कहाँ सो रहा शौर्य है, सीना दे जो चीर?
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : ज़बान पर अंकुश नहीं, कैसे हैं ये लोग! प्रेमरोग से विकट है, नेता का संयोग।। दो : नेता-रोग है प्लेग, घर-घर घुसणम होय। देश को चाटें घुन-सा, जन-जन अब है […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : ज़बान पर अंकुश नहीं, कैसे हैं ये लोग! प्रेमरोग से विकट है, नेता का संयोग।। दो : नेता-रोग है प्लेग, घर-घर घुसणम होय। देश को चाटें घुन-सा, जन-जन अब है […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उसकी हक़ीक़त सिमट कर क्यों रह जाती है, चादर में, अँगड़ाई लेकर वह क्यों सिमट जाता है, चादर में। ऐ हवा! तू उस तक जाकर मेरा यह सवाल करना, उसकी चुप्पी क्यों […]
गीत गाँव ! हमारा बचपन दे दे ! वह मिट्टी के सुघर खिलौने । वह काली बकरी के छौने । वह मेरे गुड्डे की शादी , रोती सी गुड़िया के गौने […]
-अमित धर्मसिंह उसने अभी दुनिया को देखना शुरू किया था, समझना नहीं, अगर वह दुनिया को ज़रा भी समझती तो वह समझ जाती बलात्कारियों की चाल, उनकी भाषा और पहनावे से पहचान जाती उनके धर्म […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इलाहाबाद के सघन पदातिक पथ पर विश्रान्त-क्लान्त शयन करती प्रौढ़ा, आजीविका-साधन से समन्वय-सामंजस्य स्थापित करती; अद्भुत एकान्वित और पार्थक्य के आचरण की सभ्यता प्रदर्शित करती; अवचेतन से साक्षात् करती, मानो सांसारिकता से […]
रचनाकार-पवन कश्यप गीतों ने की आज गर्जना कब तुम हमको गाओगे, अंदर मेरा दम घुटता,कब मुखमण्डल पर लाओगे । कुछ कहने में अनायास ये होठ कांपने लगते है, कुछ अंतस ने हिम्मत की तो शब्द […]
आकांक्षा मिश्रा- उसने कहा मेरे पास शब्द है तुम्हें जानने के लिए इतने शब्द हालात सम्भालने के काम आ सके क्या कहूँ ? अभी-अभी हृदय की पीड़ा बढ़ रही तुम अभी मौन हो ये मन […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- नाचो गाओ ढोल बजाओ, खाओ और खिलाओ। लोकतन्त्र की क़ब्र खुद रही, सब मिल जश्न मनाओ। सब मिल जश्न मनाओ प्यारे! डूब सुरा में जाओ, नंगों की पा नंगी संगत, सब नंगे […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) चलने दो नियति का चाबुक, मुझे निज कर्म करने दो। मेरे हिय में चला खंज़र, मुझे तुम धैर्य धरने दो। कोई ना-क़ाबिल कहे मुझको, उसके आँखों की परख होगी। मेरे सिर पर […]
जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद) 【१】बड़े एहसान हैं मुझ पे ,जो तुम्हारा सानिध्य है कविते! बरक़त से भरी ज़िन्दगी, हृदयतल से वन्द्य है रचिते! अहर्निश कल्पना करता , उकेरूँ अक़्स शब्दों से, भरी हैं […]
“आसमाँ गर तू बना तो मैं धरा बन जाऊँगी।” सर्जनशील रचनाकारों का वैचारिक मंच ‘वैचारिकी‘ की ओर से ३१ मार्च, २०१८ ई० को अल्लापुर, इलाहाबाद में एक भव्य कविसम्मेलन का आयोजन किया गया था। नवोदित […]
एक एसडीएम की कहानी आज स्कूल में शहर की महिला SDM आने वाली थी क्लास की सारी लड़कियां ख़ुशी के मारे फूली नहीं समां रही थी …सबकी बातों में सिर्फ एक ही बात थी SDM […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमारी बात हम तक रहे तो बेहतर है, हमारा साथ हम तक रहे तो बेहतर है। चादर देखकर हम पाँव हैं पसारा करते, हमारा ख़्वाब हम तक रहे तो बेहतर है। जनाब! […]
जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद) अब नवाबों के शहर से ज़वाब आना है, शायद! हकीक़त में रुआब आना है। आज क्यूँ धड़कने नब्ज़ टटोल रही हैं? बदलाव आएगा या नया हिज़ाब आना है। लबों की गुज़ारिश शायद! […]
