नाम सेजब तक तुम्हें ना लिखा जायेहाँ वहीं नीचे कोने मेंशीर्षक पढ़ के भीपढता नहीं कोई तुम्हें रुकना […]

सबका अपना प्रेम

May 23, 2020 0

ज़ैतून ज़िया– सबका अपना प्रेम हैसबके अपने दर्द हैसबके शरीर पर छाले हैँकहीं हाथ, कहीं पाँव तो कहीं ह्रदय मेंकुछ सूखे तो कुछ बजबजे हैँसब चाहते हैं इस घाव को भरनालेकिन सबके भर नहीं पाते […]

चेहरा पे चेहरा अब तो न लगाइए हुज़ूर!

May 23, 2020 0

–— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हिचकी का सबब क्या है, बताइए हुज़ूर!परेशाँ हाले दिल को, अब सुनाइए हुज़ूर!कब तक भरमाइएगा, बाज़ीगरी दिखा के,चेहरा-पे चेहरा अब तो न, लगाइए हुज़ूर!लोग आपके हक़ीक़त से, वाक़िफ़ हैं यहाँ,रुख़ […]

मज़दूरों की वर्तमान स्थिति पर लिखी गयी अब तक की सबसे बेहतरीन कविता

May 23, 2020 0

कवि दिव्येन्दु दीपक ‘आधुनिक दिनकर’, रीवा (मध्यप्रदेश)- करता रहा जो साधना सब त्याग परहित, भूलकर संताप निज ले अधर स्मित, धूप, पानी, शीत के जो शीश चढ़ता, रह झोपड़ी में अन्य हित जो महल गढ़ता, बाधक […]

लेकिन…

May 22, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय लेकिन…जाने क्यों कल की बौरायी बदरीबेहद सीधी-सी लग रही है।अतीव विनम्र, चुप, मौन, शान्त-सहमी,मानो सारी उम्र कोईअपने को समझे जाने की प्रतीक्षा मेंखड़ा रह जाये। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ […]

चलते-चलते-छलते-छलते

May 21, 2020 0

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– एक–कारवाँ रुके वा बढ़े, फ़िक़्र किस बात की,मंज़िल है पाँव तले, फ़िक़्र किस बात की?दो–रिश्ते अब सभी, ज़ख़्मी-से दिखते हैं,अपनों से बेहतर, ग़ैर यहाँ दिखते हैं।तीन–संगतराशी करते-करते, संगे दिल बन गया […]

नंगी आँखों की अस्लीयत

May 21, 2020 0

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय– लगता है,कफ़न के कोर आतुर हैं,मेरी अँगुलियों के पोरों कोढकने के लिए।विवशताओं और बेचारगी कीबैशाखियों पर टँगा मैं,काली निशा की व्याप्ति को चीरने कीनाकाम कोशिशें कर रहा हूँ।बूढ़े बरगद की कोटर […]

मज़दूर की व्यथा

May 20, 2020 0

शिवांकित तिवारी ‘शिवा’ (युवा कवि एवं लेखक)– पैदल चलकर नाप रहे ख़ुद सड़कों की लंबाई, भूखें प्यासे  बच्चों  के  संग  मज़बूरी  में भाई,  नंगे  सूजे  पैर  जल  रहे, बिना रुके दिन रात चल रहे, भूख की […]

आँखें खोलो और मरन देखो!

May 19, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कराहता-सिसकता वतन देखो!घर-घर का उजड़ा चमन देखो!सिर चढ़कर बोलती बेशर्मी है,पर्द:नशीं का यह चलन देखो!शेर मानिन्द देश अब गुर्राता नहीं,ज़िन्दा लाश ओढ़े कफ़न देखो!मुल्क तबाह कर कुछ इठला रहे,हैरत है, […]

प्रेम की आस

May 18, 2020 0

गुड़िया कुमारी, पूर्णिया बिहार ✍️✍️ अभी तो बस नैन से नैन की बात हुई हैदिल से दिल की मुलाकात बाकी है ।इश्क़ की शुरुआत बाकी हैहर वो अधूरी बात बाकी है । अभी तो अंधेरी […]

माँ की ममता

May 17, 2020 0

अमर आकाश, श्रीनगर, पूर्णिया बिहार माँ की ममता की छाया,जिसने सदा हमें दुलराया ।माँ के आँचल का वह लालन,जिसमें हुआ मेरा पालन ।पाकर जिसकी उँगली का सहारा,घूमा मैं और देखा है नज़ारा । माँ की […]