“कृतिकार आरती जायसवाल एक है, परन्तु उसके रूप कई हैं। इस सैंतीस वर्षीया के भीतर चार वर्ष की शिशु से लेकर अस्सी-नब्वे वर्ष तक की वयोवृद्ध-वयोवृद्धा का मनोविज्ञान भरा हुआ है। वह एक शरीर में […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद अश्रुधार जब बहता होगा,गालों से कुछ कहता होगा। आँखों से बिछुड़न के कारण,बड़ा दर्द वो सहता होगा।। हृदय प्रकम्पित,अवरुद्ध गला, रग में होती होगी सिहरन, क्या जैसे यह टपक रहा, वैसे ही […]
डॉ0 श्वेता सिंह गौर- आओ राम हृदयमंदिर में, कब से बाट निहार रहे, विनती सुनो हमारी भगवन प्यासे प्राण पुकार रहे, तुम बिन नहिं कोउ संगी-साथी तात मात-पितु भ्रात तुम्हीं, हम हैं तुम्हारे ही हे […]
मीतू मिश्रा, हरदोई – दुःख का अहसास बड़ा सुख से सुख में भी संग संग बहता है। सुख पल भर ही हम जीते हैं जीवन भर दुःख को ढोते हैं आंखें हम दम बह उठती […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- खेतवा देखनी, खरिहनिया देखनी, देखनी किसानवा के रोवत हो। जाँघभर पनिया में धानवा के रोपत, अपना भविसिया१ के बोवत हो। घर-दुआरि भँसल, डेरा-डाँड़ बिलाइल, रही गइल मददिया२ के जोहत हो। कहाँ […]
‘विश्व जल दिवस’ को व्यक्तिशः चिन्तन दिवस के रूप में मेरी प्रस्तुति जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद) जब जल जल जाएगा तो जलजला आ जाएगा, ग़र ख़ुद ही जल बचाएँगें तो हौंसला आ जाएगा। गरम तवे पे […]
भारत माँ के अमर सपूत भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को नमन ….. जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) आँखें नम हो जाती हैं, हर सीना चौड़ा हो जाता है, शूली पे चढ़ते वीरों का जब ज़िक्र ज़ेहन में […]
––० डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ०— मेरा रंग दे बसन्ती चोला। संसद् का है बड़बोला, इधर सुरा, उधर सुन्दरी, भोग लगाये गोला। फगुनाहट की छायी मस्ती, ज़हर है देश में घोला। मेरा रंग दे बसन्ती चोला। […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- तू तो चटक निकली– इधर, पलकें अलसायीं उधर, तू चुग गयी दानें फिर फुर्र हो गयी ? मुझे मालूम है, तू आयेगी फिर कनखियों से ताड़ेगी मुझे अनमने से देखने का उपक्रम […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मन में उठते भाव कभी, जब कागज़ में उगने लगते हैं। शिक्षित और अशिक्षित सब, उसको कविता कहने लगते हैं। जब क़दम बढ़ाती है कविता, तब शेर निकलने लगते हैं। करती है […]
नीलेश सिंह- जब सारी दुनिया थी सोयी जाग रहा था तब भी कोई । उलझा-उलझा है हर कोई कौन करे किसकी दिलजोई । सबकुछ खो बैठी है शायद यूँ रहती है खोयी-खोयी । कौन यक़ीन […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद भर्त्सना से बेहतर सखे! प्रबल गर्जन कीजिए। दश दिशा में गूँज हो, संघर्ष का नव वर्जन दीजिए। दुष्टता की राहें रुद्ध कर, साधुता को अर्पण कीजिए। ग़र हो सके तो मित्र अब, […]
कतिपय काव्यपंक्तियाँ डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : वो दिल का क़ातिम (काला) है और कातिल भी, क़ातिब (लेखक) ने उसे क़ादिर (शक्तिशाली) बना दिया। दो : अपनी क़ुबूलियत पे तुम इतराओ मत, तीन : उन्हें […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेजान सड़क पे, इक गुमनाम दिख रही, अनजान-सी हक़ीक़त, बदनाम दिख रही। —–इक पैग़ाम ‘उनके’ नाम—– उस हवा को सलाम, जो लहरा रही है ज़िन्दगी, उस धूप को सलाम, जो खिला रही […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक: उजड़ा हुआ चमन, उजड़ा रहे तो बेहतर है, खिलता हुआ गगन, खिला रहे तो बेहतर है। गुमनाम लोग की दुनिया भी क्या दुनिया, अब वे खुले आम हो जायें तो बेहतर […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद- मातृभूमि की सेवा का प्रण, तुम फ़िर से वीर निभा जाना। देख रहा हिन्द निरीह दृष्टि हो, तुम फिर से धरा में आ जाना। नित बिद्ध हो रही भारत माँ, तुम फिर […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशक, चाहो पर सराहो नहीं, बेशक, पाओ पर निभाओ नहीं। मुद्दत बाद ज़िन्दगी सयान हुई, उसे सब्ज़बाग़ दिखाओ नहीं। मस्त-मौला हूँ और फक्कड़ भी, भूले से कभी आज़्माओ नहीं। मनमाफ़िक मर्ज़ी का […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) तू मुझसे प्रेम करता है ,या रक्तिम आँसू रुलाता है, कभी अग्नि से जलाता है,कभी तेज़ाब से झुलसाता है। अरे! मानव अहंकारी दुर्बुद्धिकारी, सद्बुद्धि पैदा कर, जो ही तुझको करे पैदा, तू […]
प्रभांशु कुमार लतपथ गहनों आैर चमकीले वस्त्रों से लदे फदें बारातियों को आैर राह को जगमगाने के लिए पेट्रोमैक्स सिर पर रखे उजास भरते अपने आसपास वे गरीब बच्चे खुद मन में समेटे है एक […]
एस.पी.सुधेश- उजड़ कर हर एक मेला रह गया अन्त में दर्शक अकेला रह गया । सुखों की चाँदनी में तुम नहा लो सीस पर कोई दुपहरी सह गया । हर शमा के साथ इक परवाना […]
प्रभांशु कुमार मेरे अंदर का दूसरा आदमी मेरा दूसरा रुप है वर्तमान परिदृश्य का सच्चा स्वरूप है जिस समय मैं रात में सो रहा होता हूं उसी समय मेरे अंदर […]
नीना अन्दोत्रा पठानिया- क्या हुआ बीबी जी, हर शनिवार को आप कुछ ढूंढने के लिए बाहर चली जाती है। कोई जान-पहचान का है। जिसका पता आप ढूढती हो ? नंदा की काम वाली ने नंदा […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेचारा है, दिल तोड़ नहीं पाता, बेचारा है, दिल छोड़ नहीं पाता। नफ़रत क़रीने से सजा के रखता है, बेचारा है, दिल जोड़ नहीं पाता। हर सम्त लोग मुखौटे लगाये हैं बैठे, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : जीव-जगत् है पाप में, स्वार्थ यत्र-तत्र-सर्वत्र। धरणीधर नेपथ्य में, कान्ता कन्त कलत्र।। दो : निशि-दिवा-सी घूम रही, घर-घर विपदा आज। सम्मान निरापद कहाँ, पूर्ण न होता काज।। तीन : कंकणी […]
अमित धर्मसिंह उनकी आँखों में पानी था लाज-शर्म का, रिश्तों की लिहाज का, अपनी हालत पर शर्मिंदगी का पानी भरा था उनके रोम-रोम में। उनके दिल में छुपे दुखों के पहाड़ों से फूटते रहते थे […]
प्रभाँशु कुमार- वह आदमी निराश नही है अपनी जिन्दगी से जो सड़क के किनारे लगे कूड़े को उठाता हुआ अपनी प्यासी आँखो से कुछ ढूंढ़ता हुआ फिर सड़क पर चलते हंसते खिलखिलाते धूल उड़ाते लोगों […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इसके पहले कि आप इस शोक-प्रधान भोजपुरी गीत को पढ़ें , समझें तथा अनुभव करें, आपकी सुविधा के लिए इसकी पृष्ठभूमि का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत है :——– एक पिता का शव धरती […]
प्रभांशु कुमार, इलाहाबाद दुनिया से जाने के बाद रह जाना चाहता हूं दीवार पर टंग जाने के बजाए किसी के लिए किसी अच्छे दिन की अविस्मरणीय स्मृति बनकर रह जाना चाहता हूं धरती की […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) मञ्चों से नित गीता गाता, औ पढ़ता क़ुरान की आयत हूँ। विविध धर्म औ भाषाओं संग, मैं वो जीता – जागता भारत हूँ। सुबह सवेरे भरता अज़ान, औ पूजता नित ऐरावत हूँ। […]
जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद) कविते! तेरे तरकश में, मेरी भी वाणी बनी रहे। उदात्त भाव से नित मेरी, मधुर रागिनी ठनी रहे। कर्कश न हो शब्द कभी, नित प्रेमभाव से सनी रहे। रिश्तों की हो नित […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- रात-दिन उधियइले तहार बबुआ, करेजवा जरवइले तहार बबुआ। ना बुझाला सुझाला ऊ बौका के अब अन्दाजा गरई पकड़े तहार बबुआ। खेत-खरिहान बेचले जेवरवो के ऊ, धूरि आँखी में झोंकले तहार बबुआ। गाँव-नगरी […]
उपासना पाण्डेय ‘आकांक्षा’, हरदोई (उत्तर प्रदेश) मेरा क्या अस्तित्व होता , अगर आप जैसा पिता मुझे न मिलता, हर ज़िद को पूरा किया, हर पल मेरी खुशियों का ख्याल रखा । आप परेशान होते हो, […]
अवधेश कुमार शुक्ला (प्र. अ. जू. हा. कामीपुर) बबूल के वृक्ष पर पीली- पीली रेखावत, लटकती, झूलती, कुछ गुच्छिल, कुछ स्वतन्त्र लटकनों को देखा । देखने में आकर्षक, आलिंगन को उसी तरह मचलती लगीं, जिस […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेपर्द: की बात करने लगे, बातों को वे कतरने लगे। ख़ुद को तूफ़ाँ समझते थे, बुलबुला से भी डरने लगे। वक़्त ने चाल चल दी है, हर गोटी को परखने लगे। देखते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब केहू से अझुरइली तहार बबुनी, घर-अँगना भहरइली तहार बबुनी। मांग पोछाते उ नवका संंघतिया धइली, मुँह करिखा लगइली तहार बबुनी। अइसन कइली पढ़इया सहरिया में ऊ, बावन भतरी कहइली तहार बबुनी। […]
अनिल मिश्र- नीक काम एक भवा है अबकी यूपी बोर्ड परीक्षा मा । गुणवत्ता फिरि आई धीरे धीरे बिगरी शिक्षा मा । लागि कैमरा कमरा कमरा ताका झांकी बन्द हुई । नकल समुल्ली इमला बोली […]
नीना अन्दोत्रा पठानिया- रोज की तरह अंजली ऑफिस से आकर घर के काम निपटा कर जैसे ही रूम आई तो देखा अशोक सो गया था। अंजली अशोक को सोता हुआ देख कर सोचने लग गई, […]
नेहा द्विवेदी- जनता की ये जुबां है, भावों का आसमां है । मातृ भाषा हिंदी भारत की आत्मा है । अगणित भाषा वाले हिंद की पहचान है हिंदी मां भारती की शान है, सम्मान है […]
रजनी गुसैन – Sarahi Prakashan की वॉल से – भारत में साहित्य सृजन का क्षेत्र बहुत विस्तृत हैं! साहित्य की विभिन्न विद्याऐं प्राचीन समय से ही भारतीय साहित्य में उपलब्ध हैं! साहित्य को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया […]
नीना अन्दोत्रा पठानिया (कहानीकार)- “माँ-माँ आज हमारे मुहल्ले में इतनी ज्यादा भीड़ क्यों लगी हुई है , बारह वर्षीय नेहा ने उत्सुकता से अपनी माँ से पूछा । माँ ने कहा “बेटा आज हमारे नेता […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आओ! अब कड़ुए घूँट पीने की आदत डालें, आओ! अब मरकर भी जीने की आदत डालें। हवा अच्छी हो या बुरी उसे तो बहना ही है, आओ! अब चलते रहने की आदत […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद सूरज तो कुछ उकता-सा गया है, दिन अब कुछ मुरझा-सा गया है। ये कण्ठ नहीं है अवरुद्ध तुम्हारा, धरा को क्यों उलझा-सा गया है।। सूरज तो………………………… अब मुक्त करो निज बाहुपाश से, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सारी उम्र खपा दी उसने अपनी मुहब्बत में , तरक़्क़ी सारी गँवा दी उसने मुहब्बत में। ज़ख़्मों पर नमक ही हर बार मिलता रहा, अपनी दोस्ती भी लुटा दी उसने मुहब्बत में। […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अँखिया के कजरा हेराइ गइल सजनी, हथेलिया के मेहँदी रिसाइ गइल सजनी। बहरिया-बहरिया हर ओरिया उजार बा, घरवा के दियवा बुझाइ गइल