मैं लिखने लगी हूँ

May 16, 2020 0

✍️गुड़िया कुमारी, पूर्णिया बिहार अनसुलझी सी जिंदगी को सुलझाने लगी हूँ, जिंदगी के सारें गमों को पीने लगी हूँ। लिखना मुझे इस क़दर भा गया, जिंदगी के दर्द को स्याही से पन्नो पर छापने लगी […]

ये जो वक्त बुरा है, बीत जाएगा

May 13, 2020 0

प्रिया कुमारी- ये जो वक्त बुरा हैये बीत जाएगा लेकिन, बीते वक्त के साथकुछ अपनों का साथ छूट जाएगा अभी भी वक्त हैंसंभाल जा मनुष्य, सब्र कर घरों से निकालने कादौर फिर आएगा, आफ़िस की […]

धर्मनिष्ठ महाराणा प्रताप

May 9, 2020 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ : काश ! महाराणा प्रताप धर्मनिरपेक्ष होतेउन्हें भी आधा भारत मिल गया होता ।देश, धर्म और स्वाभिमान हितहल्दीघाटी का भीषण युद्ध न होता ।समय सापेक्ष राजनीति करतेमुगलों से मिलते मौज़ करते […]

कविता : प्रकृति

May 8, 2020 0

सौरभ कुमार ठाकुर– जहाँ जाने के बाद वापस आने का मन ना करे जितना भी घूम लो वहाँ पर कभी मन ना भरे हरियाली, व स्वच्छ हवा भरमार रहती है जहाँ सच में वही तो असली […]

शेष-अवशेष

May 6, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–मन में मनका है नहीं, मन से मन का दोष।जीव ब्रह्म से पूछता, मन का कैसा रोष?दो–कान्ति अलक्षित हो रही, प्रमा अमा का रूप।यत्र-तत्र-सर्वत्र है, जीवन-रूप अनूप।।तीन–यश-अपयश चहुँ ओर है, जीवन भेद-विभेद।मन-मानस में […]

अपने घर में रहिये प्यारे, लॉक-डाउन को सहिये प्यारे

April 17, 2020 0

अपने घर में रहिये प्यारे । लॉक-डाउन को सहिये प्यारे । कोरोना ‘चीनी’ विषाणु है, इससे बचकर रहिये प्यारे ।। आप सुरक्षित, तो देश सुरक्षित । कोरोना- योद्धा भी रक्षित । कोविड-19 सूक्ष्म – संचरी, […]

कुछ खोज नया निर्माण करो, घर में लेकिन हर हाल रहो

April 11, 2020 0

शिवांकित तिवारी ‘शिवा’ (युवा कवि एवं लेखक)– कुछ ऐसी चीजें रोज़ करें चलों खुद की हम ख़ुद खोज करें, बचना है इनसे सबको अब, अफ़वाहों से, उन राहों से जो करती है गुमराह हमें । अब […]

रुक मत सजनी, अब चल सजनी

April 8, 2020 0

अवधेश कुमार शुक्ला ‘मूरख हृदय’, कछौना चल री सजनी, छँटती बदली, अब क्या सोचे मन की पगली । कूटस्थ पंचतन्त्री बगरी , अब क्या ढूंढे, क्यों री सजली ।। निश्चेष्ट नियति, परिभाव शून्य, अवधान शून्य, […]

कविता : वक्त

March 30, 2020 0

राजन कुमार साह ‘साहित्य’मिथिला नगरी, जिला: मधुबनी, बिहार एक वक्त था, मेरा वक्त था, मेरे पास वक्त नहीं था । एक वक्त है, मेरे पास वक्त है, मेरा वक्त नहीं है । कहते हैं, वक्त, […]

कोरोना पर कुछ दोहे

March 22, 2020 0

डॉ. राजेश पुरोहित 1.कोरोना की मार से, बचा कहाँ संसार। दशों दिशाओं में मचा , देखो हाहाकार ।। 2 चेले निज घर बैठकर, मना रहे हैं मौज। गुरुवर शिक्षा दे गये, उठा ग्रंथ कन्नौज।। 3 […]

शेष-अवशेष

March 13, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : मैंने सूरज का जवाल१ भी देखा है, तूने कर लिया ख़ुद के साये पे भरोसा? दो : मेरे लाख कहने पे भी नहीं मानते हैं लोग, यों खुलकर मत मिलो बुरा […]