सजनी। जोहत रहि गइनी अन्हेरिया में अंजोरिया, एही तरी अँखिया […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय चेहरों की बनावट पे मत जाइए, मोहरों की सजावट पे मत जाइए। अब बारी आपकी चाल चलने की, आँखों की मुसकुराहट पे मत जाइए प्यासे हैं तो जल पी खिसक लीजिए, नदियों […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – वह मेरे पार्श्व में बैठी थी। मैं अपलक उसे निहार रहा था। राजहंस-सा गोरा, द्रुत-विलम्बित छन्द-सी गति, अभिधावाणी, उपनागरिकावृत्ति-सी प्रकृति, प्रसाद गुण-सा शील, निर्दोष, कान्तिमान मुखमण्डल पर क्रीड़ा करता शृंगार-रस, अंग-प्रत्यंग […]
पवन कश्यप (हरदोई) तेरी इन झील सी आंखों में जो ये नूर दिखता है, तेरे चेहरे की मदहोशी में ये मन चूर दिखता है । कहीं जुल्फों का गिर जाना, कहीं अधरों का खिल जाना […]
नेहा द्विवेदी- हे चिर महान भारत की शान मानवता के अविचल प्रहरी। युग-युग से हो तुम अचल खडे़ तुमको पग भर न डिगा सके तूफां जो आये बड़े-बड़े हे सत्यब्रती, संघर्षरती हे वैरागी, योगी तपसी […]
सुधान्शु बाजपेयी- गीत संगीत जीवन का नैसर्गिक स्वभाव है । जीवन के हर भाव को संगीत में हम जीते हैं । महसूस करते हैं । आज गीत का सफर लोकरंग से सिनेमा तक भले ही […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; २८ जनवरी, २०१८ ईसवी) यायावर भाषक-संख्या : ९९१९०२३८७० ई०मेल : prithwinathpandey@gmail.com बिखरे पंख, टूटे पाँव कटे हाथों से दर्द की दवा माँग रहे हैं। […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘परिवारवाद’ अलापते, वे परिवारवादी हो गये, जाति-ज़हर घोलते वे, अब समाजवादी हो गये। “बहुजन हिताय” ग़ायब, ख़ुद के हित हैं साधते, पालकर अम्बेडकर भूत, वे दलितवादी हो गये। राममन्दिर बिसर गये, अब […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय साँठ की कोई गुंजाइश न रहे, गाँठ की कोई गुंजाइश न रहे। ‘सच’ से ऐसी दोस्ती कर लो, ‘भीड़’ की कोई गुंजाइश न रहे। महफ़िल सजाओ ऐसी अपनी, ‘मै’ की कोई गुंजाइश […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, (भाषाविद्-समीक्षक), इलाहाबाद- शिक्षाविद्-समीक्षक डॉ० अरविन्द उपाध्याय की शीघ्र प्रकाश्य शोधात्मक कृति ‘ से० रा० यात्री की कहानियों का मध्यवर्गीय स्वरूप’ की ‘फ़्लैप’ सामग्री पर एक दृष्टि :- से० रा० यात्री (सेवाराम यात्री) […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – जोगिया रंग रँगाये, देखो! सन्त आ गया, प्रथा दम तोड़ती, देखो! ‘अन्त’ आ गया! खेतों की हरियाली, अब मुँह है छुपा रही, इधर रुग्ण परिवेश, उधर वसन्त आ गया! काया अब […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (पत्रकार हिन्दुस्तान)- यू०पी० में मचा है हाहाकार चच्चा और भतीजे रूठे, भाई-बाप खिसियायि रहे | हमका दई देव जो भी मांगी, यहु भौकाल दिखाइ रहे | कुर्सी के पीछे मची तबाही, घर-भीतर […]
दिवाकर दत्त त्रिपाठी – वो लेकर गोद में बच्चे को मुहब्बत सिखाती है । वो माँ, जो रोजमर्रा की हमें आदत सिखाती है । ये हिंदुस्तान की तहजीब सिखाती है मुहब्बत , किसी को कब […]
राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ ऐसे कलुषित समाज में लेकर जन्म वर्ण कुल सब मेरा श्याम हो गया । बड़ी दूषित है सोच कर्म भी काले हैं गहन तम में अस्तित्व इनका घुल गया । देखकर यह […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद अब केवल खाना कमाना रह गया। अब कहाँ हँसना हँसाना रह गया । मुश्किलें जीवन को ,हरपल निचोड़तीं, अब तो केवल , रोना रुलाना रह गया। जो हमेशा ख़ुद को मेरा हमदर्द […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद स्वागत है ऋतुराज तुम्हारा, हम बैठे थे खाली- खाली ! आम्रमञ्जरी खिल रही हैं, सुरभित हो रही डाली-डाली! अरहर ,चणक हैं हिले – मिले, सरसों झूम रही फ़ूली – फ़ूली! कोयल रागिनी […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद क़दम ताल सीमा पे करते, भारत माता के लाल हैं! राष्ट्र मुकुट न झुकने पाये, रखे चरण निज भाल हैं! विपदा राष्ट्र के पथ जो आयी, दुश्मन को किये बे-हाल हैं! अरि […]
आरती जायसवाल के कहानी-संग्रह के रूप में शीघ्र प्रकाश्य प्रथम पुस्तक की भूमिका डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक) एक कुशल कहानीकार दो बातों का ही विशेषत: ध्यान करता है : प्रथम, उसे पात्रों के चरित्र और […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद नव रश्मियुक्त मार्तण्ड उगा, अब नव विहान की बारी है! कान्तियुक्त ज्वाज्वल्यमान, कितनी उत्तम तैयारी है! कर दो मुखरित सकल धरा, इतनी अरदास हमारी है! भ्रमर कमर कलि की छुए, निरखे ये […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- सदा देकर भी, सदा दे न सका, मुलाक़ात हुई, पर मिल न सका। जो सौग़ात उनकी हथेली पे रखा था, देकर भी उन्हें, कुछ दे न सका। आँखों के सवाल नामुराद रह […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद नयन अयन उस ओर हैं, जिस ओर मेरे सरकार ! सज़ल नेत्र चातक फिरें, करत फिरें मेघ तकरार! वंशी बजी जो श्याम की, मेघ करने लगे फटकार! भीगीं लटें जो सजन की, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सब कुछ उनका मुआफ़ हो गया, मौसम बेचारा अब साफ़ हो गया। कल तक गिलासभरी चाय पीते थे, नोटबन्दी चलते वह भी हाफ हो गया। उलफ़त का तक़ाज़ा समझ न सका, जाने-अनजाने […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद उस ओर विधायकों के काफिले हैं गुजरते, जिस ओर गरीबों की बस्तियाँ नहीं पड़तीं! उस ओर से गुजरते हैं इनके उड़नखटोले, जिस ओर बारिश में कश्तियाँ नहीं चलती! उस ओर ही बसाते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आँखों-आँखों में, सलाम ले लिये, बन्द होठों से वे, पयाम ले लिये। लब थरथरा गये, मंज़र को देखते, नज़रें ज्यों झुकीं, वे सलाम ले लिये। होठ खुले, अधखुले, बन्द हो गये, जाने […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हथेलियों में छुपा लेता हूँ ख़ुद को और निहाल हो जाता हूँ। हर ज़रूरत से दूर ख़ुद को रखकर अपनी कैफ़ीयत की मंज़रकशी करने लगता हूँ। शब्दों के लिहाफ़ में नख-शिख बन्द […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कभी नौकरी को ‘नौकरी’ की तरह से की ही नहीं। वैसे भी कोई इतना मज़बूत खूँटा किसी के पास था भी नहीं कि कोई बाँध सकता। पगहा तुराकर भाग खड़ा होता था। […]
सत्याधार ‘सत्या’ पल प्रति पल लाचारी होती , जीना भी दूभर हो जाता , दिल का दर्द बयां करने को अगर मुझे अल्फाज न मिलते। उसने इस लायक भी मुझको समझा कभी नहीं जीवन में […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- आइए जनाब! मैं प्यार बेचता हूँ। किसिम-किसिम का प्यार तरह-तरह का प्यार भाँति-भाँति का प्यार नाना प्रकार का प्यार विविध प्रकार का प्यार। आप प्यार, आम प्यार, ख़ास प्यार मर्दाना प्यार, जनाना […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद चहुँओर मची है होड़ा – होड़ी, कहीं गुरुपर्व कहीं पे लोहड़ी! कहीं बिहू है,है कहीं पे पोंगल, मैं कहता