आवर्त्तन और दरार

March 13, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय– एक : जब भी चाहा, उठाकर फेंक दिया, दोस्ती का नाम देते शर्म आयी नहीं। दो : तुम भी आ जाओ, मेरे साये में, दीवार होने की सज़ा मालूम है। तीन : बहके-बहके […]

एक अभिव्यक्ति

March 12, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय– बेशक, चाहो पर बताओ नहीं, बेशक, पाओ पर सताओ नहीं। मुद्दत बाद ज़िन्दगी सयानी हुई, उसे सब्ज़बाग़ दिखाओ नहीं। मस्त-मौला है और फक्कड़ भी, भूले-बिसरे भी आज़्माओ नहीं। हक़ीक़त की ज़मीं ही बेहतर […]

चन्द अश्आर

March 12, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : बेतरतीब बनती जा रहीं रिश्ते की ज़ंजीरें, किसी बच्चे की चाहत-मानिन्द उलझी हुईं। दो : आँखों ने आँखों से गुफ़्तुगू क्या कर ली महफ़िल में, फ़क़त बात इतनी थी मगर अफ़साना […]

पृथ्वीनाथ पाण्डेय के कुछ शे’र

March 11, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय– एक : जब भी चाहा, उठाकर फेंक दिया, ऐसी दोस्ती से तेरी दुश्मनी ही भली। दो : तुम भी आ जाओ, मेरे साये में, मुझे दीवार होने की सज़ा मालूम है। तीन : […]

एक अभिव्यक्ति

March 11, 2020 0

पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक– तिल का ताड़ दिखने लगे हक़ीक़त में, सोचना, दिमाग़ का ज़ंग अभी बाक़ी है। दो– कुछ अलग हटकर सोचा करो साहिब! यहाँ जितने हैं ‘रेडीमाल’ बेचा करते हैं। तीन– तिनके-तिनके जोड़कर आशियाँ […]

कविता : स्त्री

March 11, 2020 0

आकांक्षा मिश्रा : एक स्त्री आधी से ज्यादा दूरी अकेले तय करती हैं , तुम्हारे सारे अधिकारों को कर्तव्य मानकर सफर जारी करती हुई तुम्हें मुक्त कर देती हैं मुड़कर मत देखो ,अधूरी रहेगी सारी […]

तुम सही कैसे हो सकते हो!

February 27, 2020 0

✍️ प्रिया कुमारी, नई दिल्ली अच्छा तो तुम सही, मैं गलत हूँ लेकिन ये बताओ मुझ पे हाथ उठा के, मेरे आत्म सम्मान को गिरा के तुम सही कैसे हो सकते हो …. मेरे हर […]

मुट्ठीभर आकाश

February 19, 2020 0

— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक– मुखड़ा मौलिक दिख रहा, दिखता करुणा-रूप। शोकाकुल परिवेश है, बनती मृत्यु अनूप।। दो– मौन निमन्त्रण मौन है, सूनी माँग न देख। सधवा विधवा बन गयी, कैसा विधि का लेख।। तीन […]

अभियान गीत : हर हाथ क़लम

February 11, 2020 0

हर हाथ कलम अभियान चलाकर मानेंगे। हम सरकारी स्कूल की सूरत बदल कर मानेंगे।। श्रम से अपने बच्चों को आगे बढ़ाकर मानेंगे। गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का परचम हम ही लहरायेंगे।। पेन पेंसिल और रबर से […]

Poem : Be ahead on duty

February 10, 2020 0

Awadhesh Kumar Shukla ‘Murakh Hirdai’ (Head Master UPS Kamipur, Kachhauna)- Lo! life is busy So life is easy, If life is lazy, Then life is crazy. Behold at beauty, Be yield to the duty, If […]

कविता : बसंत पंचमी

January 29, 2020 0

शालू मिश्रा (युवा साहित्यकार/अध्यापिका, रा.बा.उ.प्रा.वि.सराणा, जालोर) मधु ऋतु का हुआ है आगमन, वसुधा ने किया पीतांबर धारण । प्रकृति में चहुँ ओर सुगंध छायी हैं, मनमोहक सी ये बेला आई है। समीर में हुआ केसर […]

अंधकार संग मैं निरा अकेला, मुझको याद प्रिये की आयी

January 8, 2020 0

असित दुबे, हरदोई- इस शीतल सी निशा घड़ी में, चपल चंद्रिका चाँद को लाई, अंधकार संग मैं, निरा अकेला, मुझको याद प्रिये की आई। यह चुभती सी विछोह वेदना, है घुली हुई मेरे प्रतिपल में, […]

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