त्यौहार है खिचड़ी ! कहीं स्नान,तो कहीं होता दान, हमारी संस्कृति है बड़ी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय मैं उस वतन का चराग़ हूँ, जहाँ आँधियाँ-आँधियाँ। चीर-हरण होता हर प्रहर, चलती जहाँ अब गोलियाँ। विस्थापित शराफ़त हो रही, नंगों की दिखतीं टोलियाँ। कार्पोरेट का डंका बज रहा, फैली हैं सबकी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : उसका दीवानापन, सितमकशीद१ लगता है, सितमगर सितमकशी२ का ऐसा इम्तिहान न ले। दो : मझधार में है सफ़ीना३, साहिल४ है दिखती दूर, किश्तीबान५ साहिबे! रुको नहीं, मंज़िल भले हो दूर। […]
साभार – जनवादी लेखक संघ भारत ‘आख़िरी क़लाम’ जैसे अविस्मरणीय महाकाव्यात्मक उपन्यास और ‘रक्तपात’, ‘रीछ’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘माई का शोकगीत’ जैसी लम्बे समय तक चर्चा में बनी रहने वाली कहानियों के लेखक, जनवादी लेखक संघ […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- साहेब! यही चुनाव है। चुनावी मौसम है, दलदल में अब पाँव हैं। हवा का रुख़ नामालूम, दो नावों में पाँव हैं।। साहेब! यही चुनाव है। हत्यारे, बलात्कारी, व्यभिचारी चहुँ ओर, धर्म, जाति, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – रूठो, जीभर रूठो, मनाऊँगा नहीं, रोओ, जीभर रोओ, हँसाऊँगा नहीं। दोनेभर जलेबी लिये दूर क्यों खड़े? पास आ जाओ, फुसलाऊँगा नहीं। ज़ख़्म बूढ़े देखते, तुम जवान हो गये, घबराओ मत, तुमसे […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – हम रहगुज़र हैं अपने, उन्हें फ़िक्र क्यों रही, मंज़िल बनी है अपनी, उन्हें फ़िक्र क्यों रही ? घर-बार अपना छोड़कर, वीराने में आ गये, रिश्तों की दुहाई की, उन्हें फ़िक्र क्यों […]
“का हो हमार चकचोन्हर चाची! काहाँ उधियाइल बाड़ू। अपना गरदनिया में भागवा गमछा लटकइले आ खइनी फटकत तूँ एतना सुनर-साघर लउकलू कि बुझाए लागेला कि तहरा के भगवान जी बाड़ा सरसन्त से ठोकि-ठाकि के ए […]
सुधान्शु बाजपेयी- अपना संपूर्ण जीवन साहित्य साधना को समर्पित करने वाले अद्वितीय गद्यकार व ऐतिहासिक उपन्यास, कथाओं के रचनाकार रमाकांत पांडेय अकेला को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने साहित्य भूषण से सम्मानित किया है । […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बरबादी लाने को बैठा, देश में शैतान है, इन्सां क्या, भगवान् भी, हरदम परेशान है। नीति कुछ, नीयत कुछ, कर्त्तव्य भी अलग, उसकी ही दुनिया में, शौकत और शान है। सबक़ सिखायें […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : ठिठकते पाँवों को ज़मीं से बढ़ाते चलो, ठिठुरती अँगुलियों को हरकत में आने दो। दो : लपकते शोलों को छूकर मैं देखा करता हूँ, तुम मुझे अँगारों की तासीर क्या […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : वह सच बोलता भी है, इसका यक़ीं नहीं होता, झूठ तो उसके ख़ून के हर बूँद से टपकता है। दो : वह नाचीज़ अपनी नाज़्नीन पे नाज़ है करता, यह […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ज़रा साज़ छेड़ो, तराने उठेंगे, शम्अ जलाओ, परवाने बढ़ेंगे। चिलमन को मत उठाओ अभी, बहुत सारे दुश्मन, पुराने मिलेंगे। मन को दबा, यों बैठे हो क्यों? अभी दिल जवाँ है, दीवाने मिलेंगे। […]
Next 9 Group और CMPPR की ओर से गुरुवार 4 जनवरी को सुबह 11 बजे नई दिल्ली के पार्क होटल में संतोष प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तक ‘आंसुओं के बिना ज़िंदगी’ का लोकार्पण कार्यक्रम किया जाएगा […]